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DJ बजने की वजह से नन्ही बच्ची की मौत, जिम्मेदार कौन?

On: September 27, 2025 9:18 PM
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डीजे की मौत, इसके लिए कौन ज़िम्मेदार है?

Deadly DJ: अपने मजे मस्ती के लिए लोग दूसरों की जिंदगी कैसे उजाड़ देते हैं इस घटना से शायद समझने को मिले या यूँ कहें की हमें समझना चाहिए। रांची जिले के चान्हो थाना क्षेत्र में विश्वकर्मा पूजा के दौरान बज रहे तेज़ डीजे की आवाज़ से दो महीने की बच्ची सोनाक्षी कुमारी की मौत हो गई। बच्ची के पिता बंधन लोहरा ने थाने में शिकायत दर्ज कराई है कि 17 सितंबर से लगातार तेज़ डीजे बजने के कारण बच्ची रातभर रोती रही और अंतत: उसकी तबीयत बिगड़ गई। इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश और शोक की लहर पैदा कर दी है। परिजनों ने डीजे संचालकों और आयोजकों पर कार्रवाई की मांग की है।

मासूम की मौत और समाज की संवेदनहीनता

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रांची जिले के चान्हो में घटी यह घटना केवल एक दुखद हादसा नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता पर भी गहरा सवाल खड़ा करती है। दो महीने की मासूम सोनाक्षी कुमारी ने इस दुनिया को इसलिए अलविदा कह दिया क्योंकि आसपास के लोग अपनी “मौज-मस्ती” और “धूमधड़ाका” को ज़िंदगी से ज़्यादा महत्वपूर्ण मान बैठे।

धर्म और त्योहार जीवन में उत्साह भरते हैं। संगीत और नृत्य हमारी परंपराओं का हिस्सा हैं। लेकिन जब वही संगीत किसी मासूम की जान छीन ले, तो यह उत्सव नहीं, असंवेदनशीलता का शोर बन जाता है। सोनाक्षी का रोना, उसकी असहनीय पीड़ा और अंतत: उसकी मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी खुशियाँ किसी और के जीवन से बड़ी हो सकती हैं?

जिम्मेदारी किसकी?

इस घटना में कई स्तरों पर जिम्मेदारियां बनती हैं।

  • आयोजक जिन्होंने शोर की सीमा का ध्यान नहीं रखा।
  • स्थानीय प्रशासन जो बार-बार आए निर्देशों के बावजूद डीजे की ध्वनि पर नियंत्रण लगाने में नाकाम रहा।
  • समाज जो अपने आस-पास की पीड़ा के प्रति उदासीन हो गया।

भारत में उच्चतम न्यायालय और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर और डीजे बजाने पर रोक के साथ-साथ ध्वनि-स्तर की स्पष्ट सीमा तय की है। लेकिन अफसोस, यह कानून केवल कागजों में रह जाता है।

मासूम की मौत से मिलने वाला संदेश

सोनाक्षी की मौत हमें यह संदेश देती है कि शोर केवल कानों को नहीं चुभता, यह जीवन भी छीन सकता है। वैज्ञानिक तथ्य बताते हैं कि नवजात और छोटे बच्चों के लिए तेज़ ध्वनि बेहद खतरनाक होती है। यह उनके हृदय, मस्तिष्क और मानसिक विकास पर बुरा असर डालता है।

हमें यह समझना होगा कि त्योहारों की आत्मा खुशी और सौहार्द है, न कि अंधाधुंध शोर। अगर हमारी खुशियाँ दूसरों के जीवन में दर्द और त्रासदी का कारण बनें, तो ऐसे उत्सव का कोई मूल्य नहीं रह जाता।

सामाजिक चेतना की ज़रूरत

यह घटना हम सबके लिए एक आईना है। हमें अपने बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों और आस-पड़ोस के प्रति संवेदनशील होना होगा।

  • उत्सव का मतलब संस्कृति का प्रदर्शन हो, संवेदनाओं की हत्या नहीं।
  • धर्म और परंपरा का मतलब मानवता की रक्षा हो, न कि मासूम की बलि
  • प्रशासन को नियमों का सख़्ती से पालन कराना होगा ताकि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों।

सोनाक्षी की मौत हमारे लिए चेतावनी है। अगर आज भी हमने शोरगुल, दिखावा और लापरवाही पर अंकुश नहीं लगाया, तो कल न जाने कितनी और मासूम ज़िंदगियाँ इस बेपरवाह समाज की बलि चढ़ जाएँगी। त्योहार मनाएँ, खुशी बाँटें, लेकिन याद रखें — खुशी वही है, जो किसी की ज़िंदगी छीनकर न मिले।

लेख की समीक्षा

यह लेख घटना को केवल एक “समाचार” न मानकर सामाजिक संदेश के रूप में प्रस्तुत करता है। इसमें भावनात्मक अपील है, लेकिन तथ्यों और वैज्ञानिक आधार को भी जोड़ा गया है। लेख ने पाठकों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि व्यक्तिगत खुशी और सामूहिक जीवन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

हालाँकि, इसमें यह भी ध्यान रखना होगा कि घटना के मेडिकल कारणों की अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए इसे “दावा” और “संभावना” के तौर पर प्रस्तुत करना ज़रूरी है ताकि खबर की विश्वसनीयता बनी रहे।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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