रांची। झारखंड की बहुचर्चित नगड़ी भूमि विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात कर आदिवासी एवं मूलवासी किसानों की जमीन बचाने के लिए पुनः व्यापक आंदोलन छेड़ने का आग्रह किया है। समिति का कहना है कि सरकार किसानों की सहमति के बिना उनकी जमीन पर कब्जा करने का प्रयास कर रही है, जिसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
1957-58 का अधिग्रहण कभी पूरा नहीं हुआ: संघर्ष समिति
समिति ने दावा किया कि राज्य सरकार जिस वर्ष 1957-58 के भूमि अधिग्रहण का हवाला दे रही है, वह प्रक्रिया कभी पूरी ही नहीं हुई थी। प्रतिनिधियों के अनुसार उस समय किसानों के विरोध के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने अधिग्रहण की प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी। समिति का कहना है कि जब भी अधिकारियों से अधिग्रहण से संबंधित दस्तावेज मांगे गए, तब कभी स्पष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए और हर बार अलग-अलग कारण बताकर मामला टाल दिया गया।
बिरसा कृषि विश्वविद्यालय का भी किया उल्लेख
संघर्ष समिति ने कहा कि रिंग रोड निर्माण के दौरान बिरसा कृषि विश्वविद्यालय ने भी लिखित रूप से स्वीकार किया था कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण पूर्ण नहीं हुआ था। ऐसे में सरकार द्वारा पुराने अधिग्रहण का आधार बनाकर जमीन लेने का प्रयास न्यायसंगत नहीं है।
भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) का हवाला
प्रतिनिधिमंडल ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर एवं पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013 की धारा 24(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि पुराने अधिग्रहण के मामलों में सरकार ने भूमि का वास्तविक कब्जा नहीं लिया हो या प्रभावित लोगों को मुआवजा नहीं दिया गया हो, तो अधिग्रहण स्वतः समाप्त माना जाता है।
समिति का आरोप है कि नगड़ी में न तो किसानों को मुआवजा दिया गया और न ही सरकार के पास जमीन का वास्तविक कब्जा था। उस दौरान किसान वर्षों तक उसी भूमि पर खेती करते रहे। ऐसे में सरकार को किसानों की जमीन लेने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
“अस्पताल का विरोध नहीं, जमीन छीनने का विरोध”
संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध अस्पताल निर्माण से नहीं है, बल्कि किसानों की उपजाऊ जमीन अधिग्रहित किए जाने से है।
प्रतिनिधियों का कहना है कि रांची में कई स्थानों पर बंजर एवं सरकारी जमीन उपलब्ध है। इसके अलावा राज्य सरकार एचईसी (HEC) की सैकड़ों एकड़ भूमि पहले ही ले चुकी है तथा और भूमि लेने की तैयारी भी चल रही है। ऐसे में अस्पताल का निर्माण वहीं किया जाना चाहिए, न कि किसानों की कृषि भूमि पर।
सीएनटी एक्ट और पांचवीं अनुसूची का भी उठाया मुद्दा
समिति ने कहा कि नगड़ी क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है और यहां आदिवासियों एवं मूलवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम सहित कई विशेष कानून लागू हैं। प्रतिनिधियों का आरोप है कि यदि सरकार ही इन कानूनों की अनदेखी कर भूमि अधिग्रहण करेगी तो आम जनता के पास लोकतांत्रिक आंदोलन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।
बड़े आंदोलन की चेतावनी
संघर्ष समिति ने दावा किया कि पिछले वर्ष नगड़ी में हुए आंदोलन में लाखों लोग शामिल हुए थे, जिसके बाद सरकार को अपने कदम पीछे हटाने पड़े थे। अब यदि दोबारा किसानों की जमीन पर कब्जा करने का प्रयास किया गया तो पूरे झारखंड से बड़ी संख्या में लोग नगड़ी पहुंचकर आंदोलन करेंगे। समिति ने कहा कि किसान अपनी जमीन बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उनका कहना है कि यह भूमि केवल आजीविका का साधन नहीं बल्कि उनकी संस्कृति, पहचान और पूर्वजों की विरासत है।
जनता से एकजुट होने की अपील
अपने संदेश के अंत में संघर्ष समिति ने आदिवासी एवं झारखंडी समाज से एकजुट होकर भूमि अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन में शामिल होने की अपील की।
नोट: यह समाचार नगड़ी जमीन बचाओ संघर्ष समिति द्वारा जारी किए गए वक्तव्य और उनके दावों पर आधारित है। भूमि अधिग्रहण और प्रस्तावित अस्पताल निर्माण को लेकर सरकार की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
















