
माँ: अस्तित्व, संवेदना और सृजन की अनंत शक्ति
अहमदाबाद, गुजरात । Mother’s day के अवसर पर प्रसिद्ध साहित्यकार और चिंतक डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ ने माँ के स्वरूप को केवल भावनाओं तक सीमित न रखते हुए उसे एक गहन दार्शनिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, माँ केवल एक संबंध नहीं बल्कि मानव अस्तित्व की मूल चेतना और सृष्टि का आधार है।

डॉ. जोशी ने अपने विचारों में कहा कि आज के दौर में मातृ दिवस को अक्सर उपहारों, कविताओं और भावुक संदेशों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि माँ का वास्तविक स्वरूप इससे कहीं अधिक व्यापक और गहरा है। उन्होंने माँ को “अस्तित्व का आदि-बिंदु” और “मौन ब्रह्म” बताते हुए कहा कि वही वह शक्ति है जहाँ से जीवन अपनी पहली यात्रा आरंभ करता है।
Mother’s day special: माँ, ‘मैं’ और ‘तुम’ के भेद को मिटाने वाली शक्ति
उन्होंने कहा कि माँ होना केवल जैविक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्म-विसर्जन का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस गर्भ को विज्ञान केवल जैविक संरचना मानता है, दर्शन की दृष्टि में वह “अद्वैत की पाठशाला” है, जहाँ एक देह के भीतर दूसरी देह का निर्माण इस सत्य को सिद्ध करता है कि “मैं” और “तुम” का भेद कृत्रिम है।
डॉ. दक्षा जोशी के अनुसार, माँ वह पहली गुरु है जो बिना शब्दों के यह सिखाती है कि स्वयं को बाँटकर ही पूर्णता प्राप्त की जा सकती है। उनका त्याग किसी उपकार का रूप नहीं, बल्कि उनकी स्वाभाविक प्रकृति है।
अतीत और भविष्य के बीच सेतु है माँ
अपने संदेश में उन्होंने माँ को समय का जीवंत सेतु बताया। उनके अनुसार, माँ केवल एक शिशु को जन्म नहीं देती, बल्कि वह अतीत की स्मृतियों और भविष्य की संभावनाओं को जोड़ने का कार्य करती है। माँ के भीतर पीढ़ियों का अनुभव, संस्कार और भविष्य की नियति एक साथ आकार लेते हैं।
उन्होंने कहा कि सृजन की दृष्टि से माँ शून्य से आकार गढ़ती है, संरक्षण की दृष्टि से अव्यवस्था के विरुद्ध व्यवस्था स्थापित करती है और अंततः अपनी संतान को स्वतंत्र कर स्वयं नेपथ्य में चली जाती है।
प्रेम की सबसे शुद्ध परिभाषा
डॉ. जोशी ने कहा कि संसार के तमाम तर्क और दर्शन प्रेम की संपूर्ण व्याख्या करने में असफल रहे हैं, लेकिन माँ का प्रेम इस प्रश्न का जीवंत उत्तर है। यह ऐसा प्रेम है जो किसी प्रतिफल या अपेक्षा पर आधारित नहीं होता। माँ का स्नेह निरंतर बहने वाली उस ऊर्जा की तरह है जो बिना किसी शर्त के जीवन को पोषित करती रहती है।
उन्होंने माँ को ईश्वर का मूर्त रूप बताते हुए कहा कि यदि ईश्वर एक अमूर्त विचार है, तो माँ उसका प्रत्यक्ष अनुवाद है।
संवेदना का अंतिम आश्रय
अपने संदेश के अंत में डॉ. दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ ने कहा कि आज के यांत्रिक और कठोर होते संसार में माँ ही वह शक्ति है जो मनुष्य के भीतर संवेदना को जीवित रखती है। वह हमारे भीतर का वह पवित्र कोना है जिसे दुनिया की कठोरता कभी दूषित नहीं कर पाती।
उन्होंने सभी को मदर्स डे की शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि माँ केवल ममता की प्रतिमा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की धुरी और अस्तित्व की सबसे गहरी अनुभूति है।










































