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वतन पर मर मिटने वाली उस महान तिकड़ी की शहादत, जिसने हिला दी थी ब्रिटिश साम्राज्य की नींव

On: March 23, 2026 2:52 PM
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नई दिल्ली: आज पूरा देश ‘शहीद दिवस’ मना रहा है। यह वही ऐतिहासिक दिन है जब 1931 में भारत माँ के तीन लाड़ले सपूतों—भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया था। उनकी शहादत ने न केवल ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं, बल्कि सोए हुए भारत में आज़ादी की एक ऐसी अलख जगाई जो 1947 में स्वतंत्रता मिलने तक नहीं बुझी।

प्रतिशोध से परिवर्तन तक का सफर

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इतिहास के पन्ने पलटें तो इस क्रांति की नींव 1928 में पड़ी थी। साइमन कमीशन के विरोध के दौरान लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु ने इन युवाओं को झकझोर दिया था। इसका बदला लेने के लिए इन्होंने ब्रिटिश अधिकारी सांडर्स को मौत के घाट उतारा। लेकिन इनका उद्देश्य केवल रक्तपात नहीं था।

8 अप्रैल 1929 को केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने यह स्पष्ट कर दिया था कि उनका मकसद “बहरों को सुनाना” था, किसी की जान लेना नहीं। जेल के भीतर भी उनकी भूख हड़ताल ने कैदियों के अधिकारों और मानवीय गरिमा की एक नई जंग लड़ी।

वक्त से पहले दी गई थी फाँसी

अंग्रेजी हुकूमत इन क्रांतिकारियों की लोकप्रियता से इस कदर डरी हुई थी कि उन्हें निर्धारित समय से 11 घंटे पहले ही, 23 मार्च की शाम को गुप्त रूप से फाँसी दे दी गई। जेल की दीवारों ने उस दिन “इंकलाब ज़िंदाबाद” के वे नारे सुने, जो आज भी हर भारतीय के खून में जोश भर देते हैं।

आज के दौर में प्रासंगिकता

भगत सिंह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक विचारक भी थे। उनके ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) का सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ अमीर-गरीब का भेद न हो और सबको समान अधिकार मिलें। आज के युवाओं के लिए उनका जीवन एक मार्गदर्शक है कि कैसे साहस और वैचारिक स्पष्टता से बड़े से बड़े अन्याय के खिलाफ लड़ा जा सकता है “शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”

आज देश के कोने-कोने में स्कूल, कॉलेजों और संस्थाओं में इन अमर शहीदों को श्रद्धांजलि दी जा रही है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारी आज़ादी की कीमत इन वीरों का बलिदान है।

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