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आदिवासी भाषा और साहित्य की सोंधी महक के साथ शुरू हुआ प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव 2026

On: January 9, 2026 9:34 PM
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  • जिला और राज्य के साहित्यकारों, लेखकों, कलाकारों के साथ साथ देश के अलग अलग प्रांतों से आये साहित्यकारों, लेखकों ने अपने विचार रखे
  • विविध भाषा, साहित्य, कला व संस्कृति को जानने समझने का यह उत्सव उम्मीद है रचनात्मक संवाद और सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त मंच बनेगा… श्री कर्ण सत्यार्थी, उपायुक्त, पूर्वी सिंहभूम
  • कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी हुए शामिल, वरीय पुलिस अधीक्षक, उप विकास आयुक्त, पुलिस अधीक्षक ग्रामीण, एसडीएम धालभूम व अन्य प्रशासनिक – पुलिस पदाधिकारियों की रही उपस्थिति

जमशेदपुर : प्रथम पूर्वी सिंहभूम साहित्य उत्सव का शुभारंभ गोपाल मैदान में देश भर के नामचीन, जनजातीय एवं स्थानीय साहित्यकारों की उपस्थिति में संयुक्त रूप से दीप जलाकर हुआ। तीन दिन तक चलने वाले महोत्सव के पहले दिन झारखंड के जनजातीय साहित्यकारों की उपस्थिति विशेष उल्लेखनीय रही। श्री महादेव टोप्पो, डॉ पार्वती तिर्की डॉ अनुज लुगुन, श्री रवींद्रनाथ मुर्मू, श्रीमती जोबा मुर्मू, डॉ नारायण उरांव, श्री देवेंद्र नाथ चांपिया, श्री जेरी पिंटो सहित कई साहित्यकारों ने पहले दिन अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

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कार्यक्रम के शुरुआत में उप विकास आयुक्त श्री नागेंद्र पासवान ने स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश करते हुए बताया कि आयोजन का उद्देश्य साहित्य और समाज के बीच संवाद को सुदृढ़ करना है और युवाओं को रचनात्मक सृजन से जोड़ना है । साहित्यिक चेतना को नई दिशा देना है। उन्होंने माननीय मुख्यमंत्री, झारखण्ड का संदेश सुनाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने आशा व्यक्त की है कि इस आयोजन से कोल्हान की समृद्ध भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी। उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयास, खासकर सोबरन मांझी पुस्तकालयों की स्थापना की चर्चा की।

उपायुक्त, पूर्वी सिंहभूम श्री कर्ण सत्यार्थी ने इस आयोजन को लेकर कहा कि ख्यातिप्राप्त साहित्यकारों, लेखकों एवं कलाकारों को सुनने, संवाद कर उनकी साहित्य, कला व संस्कृति को नजदीक से समझने का अवसर मिला। आशा है कि यह उत्सव रचनात्मक संवाद और सांस्कृतिक समृद्धि का सशक्त मंच बनेगा।

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प्रथम सत्र

झारखंड आदिवासी भाषा साहित्य की विश्व दृष्टि

राष्ट्रीय साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर पार्वती तिर्की और डॉक्टर अनुज लुगुन ने विषय पर अपने विचार व्यक्त किये। विषय को विस्तार देते हुए डॉक्टर पार्वती तिर्की ने कहा आदिवासी साहित्य में वाचिक साहित्य और लिखित साहित्य की परंपरा रही है। वाचिक साहित्य में वाचन का दर्शन है और इस के सृजन में आदिवासी समूह के बड़े बुजुर्ग स्त्री पुरुष सभी का सृजन सामूहिक रूप से शामिल है।

आदिवासी साहित्य सृजनशीलता की प्रक्रिया में समाज का सहियापन और कृति में जो सामूहिकता है यह एक तरह से अंतः संबंधित है। सृजनशीलता में सब की सहभागिता और कृति में सामूहिकता का जो विजन है यह आदिवासी साहित्य को उसके समय की विश्व दृष्टि से जोड़ती है। डॉ अनुज लुगुन ने विषय को आगे बढ़ाते हुए कहा कि आदिवासी साहित्य में मौजूद दृष्टि और उपनिवेशवाद के विरोध की ऐतिहासिक चेतना इसे न सिर्फ अन्य भारतीय साहित्य बल्कि विश्व के हर उस भाषा से जोड़ती है ,जहां यह संघर्ष किसी न किसी रूप में मौजूद रहा है। हालांकि जनजातीय भाषाओं के साहित्य का मूल्यांकन उस दृष्टि से नहीं हो पाया है, इस पर ध्यान देने की जरूरत है।

द्वितीय सत्र

विषय आदिवासी इतिहास का अध्याय

सत्र को संबोधित करते हुए श्री डोगरो बिरुली ने कहा कि वह समाज मृत है जहां साहित्य का अस्तित्व नहीं है। प्रोफेसर डी0 एन चाम्पिया, पूर्व अध्यक्ष बिहार विधानसभा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आधुनिक भाषाएं प्राकृतिक और अपभ्रंश काल से होते हुए 12वीं शताब्दी के आसपास अस्तित्व में आई जबकि आदिवासी भाषा और उसका इतिहास इससे काफी पहले से है। यह प्रकृति प्रदत्त प्रकृति पोषित और विकसित भाषा है इसलिए इसका कोई व्याकरण नहीं है। अन्य आधुनिक भाषाएं आदिवासी भाषाओं की संतानें है इसके प्रमाण सत्यम शिवम सुंदरम दिनाम हयाती शून्यहितम इत्यादि उद्धरणों को आदिवासी भाषाओं की दृष्टि से व्याख्यातित कर देखा जा सकता है।

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तृतीय सत्र

विषय A good life lessons in living and leaving

तीसरे सत्र को शुरू करते हुए अक्षय बाहिबाला ने जेरी पिंटो से उनकी नई किताब पर चर्चा की । पैलियेटिव केयर के इतिहास और वर्तमान पर विस्तार से चर्चा करते हुए जेरी पिंटो ने इसकी बुनियादी जरूरत पर प्रतिभागियों का ध्यान आकर्षित किया और इसे विस्तार देने की आवश्यकता पर बल दिया।

चौथे सत्र

चौथे सत्र का विषय था ओलचिकी लिपि का शताब्दी वर्ष। विषय पर चर्चा करने के लिए जोबा मुर्मू, रानी मुर्मू ,रविंद्र मुर्मू, वीर प्रताप मुर्मू मंचासीन हुए। वार्ता के दौरान ओलचिकी लिपि की जरूरत ,उत्पत्ति और विकास पर दृष्टि डालते हुए गुरु गोमके पंडित रघुनाथ मुर्मू के योगदान की चर्चा की गई। वार्ता का सफल संचालन करते हुए रविंद्रनाथ मुर्मू ने कहा कि पंडित रघुनाथ मुर्मू ने साहित्य की लगभग हर विधाओं में अपनी रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ संथाली जीवन के हर सांस्कृतिक, दैनिक जीवन को छुआ बल्कि उनका हिस्सा बन गई।

पांचवा सत्र

पांचवें सत्र में कुडुख भाषा के संरक्षण और विकास में लगे तथा पेशे से चिकित्सक डॉ नारायण उरांव ने विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि संस्कृति तभी बचेगी, जब भाषा बचेगी। भाषा तभी बचेगी, जब स्कूलों में भी मातृभाषा में पढ़ाई होगी। उन्होंने कुडुख भाषा और उसकी लिपि तोलोंग सिकि के इतिहास और विकास पर अपना विचार व्यक्त किया।

छठा सत्र

छठे सत्र में स्थानीय एवं देश भर में प्रतिष्ठित साहित्यकार जयनंदन के साथ अजय मेहताब ने वार्ता की। विषय था मजदूरों के शहर में साहित्य की पौध । जयनंदन ने कहा कि भले ही यह शहर मजदूरों का है, लेकिन उनकी परेशानियों और संवेदनाओं को शहर के साहित्यकारों ने शब्दों में उतारा है। उन्होंने स्वर्गीय कमल, गुरु वचन सिंह, सी भास्कर राव, निर्मला ठाकुर सहित कई साहित्यकारों के नाम का उल्लेख किया, जिन्होंने शहर का नाम साहित्य के क्षेत्र में रोशन किया। उन्होंने कहा कि कंपनी ने विभिन्न भाषा और संस्कृतियों को समृद्ध करने में काफी सहयोग किया है। उन्होंने नाटय कर्मियों के लिए प्रेक्षागृह सस्ते दर में उपलब्ध नहीं होने पर चिंता व्यक्त की। उन्होंने अपनी चर्चित कहानियों एवं उपन्यासों की रचना प्रक्रिया पर भी जानकारी साझा की।

सातवां एवं अंतिम सत्र में डॉ हिमांशु वाजपेयी एवं प्रज्ञा शर्मा ने दास्तान रानी लक्ष्मीबाई की बुलंद एवं रोचक अंदाज में जिसे दास्तानगो कहते हैं उसमें प्रस्तुत की, जिसे उपस्थित लोगों ने काफी सराहा। देर शाम कस्तूरबा विद्यालय सहित विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया।

कार्यक्रमों के सफल संचालन में एसडीओ धालभूम श्री अर्नव मिश्रा, डीटीओ श्री धनंजय, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी श्री पंचानन उरांव, जिला शिक्षा अधीक्षक श्री आशीष पांडेय व अन्य पदाधिकारियों का योगदान रहा।पहले दिन का समापन स्थानीय साहित्यकारों की कवि गोष्ठी के साथ संपन्न हुआ।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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