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हिमालय की आवाज़, हमारे समय का नैतिक विवेक – सुंदर लाल बहुगुणा

On: January 9, 2026 2:49 PM
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JAMSHADPUR : सुंदर लाल बहुगुणा का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि हमारे समय के सबसे सशक्त सामाजिक–नैतिक प्रहरी का मौन हो जाना है। ऐसे दौर में जब पर्यावरण, विकास और मानवीय संवेदना के प्रश्न पहले से कहीं अधिक गंभीर हो चुके हैं, बहुगुणा का जीवन और विचार आज भी हमें चेताते हैं, राह दिखाते हैं।

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महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित सुंदर लाल बहुगुणा का सार्वजनिक जीवन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से शुरू हुआ। सत्य, अहिंसा और जनसहभागिता उनके संघर्ष की स्थायी धुरी रही। स्वतंत्रता के बाद सत्ता की राजनीति से दूरी बनाकर उन्होंने समाज-निर्माण का रास्ता चुना और जीवन भर जनता के बीच रहकर काम किया। यही कारण है कि वे कभी केवल ‘नेता’ नहीं बने, बल्कि एक लोकनायक के रूप में पहचाने गए।

चिपको आंदोलन से वैश्विक पहचान

दुनिया उन्हें और चंडी प्रसाद भट्ट को चिपको आंदोलन के लिए जानती है, लेकिन बहुगुणा के जीवन का यह केवल एक अध्याय था। चिपको आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि पहाड़ी समाज के अस्तित्व, आजीविका और आत्मसम्मान का संघर्ष था। जब महिलाएं पेड़ों से लिपटकर खड़ी हुईं, तब पूरी दुनिया ने देखा कि विकास के नाम पर होने वाले विनाश का प्रतिरोध भी अहिंसा और प्रेम से किया जा सकता है।

बहुगुणा ने इस आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया, लेकिन कभी इसका श्रेय नहीं लिया। उनके लिए आंदोलन से अधिक उसका नैतिक संदेश महत्वपूर्ण था—प्रकृति, मनुष्य और विकास के बीच संतुलन।

टिहरी बांध और विकास की कीमत

चिपको के बाद बहुगुणा का संघर्ष और व्यापक हुआ। टिहरी बांध के विरोध में उन्होंने दशकों तक आवाज़ बुलंद की। उनका सवाल साफ़ था—क्या कुछ शहरों की जरूरतों के लिए पूरे हिमालयी समाज को विस्थापन की कीमत चुकानी चाहिए? उन्होंने अनशन, पदयात्रा और संवाद के माध्यम से अपनी बात प्रधानमंत्री से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक रखी वे मानते थे कि हर लड़ाई जीती नहीं जाती, लेकिन हर अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना नैतिक जिम्मेदारी है।

सादगी, संवाद और नैतिकता

सुंदर लाल बहुगुणा की सबसे बड़ी ताकत उनकी सादगी और संवादशीलता थी। वे विरोध को भी संवाद में बदल देते थे। साधारण जीवन, न्यूनतम आवश्यकताएं और विचारों की अधिकतम स्पष्टता—यही उनकी पहचान थी। ‘पृथ्वी बचाओ’ उनके लिए नारा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन था।

पद्म विभूषण जैसे सम्मान उन्हें मिले, लेकिन उन्होंने उन्हें व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज के संघर्षों की स्वीकृति के रूप में स्वीकार किया।

आज भी उतने ही प्रासंगिक

आज जब जलवायु संकट, विस्थापन और प्राकृतिक संसाधनों की लूट वैश्विक चिंता बन चुकी है, सुंदर लाल बहुगुणा की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है। वे हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व ही मानवता का भविष्य है।

सुंदर लाल बहुगुणा भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ हिमालय की हवाओं, नदियों की धारा और संघर्षरत समाज की चेतना में आज भी जीवित है। वे सवाल छोड़ गए हैं—और शायद यही किसी सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता की सबसे बड़ी विरासत होती है।

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