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वर्षात में बेघर हुए गरीब परिवारों की पीड़ा का जीवंत चित्र

On: December 27, 2025 8:31 PM
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पिछले बारिश के मौसम में बर्बाद हुए घरों के लिए अभी तक कोई मुआवज़ा नहीं मिला है, जबकि पोटका ब्लॉक से ज़िले में छह सौ से ज़्यादा एप्लीकेशन भेजे जा चुके हैं। इस ठंड के मौसम में इन बेघर लोगों की हालत देखने की कोई परवाह नहीं कर रहा है। इस दिल दहला देने वाले अन्याय को करुणमय मंडल ने एक कविता के रूप में लिखा है।

करुणामय मंडल की प्रस्तुत कविता वर्षात में बेघर हुए गरीब परिवारों की पीड़ा का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है। कवि इस बात पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हैं कि आपदा की मार झेलते हुए जिन लोगों के घर टूट गए, उनकी मदद के नाम पर अब तक केवल आश्वासन मिला है, मुआवजा नहीं

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कविता में एक मार्मिक विरोध दिखाई देता है— जहाँ प्रकृति ने बारिश और बाढ़ के रूप में उन्हें पीड़ा दी, वहीं प्रशासन की उदासीनता ने इस कष्ट को और बढ़ा दिया।

कवि पूछते हैं कि—
ठिठुरती ठंड में
बूढ़े, बच्चे, महिलाएँ
किन हालात में अपनी रातें गुजार रहे हैं,
इसकी चिंता करने वाला कौन है?

कविता कहीं न कहीं इस कड़वे यथार्थ को उजागर करती है कि गरीबों के जीवन और जरूरतों को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। सरकारी योजनाएँ, फ़ाइलों और आंकड़ों में तो मौजूद हैं, लेकिन जमीनी हक़ीक़त में अभी भी उम्मीद अधूरी है।

कविता पढ़ें:

“प्रकृति और प्रशासन
दोनों ने सज़ा दी है।
जो बारिश के मौसम में बेघर हो गए
उन्हें मुआवज़ा नहीं मिला।
इस साल की आपदा में
गरीबों के घर बर्बाद हो गए।
जो घर जर्जर हो गए थे
सालों की गरीबी झेलने के बाद।
सैकड़ों घर ढहा दिए गए
ज़मीन बंजर हो गई।
अब वे परिवार कहाँ हैं?
कौन जानता है?
वे अपने दिन कैसे बिताते हैं
इस कड़ाके की ठंड में?
सभी बूढ़े, बच्चे और औरतें
कितने दुखी हैं!
वे गरीब हैं, लेकिन ज़िंदगी
सबके लिए बराबर है।
“आपदा राहत” का क्या हुआ?
कौन जानता है?
बेघर लोगों को कोई मुआवज़ा नहीं
ठंड में कांप रहे हैं।
अगर गरीब ठंड में कांपते हुए मर गए,
तो मुआवज़े का क्या फायदा होगा?
एक अजीब मिलीभगत
प्रकृति और प्रशासन के बीच।
गरीबों पर कोई दया नहीं,
जैसे हमेशा नफ़रत ही हो।
प्रतिनिधि भी चुप हैं,
अपनी ही दुनिया में खोए हुए हैं।
हे भगवान, कुछ करो,
हमें इस शोषण से आज़ाद करो।”

– करुणमय मंडल, पूर्व ज़िला पार्षद, पोटका, पूर्वी सिंहभूम, झारखंड

कवि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के मौन रहने पर व्यंग्यात्मक चोट करते हुए यह संदेश देते हैं कि—

“अगर सभी आँखें बंद कर लें, तो अंतिम उम्मीद सिर्फ ऊपरवाले से ही रह जाती है।”

अंत में कवि का स्वर एक करुण पुकार में बदल जाता है— भगवान से न्याय की अपील, शोषण से मुक्ति की आकांक्षा और मानवता जागने की उम्मीद।

यह कविता सिर्फ शब्दों का समूह नहीं, बल्कि पीड़ा की चीख है, न्याय की माँग है, और समाज तथा शासन को संवेदनशील बनने का आह्वान है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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