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Mining संशोधन विधेयक को लेकर सियासत तेज सरकार पर अवैध खनन को संरक्षण देने का आरोप

On: August 30, 2026 7:53 PM
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जमशेदपुर: झारखंड में खान एवं खनिज संशोधन विधेयक 2026 को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इसी क्रम में राज्य की Mining नीति, सेस, खनन राजस्व, अवैध कारोबार और नई खदानों के संचालन को लेकर सत्ताधारी दलों पर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। विपक्ष की ओर से जारी बयान में दावा किया गया है कि संशोधन विधेयक को लेकर जनता के बीच जिस तरह के नुकसान की बातें कही जा रही हैं, उनकी वास्तविकता अलग है।

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बयान में कहा गया है कि संशोधन लागू होने के बाद भी राज्य सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, जिला खनिज फाउंडेशन ट्रस्ट (DMFT) फंड और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट आदि से होने वाली आय पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। आरोप लगाया गया कि वास्तविक विवाद वैध खनन के बजाय अवैध कोयला और लौह अयस्क कारोबार को लेकर है।

सेस को लेकर सरकार पर उठाए सवाल

बयान में कहा गया है कि यदि संशोधन के बाद राज्य के खनन राजस्व के प्रमुख स्रोतों पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ना है तो फिर इतना राजनीतिक विरोध किस बात को लेकर किया जा रहा है। आरोप लगाया गया कि कोयला और लौह अयस्क पर लगाए गए सेस के कारण वैध खनिज महंगे हो रहे हैं और इसका असर उद्योगों तथा आम लोगों पर पड़ रहा है।

बयान के अनुसार, झारखंड में कोयले पर 450 रुपये प्रति टन और लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन सेस लगाया जाता है। इसके कारण राज्य में खनिजों की कीमत पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक होने का दावा किया गया है।

झारखंड में महंगा कोयला, पड़ोसी राज्यों से तुलना

बयान में थर्मल कोयले की कीमतों का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि झारखंड में इसकी कीमत करीब 2,459 रुपये प्रति टन बताई गई है, जबकि ओडिशा में समान ग्रेड के कोयले की कीमत लगभग 1,708 रुपये और पश्चिम बंगाल में करीब 1,741 रुपये प्रति टन होने का दावा किया गया है।

इसके आधार पर सवाल उठाया गया कि यदि किसी उद्योग को दूसरे राज्यों से सस्ता कच्चा माल उपलब्ध होगा तो वह महंगे विकल्प का इस्तेमाल क्यों करेगा। बयान में कहा गया कि इस अंतर का असर झारखंड में संचालित उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता पर पड़ सकता है।

उद्योगों और रोजगार पर असर का दावा

आरोप लगाया गया है कि खनिजों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ने से कई उद्योगों की लागत बढ़ रही है। यदि कंपनियां इस अतिरिक्त खर्च को स्वयं वहन नहीं कर पाती हैं तो उसका असर अंतिम उत्पाद की कीमत पर पड़ सकता है।

इसका सीधा प्रभाव बिजली, स्टील और अन्य खनिज आधारित उत्पादों की कीमतों पर पड़ने की आशंका जताई गई है। बयान में कहा गया कि अंततः बढ़ी हुई लागत का भार किसी न किसी रूप में उपभोक्ताओं को ही उठाना पड़ता है।

उत्पादन में गिरावट का भी किया दावा

बयान में दावा किया गया है कि सेस लागू होने के बाद झारखंड में कोयला और लौह अयस्क के उत्पादन में 12 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट आई है। इसके साथ ही विभिन्न कोयला कंपनियों के उत्पादन और मुनाफे में कमी का भी उल्लेख किया गया है।

बयान के अनुसार, BCCL के उत्पादन में करीब 5 मिलियन टन की गिरावट आई और उसके मुनाफे पर भी असर पड़ा। इसी तरह CCL का उत्पादन लक्ष्य से कम रहने तथा मुनाफे में 27 प्रतिशत की कमी का दावा किया गया है। ECL को 966 करोड़ रुपये के घाटे का भी उल्लेख किया गया है।

हालांकि, इन आंकड़ों और इनके कारणों की स्वतंत्र पुष्टि इस बयान में उपलब्ध नहीं कराई गई है।

अवैध कारोबार को फायदा पहुंचने का आरोप

बयान में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि वैध खनन महंगा और कठिन होने से अवैध खनिज कारोबार को फायदा मिल सकता है। तर्क दिया गया है कि यदि बाजार में खनिज की मांग बनी रहती है लेकिन वैध उत्पादन घटता है तो उस कमी को अवैध आपूर्ति पूरा कर सकती है।

आरोप के मुताबिक अवैध कारोबारियों को रॉयल्टी, DMFT, GST और सेस जैसी वैधानिक देनदारियां नहीं चुकानी पड़तीं। इसलिए अवैध खनिज वैध खनिज की तुलना में सस्ता पड़ सकता है।

BCCL और अवैध खनन को लेकर भी सवाल

बयान में आरोप लगाया गया कि जब BCCL की ओर से केंद्रीय बलों की मदद से अवैध खनन रोकने का प्रयास किया गया, तो उसके प्रबंधन के खिलाफ लगातार प्राथमिकी दर्ज कराई गईं। इसे सरकारी संरक्षण में चल रहे कथित खनन माफिया के खिलाफ कार्रवाई करने का परिणाम बताया गया है।

हालांकि, इन आरोपों के संबंध में संबंधित पक्षों का पक्ष इस बयान में शामिल नहीं है।

राज्यों को खनन राजस्व में बड़े हिस्से का दावा

बयान में केंद्र में वर्ष 2014 में एनडीए सरकार बनने के बाद राज्यों की खनन क्षेत्र से होने वाली आय में 354 प्रतिशत वृद्धि का दावा किया गया है। साथ ही कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में खनन क्षेत्र से प्राप्त कुल राजस्व का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है और संशोधन के बाद भी राज्यों को करीब 90 प्रतिशत हिस्सा मिलने की बात कही गई है।

इसी आधार पर बयान में कहा गया है कि संशोधन विधेयक को लेकर हजारों करोड़ रुपये के संभावित नुकसान की जो बातें कही जा रही हैं, उन्हें आंकड़ों के आधार पर देखने की जरूरत है।

16 हजार से 22 हजार करोड़ रुपये के नुकसान पर सवाल

बयान में राज्य सरकार की ओर से अलग-अलग मौकों पर 16 हजार करोड़ रुपये और 22 हजार करोड़ रुपये के संभावित नुकसान की बात किए जाने पर सवाल उठाया गया है।

इसमें कहा गया है कि पिछले वित्तीय वर्ष में सेस से प्राप्त कुल रकम करीब 7,486 करोड़ रुपये बताई गई है। ऐसे में सवाल उठाया गया कि जब राज्य में कोयला और लौह अयस्क का उत्पादन लगातार घट रहा है तो इस रकम के तीन से चार गुना बढ़ने की संभावना किस आधार पर जताई जा रही है।

ग्रामीण विकास में इस्तेमाल हो सकती थी राशि

बयान में कहा गया है कि यदि राज्य सरकार खनन से प्राप्त राशि का प्रभावी और पारदर्शी तरीके से इस्तेमाल करती तो बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों का विकास किया जा सकता था।

सैकड़ों गांवों को आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और विस्थापित परिवारों के जीवन स्तर में सुधार के लिए खनन से प्राप्त राशि का उपयोग किए जाने की बात कही गई है।

अबुआ आवास और मईया सम्मान योजनाओं पर भी सवाल

बयान में अबुआ आवास और मईया सम्मान जैसी योजनाओं को खनन सेस से जोड़ने पर भी सवाल उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि जब इन योजनाओं की घोषणा की गई थी, तब सेस से इतनी बड़ी राशि मिलने की कोई निश्चित उम्मीद नहीं थी।

इसलिए इन योजनाओं के वित्तीय स्रोतों को लेकर स्पष्टता और पारदर्शिता की आवश्यकता जताई गई है।

कोल्हान में रोजगार प्रभावित होने का दावा

बयान में कहा गया है कि सेस के कारण कोल्हान के बड़ाजामदा समेत कई क्षेत्रों में खदानें बंद हो रही हैं और आयरन क्रशरों के बंद होने से हजारों लोगों के रोजगार पर असर पड़ रहा है।

आरोप लगाया गया कि खनन क्षेत्र से जुड़े स्थानीय कामगारों, छोटे कारोबारियों और उद्योगों के हितों की पर्याप्त चिंता नहीं की जा रही है।

ओडिशा मॉडल का दिया उदाहरण

बयान में झारखंड की तुलना ओडिशा से करते हुए कहा गया है कि यदि राज्य सरकार का उद्देश्य खनन राजस्व बढ़ाना है तो अधिक से अधिक स्वीकृत खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर उन्हें जल्द शुरू कराया जाना चाहिए।

दावा किया गया है कि ओडिशा ने केवल 35 नीलाम खनिज ब्लॉकों को चालू कर लगभग 87 हजार करोड़ रुपये का ऑक्शन प्रीमियम अर्जित किया। इसके साथ ही ओडिशा का वार्षिक खनन राजस्व वर्ष 2019-20 के करीब 13,700 करोड़ रुपये से बढ़कर औसतन 45 से 50 हजार करोड़ रुपये प्रति वर्ष तक पहुंचने का दावा किया गया है।

झारखंड में नई खदानें शुरू नहीं होने पर सवाल

बयान में कहा गया है कि केंद्र से स्वीकृति मिलने के बावजूद झारखंड में नई खदानों को शुरू करने की दिशा में अपेक्षित तेजी नहीं दिखाई गई।

इसके चलते राज्य का खनन राजस्व वर्ष 2020-21 में करीब 7,500 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्तीय वर्ष 2024-25 में लगभग 11,900 करोड़ रुपये तक ही पहुंचने का दावा किया गया है।

पारदर्शी खनन नीति की जरूरत

बयान में कहा गया है कि राज्य के खनिज संसाधनों का उपयोग पारदर्शी तरीके से किया जाना चाहिए। नई खदानों की नीलामी, संचालन, रॉयल्टी, DMFT फंड और खनन से मिलने वाले अन्य राजस्व के इस्तेमाल में स्पष्टता जरूरी है।

साथ ही अवैध खनन और खनिजों की अवैध ढुलाई पर प्रभावी कार्रवाई की मांग भी की गई है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

अंत में बयान में केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने की राज्य सरकार की तैयारी पर भी टिप्पणी की गई है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा गया है कि संसद कानून बनाकर राज्यों द्वारा सेस वसूलने की शक्ति को सीमित या समाप्त कर सकती है।

बयान में राज्य सरकार से इस फैसले और उसके कानूनी प्रभाव का अध्ययन करने की बात कही गई है।

Mining राजस्व बढ़ाने के लिए नीलामी पर जोर

बयान का निष्कर्ष है कि यदि राज्य सरकार वास्तव में खनन से राजस्व बढ़ाना चाहती है तो उसे अधिक से अधिक स्वीकृत खदानों की नीलामी कर उनका संचालन शुरू करवाना चाहिए। इससे सरकारी खजाने में प्रत्यक्ष राजस्व आएगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

साथ ही अवैध खनन, बालू घाटों के संचालन, पहाड़ों के कथित अवैध दोहन और DMFT फंड के इस्तेमाल में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जरूरत बताई गई है।

सरकार से पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग

पूरे बयान में राज्य सरकार की खनन नीति और सेस व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठाए गए हैं। आरोप लगाया गया है कि खनन क्षेत्र की समस्याओं का स्थायी समाधान खोजने के बजाय राजनीतिक मुद्दों पर अधिक जोर दिया जा रहा है।

हालांकि, बयान में लगाए गए आरोप राजनीतिक पक्ष के हैं और इन पर राज्य सरकार या सत्ताधारी दलों की प्रतिक्रिया शामिल नहीं है। खनन राजस्व, उत्पादन में गिरावट, सेस से प्राप्त राशि और विभिन्न कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों से जुड़े दावों की आधिकारिक आंकड़ों के आधार पर स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक होगी।

कुल मिलाकर, Mining संशोधन विधेयक 2026 ने झारखंड में खनिज संसाधनों, राज्य के राजस्व, उद्योगों की लागत, रोजगार और अवैध खनन जैसे मुद्दों को एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब महत्वपूर्ण यह होगा कि सरकार और विपक्ष अपने-अपने दावों के समर्थन में आधिकारिक आंकड़े सामने रखें, ताकि जनता के सामने वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके

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