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नलिनीकान्त बागची का बलिदान स्वतंत्रता Struggle के अदम्य क्रांतिकारी की अमर गाथा

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On: June 16, 2026 6:27 PM
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भारत का स्वतंत्रता Struggle केवल राजनीतिक आंदोलनों और अहिंसा के सिद्धांतों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उन असंख्य वीर क्रांतिकारियों के त्याग, साहस और बलिदान की कहानी भी है जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर देश को आजादी की राह दिखाई। ऐसे ही महान क्रांतिकारियों में नलिनीकान्त बागची का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उनका जीवन संघर्ष, साहस, राष्ट्रभक्ति और अदम्य इच्छाशक्ति का ऐसा उदाहरण है, जो आज भी युवाओं को देश के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है।

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16 जून 1918 को मातृभूमि के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले नलिनीकान्त बागची का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि स्वतंत्रता का मूल्य केवल शब्दों से नहीं, बल्कि बलिदानों से चुकाया गया था।

नलिनीकान्त बागची का प्रारंभिक जीवन और क्रांतिकारी विचारधारा

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों में बंगाल अंग्रेजी शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका था। देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत युवा विदेशी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए गुप्त संगठनों से जुड़ रहे थे। इसी वातावरण में नलिनीकान्त बागची ने भी राष्ट्रसेवा का संकल्प लिया।

उन्होंने बहुत कम उम्र में अपना संपूर्ण जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया। अंग्रेज सरकार उन्हें अत्यंत खतरनाक क्रांतिकारी मानती थी और उनकी गिरफ्तारी के लिए लगातार प्रयास करती रहती थी। लेकिन वे अपने साथियों के साथ गुप्त रूप से संगठन चलाकर स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा देते रहे।

गुवाहाटी में पुलिस से पहली बड़ी मुठभेड़

नलिनीकान्त बागची अपने कुछ साथियों के साथ गुवाहाटी के एक गुप्त ठिकाने पर रह रहे थे। सभी को इस बात का आभास था कि अंग्रेजी पुलिस कभी भी वहां छापा मार सकती है। इसलिए रातभर बारी-बारी से पहरा दिया जाता था।

एक रात अचानक पुलिस ने पूरे मकान को चारों ओर से घेर लिया। जैसे ही पहरा दे रहे साथी ने पुलिस को देखा, उसने तुरंत सभी क्रांतिकारियों को सतर्क कर दिया। स्थिति अत्यंत गंभीर थी क्योंकि गिरफ्तारी का अर्थ निश्चित मृत्यु या कठोर यातनाएं थीं।

क्रांतिकारियों ने साहसिक निर्णय लेते हुए पुलिस पर पहले हमला करने की योजना बनाई। उन्होंने अचानक गोलियां चलाते हुए बाहर निकलकर पुलिस पर धावा बोल दिया। इस अप्रत्याशित हमले से पुलिस घबरा गई और छिपने लगी। इसी अवसर का लाभ उठाकर नलिनीकान्त बागची और उनके साथी जंगलों की ओर निकलने में सफल हो गए।

जंगलों में भूख-प्यास और संघर्ष की कठिन परीक्षा

पुलिस से बच निकलने के बाद भी उनकी कठिनाइयों का अंत नहीं हुआ। वे कई दिनों तक जंगलों में भूखे-प्यासे छिपे रहे। लगातार तीन दिन तक भोजन न मिलने के कारण उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।

जब बड़ी मुश्किल से भोजन की व्यवस्था हुई और वे खाने बैठे, तभी भारी पुलिस बल ने उन्हें दोबारा घेर लिया। भोजन छोड़कर उन्हें फिर संघर्ष के लिए तैयार होना पड़ा।

दोनों पक्षों के बीच भीषण गोलीबारी हुई जिसमें तीन क्रांतिकारी वीरगति को प्राप्त हुए। केवल तीन साथी किसी तरह बच निकले, जिनमें नलिनीकान्त बागची भी शामिल थे। यह घटना उनके साहस और अदम्य इच्छाशक्ति का प्रतीक बन गई।

विषैले कीड़े के हमले के बाद भी नहीं टूटा हौसला

लगातार भूख, प्यास और जंगलों में भटकने के कारण उनकी शारीरिक स्थिति अत्यंत कमजोर हो चुकी थी। इसी दौरान एक जहरीला जंगली कीड़ा उनके शरीर से चिपक गया, जिसका विष पूरे शरीर में फैलने लगा।

सामान्य व्यक्ति ऐसी परिस्थिति में जीवन से हार मान सकता था, लेकिन नलिनीकान्त बागची ने हार नहीं मानी। उनके भीतर देशभक्ति की ज्वाला इतनी प्रबल थी कि उन्होंने विषैले दर्द और कमजोरी के बावजूद संघर्ष जारी रखा।

हावड़ा स्टेशन पर बेहोश हुए, मित्र ने बचाई जान

कई दिनों तक कठिन संघर्ष करने के बाद वे किसी प्रकार हावड़ा पहुंचे। स्टेशन के बाहर एक पेड़ के नीचे वे बेहोश होकर गिर पड़े।

संयोग से उनका एक पुराना मित्र वहां से गुजर रहा था जिसने उन्हें पहचान लिया और अपने घर ले गया। घरेलू उपचार, मट्ठा और हल्दी जैसी पारंपरिक चिकित्सा तथा कई दिनों की सेवा से धीरे-धीरे उनकी तबीयत सुधरने लगी।

स्वस्थ होने के बाद भी उन्होंने आराम का जीवन नहीं चुना। उन्होंने पुनः देश की सेवा के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया।

ढाका में फिर शुरू हुई क्रांतिकारी गतिविधियां

कुछ समय तक बिहार में छद्म रूप से रहने के बाद नलिनीकान्त बागची फिर से क्रांतिकारी संगठन में सक्रिय हो गए। बाद में वे अपने साथी तारिणी प्रसन्न मजूमदार के साथ ढाका पहुंचे और वहीं से स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाने लगे।

उनकी गतिविधियों से अंग्रेजी प्रशासन परेशान था। पुलिस लगातार उनके गुप्त ठिकानों की तलाश कर रही थी और अंततः उन्हें सफलता मिल गई।

15 जून 1918 की ऐतिहासिक मुठभेड़

15 जून 1918 को अंग्रेजी पुलिस ने उस मकान को चारों ओर से घेर लिया जहां नलिनीकान्त बागची अपने साथियों के साथ रह रहे थे।

दोनों पक्षों के बीच भीषण गोलीबारी शुरू हो गई। दो पुलिसकर्मी पास के मकान से प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन क्रांतिकारियों की गोलियों से घायल हो गए।

हालांकि क्रांतिकारियों के पास सीमित हथियार और गोला-बारूद था, फिर भी उन्होंने साहस नहीं छोड़ा। उन्होंने मकान से बाहर निकलकर संघर्ष जारी रखा और पुलिस पर लगातार गोलियां चलाते रहे।

16 जून 1918: बलिदान जिसने इतिहास अमर कर दिया

नलिनीकान्त बागची ने अद्भुत वीरता का परिचय दिया। उनकी एक गोली पुलिस अधिकारी की टोपी उड़ाते हुए निकल गई। लेकिन पुलिस बल की संख्या बहुत अधिक थी।

लंबे संघर्ष के दौरान वे गंभीर रूप से घायल हो गए और जमीन पर गिर पड़े। पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर अस्पताल पहुंचाया, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली।

16 जून 1918 को यह महान क्रांतिकारी मातृभूमि की स्वतंत्रता का सपना आंखों में लिए अमर हो गया। उनका बलिदान भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अमूल्य धरोहर बन गया।

नलिनीकान्त बागची का बलिदान आज भी क्यों प्रेरणा देता है?

आज जब भारत स्वतंत्र है, तब हमें उन वीर सपूतों को याद करना चाहिए जिन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण राष्ट्र के लिए समर्पित किया। नलिनीकान्त बागची का जीवन हमें सिखाता है कि देशभक्ति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि त्याग, साहस और समर्पण से सिद्ध होती है।

उनकी शहादत यह संदेश देती है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि है और देश की स्वतंत्रता लाखों बलिदानों का परिणाम है।

16 जून का दिन केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उस अमर अध्याय की स्मृति है जिसमें नलिनीकान्त बागची जैसे वीर क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर स्वतंत्रता की मशाल को प्रज्ज्वलित रखा।

आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी ऐसे गुमनाम नायकों के जीवन से प्रेरणा ले और राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका निभाए। नलिनीकान्त बागची का नाम भारतीय इतिहास में सदैव सम्मान, गर्व और कृतज्ञता के साथ लिया जाता रहेगा। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

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