
नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट

कॉरपोरेट जगत में ड्रेस कोड और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। Lenskart की कथित ड्रेस कोड गाइडलाइन सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद कंपनी आलोचनाओं के घेरे में आ गई है। यह विवाद Tata Consultancy Services (TCS) के नासिक HR पॉलिसी विवाद के बाद सामने आया, जिससे बहस और तेज हो गई है।
विवाद का केंद्र बिंदु
सोशल मीडिया पर वायरल एक कथित “ग्रूमिंग गाइड” में दावा किया गया कि:
- हिजाब पहनने की अनुमति दी गई है
- जबकि बिंदी, तिलक और कलावा जैसे हिंदू धार्मिक प्रतीकों पर रोक का उल्लेख है
इस दस्तावेज़ के सामने आते ही लोगों ने इसे धार्मिक भेदभाव का मामला बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी। कई यूजर्स ने सवाल उठाया कि क्या कॉरपोरेट नीतियां किसी एक धर्म के प्रति पक्षपाती हो सकती हैं।
कंपनी की सफाई
विवाद बढ़ने के बाद Peyush Bansal, जो लेंसकार्ट के फाउंडर और CEO हैं, ने सामने आकर स्थिति स्पष्ट की।
उन्होंने कहा:
- वायरल दस्तावेज़ पुराना और अप्रासंगिक है
- वर्तमान नीति में किसी भी धर्म विशेष के प्रतीकों पर प्रतिबंध नहीं है
- कंपनी सभी कर्मचारियों के लिए समान और समावेशी नियम लागू करती है
साथ ही उन्होंने इस भ्रम के लिए सार्वजनिक रूप से खेद भी जताया।
सोशल मीडिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया
यह मुद्दा सोशल मीडिया पर तेजी से ट्रेंड करने लगा।
- Shehzad Poonawalla समेत कई नेताओं ने इसे हिंदू संस्कृति पर हमला बताया
- #HinduRights और #ReligiousFreedom जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे
- कुछ यूजर्स ने इसे TCS और अन्य मामलों से जोड़कर “पैटर्न” करार दिया
विवाद के असर से Tata Consultancy Services ने नासिक ऑफिस को अस्थायी रूप से बंद कर वर्क फ्रॉम होम लागू करने का फैसला भी लिया।
गहराता मुद्दा: कॉरपोरेट नीतियां बनाम धार्मिक स्वतंत्रता
यह पूरा विवाद एक बड़े सवाल को जन्म देता है—
क्या कॉरपोरेट ड्रेस कोड धार्मिक पहचान को सीमित कर सकता है?
विशेषज्ञों के अनुसार:
- ड्रेस कोड का उद्देश्य प्रोफेशनलिज़्म बनाए रखना होता है
- लेकिन यदि नियम असंतुलित या अस्पष्ट हों, तो वे विवाद और विभाजन पैदा कर सकते हैं
- कंपनियों को चाहिए कि वे पारदर्शी, समान और संवेदनशील नीतियां बनाएं
लेंसकार्ट ड्रेस कोड विवाद ने यह साफ कर दिया है कि आज के दौर में कॉरपोरेट निर्णय केवल आंतरिक नीति नहीं रहते, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं।
ऐसे में कंपनियों के लिए जरूरी है कि वे:
- स्पष्ट और अपडेटेड गाइडलाइंस जारी करें
- कर्मचारियों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें
- और किसी भी भ्रम की स्थिति में तुरंत पारदर्शी संवाद करें
यह विवाद फिलहाल शांत होता दिख रहा है, लेकिन इससे उठे सवाल आने वाले समय में कॉरपोरेट नीतियों को जरूर प्रभावित करेंगे।














