- भाषाई गुलामी और मानसिक पराधीनता: अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी का वर्चस्व क्यों एक ज्वलंत प्रश्न है?
स्वतंत्रता दिवस पर विशेष: “हमें अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गई, लेकिन सांस्कृतिक और भाषाई पराधीनता से मुक्ति आज भी अधूरी है।” यह कथन आज के आधुनिक भारत के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जिससे आँखें मूंदना अब संभव नहीं रहा है। सन् 1947 में जब भारत ने विदेशी शासन की बेड़ियों को तोड़ा था, तब यह उम्मीद की जा रही थी कि सदियों से दबी और कुचली गई हमारी स्वदेशी भाषाएं, संस्कृति और सभ्यता अपनी वास्तविक गरिमा को पुनः प्राप्त करेंगी।
संविधान निर्माताओं ने दूरदर्शिता दिखाते हुए हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को भी सम्मानित स्थान दिया। परंतु विडंबना यह है कि आज़ादी के अमृतकाल में भी हमारे देश की रग-रग में अंग्रेजी भाषा और उसकी संस्कृति इस तरह पैठ बना चुकी है कि स्वदेशी भाषा में बात करना या लिखना कई जगहों पर ‘पिछड़ेपन’ की निशानी मान लिया गया है। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर राष्ट्रभक्ति के गीत गाते हुए या राष्ट्र को संबोधित करते हुए अंग्रेजी में भाषण देना, और तथाकथित आधुनिकता के नाम पर इसे अपनी शान समझना—क्या यह हमारी मानसिक गुलामी का जीता-जा जागता प्रमाण नहीं है?
जब हमारे पूर्वजों ने विदेशी हुक्मफिरमों को देश से खदेड़ दिया, तो उनकी भाषा को सिर पर बिठाकर रखना आखिर कौन सी राष्ट्रभक्ति है? यह आलेख इसी अत्यंत ज्वलंत, संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय पर गहराई से विचार करने का एक प्रयास है, जिसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं, बल्कि आत्मમंथन के लिए समाज को प्रेरित करना है।
1. भाषा: केवल संवाद का साधन नहीं, अस्मिता का प्रतीक है
भाषा केवल अपने विचारों को दूसरों तक पहुँचाने का माध्यम नहीं होती; भाषा किसी भी समाज की संस्कृति, उसकी आचार-संहिता, उसकी सोच और उसकी सामूहिक चेतना की संवाहक होती है। जब कोई राष्ट्र अपनी भाषा को छोड़कर किसी अन्य देश की भाषा को अपनी श्रेष्ठता का पैमाना बना लेता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी मौलिकता और सांस्कृतिक स्वतंत्रता को खो देता है।
मैकाले की उस शिक्षा पद्धति का भूत आज भी हमारे शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और अभिजात वर्ग के सिर पर चढ़कर बोल रहा है, जिसका उद्देश्य बाबू (क्लर्क) तैयार करना था, न कि स्वतंत्र विचारक। आज स्थिति यह है कि जिस देश में तुलसी, कबीर, सूर, कालिदास, और मीरा की वाणी गूंजती थी, वहाँ की युवा पीढ़ी अपनी ही मातृभाषा में बात करने में संकोच महसूस करती है।
स्वतंत्रता दिवस और हिंदी दिवस पर अंग्रेजी का विडंबनापूर्ण प्रयोग
यह बेहद विडंबनापूर्ण और आत्मघाती है कि जब हम 15 अगस्त को अपना स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तो देश के बड़े-बड़े शिक्षण संस्थानों, कॉर्पोरेट कार्यालयों और मंचों पर देशभक्ति के भाषण अंग्रेजी में दिए जाते हैं। जो जनता हिंदी या अपनी मातृभाषा में समझती है, उसके सामने अंग्रेजी में भाषण झाड़ना अपनी ही जनता से संवाद तोड़ने जैसा है।
इससे भी बड़ा विरोधाभास हिंदी दिवस के अवसर पर देखने को मिलता है। जिस दिन हमें हिंदी भाषा के सम्मान, उसके संवर्धन और उसके प्रचार-प्रसार का संकल्प लेना चाहिए, उसी दिन कई मंचों पर विद्वान और वक्ता अंग्रेजी भाषा में यह समझाते नजर आते हैं कि “हिंदी का विकास कैसे हो।” जिस भाषा को आप अपने सम्मान का मुख्य केंद्र नहीं बना सकते, उसके विकास का दिखावा करना केवल ढकोसला प्रतीत होता है।
2. चीन का उदाहरण: गुलामी के हर प्रतीक का सफाया
लेख में उल्लिखित चीन का दृष्टांत इस संदर्भ में बहुत सटीक और सीखने योग्य है। चीन भी अफीम युद्धों और औपनिवेशिक ताकतों के प्रभाव के कारण लंबे समय तक पश्चिमी और जापानी प्रभावों के अधीन रहा, और कई मायनों में अर्ध-औपनिवेशिक स्थिति का सामना करता रहा। परंतु जब चीन ने अपनी आंतरिक व्यवस्था को सुधारा और अपनी स्वायत्तता हासिल की, तो उसने सबसे पहले अपनी सांस्कृतिक और भाषाई अस्मिता को पुनर्जीवित किया।
- भाषा पर एकाधिकार: चीन ने अपनी शिक्षा व्यवस्था, प्रशासन और विज्ञान की उच्च शिक्षा को पूरी तरह से अपनी भाषा (मैंडरिन/चीनी) में ढाला। आज चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक और तकनीकी महाशक्ति है, और उसने यह मुकाम अंग्रेजी की बैसाखी के बिना हासिल किया है। चीन में अंतरिक्ष विज्ञान से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक की पढ़ाई उनकी अपनी भाषा में होती है।
- गुलामी के प्रतीकों का विनाश: चीन ने अपने देश से औपनिवेशिक काल के उन तमाम प्रतीकों, नामों और भवनों को या तो हटा दिया या उन्हें अपने राष्ट्रीय गौरव के अनुकूल ढाल लिया। उनके यहाँ सड़कों, चौराहों और संस्थाओं के नाम उनकी अपनी संस्कृति और इतिहास को दर्शाते हैं।
- आत्मसम्मान सर्वोपरि: चीनी समाज यह मानता है कि यदि आपको आगे बढ़ना है, तो आपको अपनी जड़ों से जुड़े रहना होगा। वे विदेशी तकनीक और विज्ञान को जरूर अपनाते हैं, लेकिन अपनी संस्कृति और भाषा के साथ कोई समझौता नहीं करते।
इसके विपरीत, भारत में आज भी अंग्रेजों के नाम पर बनी सड़कें, लॉर्ड-मेयर के जमाने के कानून, और अंग्रेजीयत की अंधी दौड़ हमारे तंत्र में गहराई तक समाई हुई है। हमें चीन की इस राष्ट्रवादी और व्यावहारिक सोच से सीख लेनी चाहिए कि राष्ट्र निर्माण के लिए अपनी भाषा का स्वाभिमान कितना अनिवार्य है।
3. मानसिक गुलामी के विविध रूप और हमारा समाज
भाषा की यह गुलामी केवल बोलचाल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमारे पूरे सामाजिक ताने-बाने और सोच को जकड़ रखा है।
क. शिक्षा व्यवस्था का दोहरे मापदंड वाला स्वरूप
हमारे देश में शिक्षा का स्तर इस बात से आंका जाता है कि बच्चा किस ‘इंग्लिश मीडियम’ स्कूल में पढ़ता है। यदि कोई बच्चा हिंदी या क्षेत्रीय भाषा के सरकारी स्कूल से पढ़ा है, तो समाज और तथाकथित आधुनिक बुद्धिजीवी वर्ग उसे हीनता की दृष्टि से देखता है। उच्च शिक्षा, खासकर मेडिकल, इंजीनियरिंग, और कानून (लॉ) के क्षेत्र में आज भी अंग्रेजी का ऐसा चक्रव्यूह रचा गया है कि आम भाषा जानने वाला प्रतिभावान छात्र पिछड़ जाता है। क्या मेधा या बुद्धिमत्ता का पैमाना केवल अंग्रेजी भाषा पर अधिकार होना है? यह सवाल आज देश के हर जिम्मेदार नागरिक को पूछना चाहिए।
ख. न्यायपालिका और प्रशासन में विदेशी भाषा की दीवार
भारत के न्यायालयों में आज भी अंग्रेजी का साम्राज्य है। आम गरीब किसान, मजदूर या नागरिक, जिसे संविधान की भाषा तो दूर, न्याय की भाषा भी समझ नहीं आती, वह अपनी ही अदालत में न्याय की भीख मांगते समय बेगाना महसूस करता है। जिस देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक जनता अंग्रेजी नहीं जानती, उस देश के न्यायालयों और प्रशासनिक कार्यालयों में अंग्रेजी को अनिवार्य बनाए रखना क्या जनता के साथ अन्याय नहीं है? कई उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय या राजभाषा के प्रयोग को लेकर जो संकोच दिखाया जाता है, वह इस व्यवस्था की संकीर्णता को दर्शाता है।
ग. कॉर्पोरेट जगत और सामाजिक प्रतिष्ठा का छलावा
आज के कॉर्पोरेट सेक्टर में अंग्रेजी बोलना केवल काम की जरूरत नहीं, बल्कि एक ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। यदि कोई व्यक्ति सूट-बूट पहनकर फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है, तो उसे अधिक बुद्धिमान और पेशेवर मान लिया जाता है, भले ही उसके पास वैचारिक गहराई न हो। इसके विपरीत, अपनी मातृभाषा में शालीनता से बात करने वाले व्यक्ति को कई बार कमतर आंका जाता है। यह मानसिक विकृति इस बात का प्रमाण है कि हम शारीरिक रूप से भले ही आज़ाद हो चुके हैं, लेकिन हमारी सोच अभी भी ब्रिटिश राज के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाई है।
4. क्या अंग्रेजी का विरोध करना तर्कसंगत है? (एक व्यावहारिक दृष्टिकोण)
इस बहस के दौरान यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि भाषा की गुलामी के खिलाफ आवाज़ उठाने का अर्थ अंग्रेजी भाषा के प्रति अज्ञानता या हठधर्मिता नहीं है।
- ग्लोबल विलेज की जरूरत: आज की वैश्वीकृत दुनिया (Globalization) में अंग्रेजी एक ‘ग्लोबल लैंग्वेज’ या संपर्क भाषा बन चुकी है। विज्ञान, तकनीकी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और कूटनीति के लिए अंग्रेजी का ज्ञान होना एक अतिरिक्त योग्यता (Skill) हो सकता है।
- माध्यम बनाम आधिपत्य: अंग्रेजी सीखनी चाहिए, उसे एक उपकरण (Tool) के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए, न कि उसे अपनी संस्कृति और मातृभाषा के ऊपर बिठाकर अपनी पहचान को ही मिटा देना चाहिए। समस्या अंग्रेजी भाषा से नहीं है, बल्कि उस मानसिकता से है जो यह मानती है कि अंग्रेजी के बिना व्यक्ति या राष्ट्र अधूरा है।
- जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन जैसे देश दुनिया भर की तकनीक अपनाते हैं, लेकिन वे अपनी ही भाषा में शिक्षा और कामकाज करते हैं। क्या वे दुनिया में पीछे हैं? बिल्कुल नहीं। वे अपनी शर्तों पर आगे बढ़ते हैं, जबकि हम दूसरों की भाषा को ओढ़कर आगे बढ़ने का दिखावा करते हैं।
5. समाधान और आगे की राह
इस भाषाई और मानसिक गुलामी की बेड़ियों को काटने के लिए हमें सामूहिक और नीतिगत स्तर पर कड़े कदम उठाने होंगे:
- शिक्षा नीति में क्रांतिकारी बदलाव: प्राथमिक और उच्च शिक्षा दोनों स्तरों पर मातृभाषा और राजभाषा हिंदी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा का पाठ्यक्रम हमारी अपनी भाषाओं में उपलब्ध कराया जाना चाहिए, जैसा कि अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत कुछ हद तक प्रयास शुरू भी हुआ है।
- न्याय और प्रशासन में स्वदेशी भाषाओं का विस्तार: अदालतों के फैसले स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध कराए जाने चाहिए ताकि आम आदमी को न्याय की प्रक्रिया समझ आ सके। सरकारी कामकाज में राजभाषा के प्रयोग को केवल औपचारिकता न बनाकर एक अनिवार्य नियम बनाया जाना चाहिए।
- आत्मसम्मान की सांस्कृतिक पुनरुत्थान: समाज को अपनी भाषा बोलने में गर्व महसूस करना चाहिए। सोशल मीडिया, मीडिया, और सार्वजनिक मंचों पर हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी मातृभाषा का सम्मान नहीं करता, वह राष्ट्र का सच्चा सम्मान नहीं कर सकता।
- पाखंड का त्याग: स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और हिंदी दिवस जैसे अवसरों पर केवल औपचारिकता निभाने के बजाय हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि हम अपने दैनिक जीवन में अपनी भाषा को कितना स्थान दे रहे हैं।
निष्कर्ष
आज़ादी का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासकों का जाना नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी भाषा और अपने विचारों पर गर्व करना है। अंग्रेजों को देश से बाहर निकालना हमारी ऐतिहासिक जीत थी, परंतु उनके द्वारा बोई गई मानसिक और भाषाई गुलामी के बीजों को उखाड़ फेंकना आज के दौर की सबसे बड़ी मांग है।
हमें यह समझना होगा कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा के बिना महान नहीं बन सकता। जिस दिन भारत का हर नागरिक अपनी भाषा में सोचने, पढ़ने, विज्ञान रचने और गर्व से संवाद करने लगेगा, उसी दिन हमारी स्वतंत्रता अपने पूर्ण और वास्तविक रूप को प्राप्त करेगी। समय आ गया है कि हम चीन जैसे राष्ट्रों से सीख लेकर अपनी जड़ों की ओर लौटें और भाषाई पराधीनता के इस दौर को हमेशा के लिए समाप्त करें।


















