नई दिल्ली। Hepatitis दुनिया की उन गंभीर बीमारियों में शामिल है जो हर साल लाखों लोगों को प्रभावित करती हैं। यह बीमारी धीरे-धीरे लिवर (यकृत) को नुकसान पहुंचाती है और समय पर इलाज न मिलने पर लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और लिवर कैंसर जैसी जानलेवा समस्याओं का कारण बन सकती है। भारत में भी यह एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है। इसी को देखते हुए केंद्र सरकार ने वर्ष 2018 में नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम (NVHCP) की शुरुआत की थी।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशभर में हेपेटाइटिस की रोकथाम, समय पर जांच, मुफ्त इलाज और लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या के रूप में समाप्त करना है। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं को गांव-गांव तक पहुंचाया जा रहा है और कई राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं को भी इस अभियान से जोड़ा गया है।
क्या है हेपेटाइटिस (Hepatitis)?
हेपेटाइटिस (Hepatitis) एक ऐसी बीमारी है जिसमें लिवर में सूजन आ जाती है। यह सूजन मुख्य रूप से वायरस के संक्रमण के कारण होती है, लेकिन कई बार शराब का अधिक सेवन, जहरीली दवाएं, नशीले पदार्थ और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी बीमारियां भी इसका कारण बन सकती हैं।
Hepatitis वायरस पांच प्रकार के होते हैं – Hepatitis A, B, C, D और E। इनमें हेपेटाइटिस B और C सबसे ज्यादा खतरनाक माने जाते हैं क्योंकि ये लंबे समय तक शरीर में रहकर लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं।
कैसे फैलता है हेपेटाइटिस (Hepatitis)?
हर प्रकार का Hepatitis अलग-अलग तरीके से फैलता है।
Hepatitis A और E मुख्य रूप से दूषित भोजन और गंदे पानी के सेवन से फैलते हैं। जहां साफ-सफाई की कमी होती है या पीने का पानी सुरक्षित नहीं होता, वहां इनका खतरा अधिक रहता है।
Hepatitis B संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर के तरल पदार्थ, असुरक्षित यौन संबंध या जन्म के समय मां से बच्चे में फैल सकता है।
Hepatitis C अधिकतर संक्रमित खून, असुरक्षित इंजेक्शन, एक ही सुई का कई लोगों द्वारा उपयोग करने या संक्रमित रक्त चढ़ाने से फैलता है।
Hepatitis D केवल उन्हीं लोगों में होता है जिन्हें पहले से हेपेटाइटिस B का संक्रमण हो।
बीमारी से बचाव कैसे करें?
विशेषज्ञों का कहना है कि थोड़ी-सी सावधानी बरतकर हेपेटाइटिस से काफी हद तक बचा जा सकता है।
हमेशा साफ और उबला हुआ या शुद्ध पानी पीना चाहिए। भोजन बनाने और खाने से पहले हाथ अच्छी तरह धोना चाहिए। खुले में बिकने वाले दूषित भोजन से बचना चाहिए।
Hepatitis B से बचाव के लिए टीका सबसे प्रभावी उपाय है। सरकार के यूनिवर्सल इम्यूनाइजेशन प्रोग्राम के तहत सभी नवजात शिशुओं को जन्म के 24 घंटे के भीतर हेपेटाइटिस B का पहला टीका लगाया जाता है। इसके बाद निर्धारित समय पर अन्य डोज भी दी जाती हैं।
इंजेक्शन हमेशा नई और सुरक्षित सुई से लगवाना चाहिए। किसी दूसरे व्यक्ति की इस्तेमाल की हुई सुई, रेजर या ब्लेड का उपयोग नहीं करना चाहिए। यदि रक्त चढ़ाने की आवश्यकता हो तो केवल जांचे हुए सुरक्षित रक्त का ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
इलाज की क्या व्यवस्था है?
Hepatitis A और E के अधिकतर मरीज बिना किसी विशेष दवा के ठीक हो जाते हैं। उन्हें पर्याप्त आराम, पौष्टिक भोजन और शरीर में पानी की कमी न होने देने की सलाह दी जाती है।
Hepatitis B के मरीजों का इलाज एंटीवायरल दवाओं से किया जाता है। वहीं Hepatitis C के इलाज में आधुनिक डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल (DAA) दवाएं काफी प्रभावी साबित हुई हैं। इन दवाओं से अधिकांश मरीज 12 से 24 सप्ताह के भीतर पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं।
भारत सरकार जरूरतमंद मरीजों को इन दवाओं और जांच की सुविधा मुफ्त उपलब्ध करा रही है।


नेशनल वायरल Hepatitis कंट्रोल प्रोग्राम की खास बातें
सरकार का यह कार्यक्रम केवल इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य बीमारी को फैलने से रोकना भी है। इसके तहत लोगों को जागरूक किया जा रहा है, समय पर जांच की सुविधा दी जा रही है और संक्रमित मरीजों को मुफ्त दवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।
देशभर में इस कार्यक्रम के अंतर्गत Hepatitis B और C की जांच तथा इलाज की व्यवस्था सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर उपलब्ध कराई गई है।
कार्यक्रम में मरीजों का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल तरीके से रखा जाता है। इसके लिए विशेष ऑनलाइन पोर्टल का उपयोग किया जा रहा है, जिससे इलाज की निगरानी और रिपोर्टिंग आसान हो गई है।
अन्य स्वास्थ्य योजनाओं से भी जुड़ा अभियान
सरकार ने Hepatitis नियंत्रण कार्यक्रम को कई अन्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं से भी जोड़ा है। गर्भवती महिलाओं की नियमित जांच के दौरान Hepatitis B की जांच भी की जाती है ताकि संक्रमण मां से बच्चे तक न पहुंचे। राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम के तहत सभी नवजात बच्चों को Hepatitis B का टीका दिया जाता है। यदि गर्भवती महिला पहले से संक्रमित हो तो उसके नवजात बच्चे को अतिरिक्त सुरक्षा के लिए Hepatitis B इम्युनोग्लोबुलिन (HBIG) भी दिया जाता है।
राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत अधिक जोखिम वाले लोगों की Hepatitis B और C की जांच की जाती है। साथ ही स्वास्थ्यकर्मियों और जोखिम वाले समूहों का टीकाकरण भी किया जाता है। राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (टीबी कार्यक्रम) की आधुनिक जांच मशीनों का उपयोग भी Hepatitis की जांच में किया जा रहा है। इससे जांच की सुविधा और तेज तथा आसान हुई है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2021 के सर्वेक्षण में भारत में लगभग 0.85 प्रतिशत लोग हेपेटाइटिस B और 0.29 प्रतिशत लोग हेपेटाइटिस C से संक्रमित पाए गए। सरल भाषा में समझें तो लगभग हर 118 लोगों में से एक व्यक्ति हेपेटाइटिस B और हर 345 लोगों में से एक व्यक्ति हेपेटाइटिस C से प्रभावित पाया गया।

हालांकि ये आंकड़े पहले की तुलना में नियंत्रण की दिशा में सुधार दिखाते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्हें अपने संक्रमण की जानकारी तक नहीं है।
गांवों तक पहुंच रही स्वास्थ्य सेवाएं
सरकार लगातार इस कार्यक्रम का विस्तार कर रही है। पहले जहां जांच और इलाज की सुविधा केवल बड़े जिला अस्पतालों तक सीमित थी, वहीं अब इसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को अपने ही इलाके में जांच और इलाज की सुविधा मिलने लगी है। इससे मरीजों का समय और खर्च दोनों बच रहे हैं।
जागरूकता सबसे बड़ा हथियार
विशेषज्ञों का मानना है कि हेपेटाइटिस जैसी बीमारी से लड़ने का सबसे प्रभावी तरीका जागरूकता है। यदि लोग साफ-सफाई रखें, सुरक्षित पानी पिएं, समय पर टीकाकरण कराएं, असुरक्षित इंजेक्शन और संक्रमित रक्त से बचें तथा किसी भी तरह के लक्षण दिखाई देने पर तुरंत जांच कराएं, तो इस बीमारी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
सरकार भी समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को सही जानकारी दे रही है। इसके अलावा कार्यक्रम के तहत एक टोल-फ्री हेल्पलाइन 1800-11-6666 भी उपलब्ध है, जहां लोग हेपेटाइटिस से जुड़ी जानकारी, जांच और इलाज के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
2030 तक बीमारी खत्म करने का लक्ष्य
भारत सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक हेपेटाइटिस को सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या के रूप में समाप्त करना है। इसके लिए जांच, मुफ्त इलाज, टीकाकरण, जागरूकता और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं पर लगातार काम किया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सभी लोग समय पर जांच कराएं, टीकाकरण करवाएं और स्वास्थ्य संबंधी सावधानियां अपनाएं, तो इस लक्ष्य को हासिल करना संभव है।
हेपेटाइटिस एक गंभीर लेकिन रोकी जा सकने वाली बीमारी है। समय पर जांच, सही इलाज और टीकाकरण से इससे होने वाले अधिकांश नुकसान को रोका जा सकता है। भारत सरकार का नेशनल वायरल हेपेटाइटिस कंट्रोल प्रोग्राम इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जो लाखों लोगों को मुफ्त जांच, दवाएं और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध करा रहा है।
यदि सरकार के प्रयासों के साथ आम जनता भी जागरूक होकर स्वच्छता, सुरक्षित जीवनशैली और समय पर स्वास्थ्य जांच को अपनाए, तो आने वाले वर्षों में भारत हेपेटाइटिस मुक्त राष्ट्र बनने की दिशा में एक मजबूत कदम आगे बढ़ा सकता है।
फैलाव का माध्यम, रोकथाम, प्रबंधन
| हेपेटाइटिस वायरस | कारण / फैलाव | रोकथाम और इलाज |
| हेपेटाइटिस ए (एचएवी) | दूषित भोजन/पानी के ज़रिए मल-मुंह मार्ग सेखराब साफ़-सफ़ाई और सुरक्षित पीने के पानी की कमी | बचाव: पीने का साफ़ पानी, साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता के उपायइलाज: आम तौर पर यह बीमारी अपने-आपठीक हो जाती है। सहायक देखभाल (हाइड्रेशन/पोषण) की ज़रूरत होती है। कोई विशेष एंटीवायरल दवा नहीं है। |
| हेपेटाइटिस बी (एचबीवी) | सबसे आम तौर पर: जन्म के समय माँ से बच्चे कोसंक्रमित खून, खून से बनी चीज़ों और शरीर के तरल पदार्थों आदि के संपर्क में आने से | बचाव: यह बीमारी वैक्सीन से रोकी जा सकती है। यूनिवर्सल इम्यूनाइज़ेशन प्रोग्राम के तहत हेपेटाइटिस बीकी वैक्सीन दी जाती है (जन्म के समय पहली डोज़ – जितनी जल्दी हो सके और निश्चित रूप से जन्म के 24 घंटे के भीतर; और फिर जन्म के 6, 10 और 14 हफ़्ते पर)।इलाज: क्रोनिक हेपेटाइटिस बीका इलाज एंटीवायरल दवाओं से किया जाता है, जो राष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुसार उपयुक्त मरीज़ों को दी जाती है। |
| हेपेटाइटिस सी (एचसीवी) | असुरक्षित इंजेक्शन/प्रक्रियाओं के दौरान खून के संपर्क में आनासुई/सिरिंज साझा करनासंक्रमित खून, खून से बने उत्पादों और शरीर के तरल पदार्थों आदि के संपर्क में आना | बचाव: नुकसान कम करने के उपाय (जैसे सुई बदलना) और सुरक्षित इंजेक्शन लगाने के तरीकों को अपनाना। हेपेटाइटिस सीसंक्रमण से बचाव के लिए कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है।इलाज: डायरेक्ट-एक्टिंग एंटीवायरल (डीएए) दवाओं के साथ पैन-जीनोटाइपिक इलाज के ज़रिए लगभग सभी मरीज़ 12-24 हफ़्तों में ठीक हो जाते हैं। |
| हेपेटाइटिस डी (एचडीवी) | संक्रमित खून, खून से बनी चीज़ों और शरीर के तरल पदार्थों आदि के संपर्क में आनासंक्रमण केवल कुछ पुराने एचबीवीवाहकों में होता है | बचाव: एचबीवीसंक्रमण को रोककर, हेपेटाइटिस बीवैक्सीन साथ ही एचडीवीसंक्रमण से भी पूरी सुरक्षा देती है। |
| हेपेटाइटिस ई (एचईवी) | दूषित भोजन/पानी के ज़रिए मल-मुंह मार्ग सेखराब साफ़-सफ़ाई और सुरक्षित पीने के पानी की कमी | बचाव: पीने का साफ़ पानी, साफ़-सफ़ाई और स्वच्छता के उपायइलाज: आम तौर पर यह बीमारी अपने-आप ठीक हो जाती है। सहायक देखभाल (हाइड्रेशन/पोषण) की ज़रूरत होती है। कोई विशेष एंटीवायरल दवा नहीं है। |




















