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आदिवासी संस्कृति नहीं आदिवासी अधिकारों की बात हो Jamshedpur में 23 मई को होगा सांकेतिक विरोध प्रदर्शन

On: May 22, 2026 7:25 PM
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जमशेदपुर: Jamshedpur में विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने 24 मई 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित होने वाले तथाकथित जनजाति सांस्कृतिक समागम का विरोध करते हुए 23 मई को साकची स्थित बिरसा चौक में सांकेतिक प्रदर्शन आयोजित करने की घोषणा की है। संगठनों का कहना है कि इस प्रकार के सांस्कृतिक आयोजन आदिवासी समाज के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने का प्रयास हैं और इनके माध्यम से आदिवासी समुदाय की वास्तविक समस्याओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।

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विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित होने वाले इस प्रदर्शन में छात्र-युवा, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी, कलाकार और आम नागरिक शामिल होंगे। प्रदर्शन को शांतिपूर्ण एवं लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित करने की बात कही गई है।

सरना धर्म कोड की मांग को लेकर केंद्र सरकार पर उठाए सवाल

संगठनों ने आरोप लगाया है कि आदिवासी समाज लंबे समय से अपनी स्वतंत्र धार्मिक पहचान के लिए सरना धर्म कोड की मांग कर रहा है, लेकिन केंद्र सरकार द्वारा इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की गई। झारखंड विधानसभा द्वारा सरना धर्म कोड से संबंधित प्रस्ताव पारित किए जाने के बावजूद इस विषय पर निर्णय नहीं लिया गया।

संगठनों का कहना है कि आदिवासी समाज की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को संवैधानिक मान्यता देने के बजाय केवल मंचीय कार्यक्रमों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से आदिवासी संस्कृति को प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे समाज के वास्तविक मुद्दे पीछे छूटते जा रहे हैं।

सिर्फ सांस्कृतिक शो से नहीं सुलझेंगी आदिवासी समाज की समस्याएं

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि बड़े-बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रमों, पारंपरिक नृत्य प्रस्तुतियों और प्रचार आधारित आयोजनों से आदिवासी समाज की समस्याओं का समाधान नहीं होगा। आदिवासी समुदाय आज भी जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, वनाधिकार, शिक्षा, बेरोजगारी और स्थानीय भाषाओं के संरक्षण जैसे गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है।

संगठनों का आरोप है कि सरकार इन मूलभूत सवालों पर गंभीरता से काम करने के बजाय सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से आदिवासी समाज को प्रतीकात्मक रूप से प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही है। इससे समुदाय की सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मांगें कमजोर पड़ रही हैं।

आदिवासी पहचान को लेकर संगठनों ने रखा स्पष्ट पक्ष

विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज की पहचान केवल पारंपरिक पोशाक, नृत्य और सांस्कृतिक उत्सवों तक सीमित नहीं है। आदिवासी जीवन-दर्शन प्रकृति आधारित संस्कृति, सामुदायिक जीवन, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और अलग धार्मिक मान्यताओं से जुड़ा हुआ है।

संगठनों ने कहा कि आदिवासी समुदाय की अस्मिता और अस्तित्व को समझे बिना केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन आयोजित करना समाज के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने जैसा है। आदिवासी समाज अपनी पहचान और अधिकारों को लेकर लंबे समय से संघर्ष कर रहा है और इस संघर्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

पेसा कानून और वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग

प्रदर्शनकारी संगठनों ने सरकार से पेसा कानून और वनाधिकार कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की मांग भी उठाई है। उनका कहना है कि आदिवासी बहुल क्षेत्रों में ग्राम सभा के अधिकारों को मजबूत करने और स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी देने की आवश्यकता है।

इसके साथ ही विस्थापन, खनन परियोजनाओं, वन भूमि अधिकार और स्थानीय संसाधनों पर समुदाय के अधिकार को लेकर भी चिंता जताई गई। संगठनों ने कहा कि यदि सरकार वास्तव में आदिवासी समाज के सम्मान और विकास की चिंता करती है तो उसे इन मुद्दों पर प्राथमिकता के आधार पर कार्य करना चाहिए।

स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत संरक्षण पर भी जोर

आदिवासी संगठनों ने स्थानीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि कई आदिवासी भाषाएं और पारंपरिक ज्ञान प्रणाली धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही हैं। सरकार को स्थानीय भाषाओं को शिक्षा और प्रशासनिक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए ठोस नीति बनानी चाहिए।

संगठनों ने कहा कि संस्कृति का संरक्षण केवल मंचीय कार्यक्रमों से नहीं, बल्कि भाषा, परंपरा, इतिहास और सामाजिक व्यवस्था को संरक्षित करने से संभव है।

23 मई को बिरसा चौक में होगा सांकेतिक प्रदर्शन

विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने घोषणा की है कि 23 मई 2026 को शाम 5 बजे साकची स्थित बिरसा चौक में सांकेतिक विरोध प्रदर्शन आयोजित किया जाएगा। इस प्रदर्शन के माध्यम से आदिवासी अस्मिता, सरना धर्म कोड और संवैधानिक अधिकारों की मांग को मजबूत तरीके से उठाया जाएगा।

प्रदर्शन को लेकर प्रशासन को पूर्व सूचना दिए जाने की बात भी कही गई है ताकि कार्यक्रम शांतिपूर्ण तरीके से सम्पन्न हो सके और विधि-व्यवस्था बनी रहे।

कोल्हान क्षेत्र के नागरिकों से शामिल होने की अपील

संगठनों ने कोल्हान क्षेत्र के नागरिकों, युवाओं, छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से इस आंदोलन में शामिल होने की अपील की है। उनका कहना है कि यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि आदिवासी पहचान, अधिकार और संवैधानिक मान्यता की लड़ाई है।

उन्होंने कहा कि समाज की एकजुटता ही आदिवासी समुदाय की आवाज को मजबूत बना सकती है। इसलिए अधिक से अधिक लोगों से बिरसा चौक पहुंचकर अपनी एकजुटता दर्ज कराने का आह्वान किया गया है।

लोकतांत्रिक तरीके से उठेगी आदिवासी अधिकारों की आवाज

संगठनों ने स्पष्ट किया कि यह विरोध प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से आयोजित किया जाएगा। प्रदर्शन का उद्देश्य समाज के मुद्दों को सरकार और आम जनता तक पहुंचाना है, ताकि आदिवासी समुदाय की वास्तविक समस्याओं और मांगों पर गंभीर चर्चा हो सके।

Jamshedpur और कोल्हान क्षेत्र में इस प्रदर्शन को लेकर सामाजिक संगठनों और युवाओं के बीच व्यापक चर्चा शुरू हो गई है। आदिवासी अधिकार, सरना धर्म कोड और सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में आता दिखाई दे रहा है।

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