
करीम सिटी: जमशेदपुर के Karim सिटी कॉलेज में उर्दू विभाग ने मशहूर उर्दू कहानीकार ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ पर एक शानदार संगोष्ठी का आयोजन किया। यह कार्यक्रम ज़की अनवर की शहादत की सालगिरह पर हुआ, जो उर्दू प्रगतिशील साहित्य के लिए एक यादगार मौका साबित हुआ। इस संगोष्ठी में छात्रों, प्राध्यापकों और विद्वानों ने उनकी रचनाओं और जीवन पर गहन चर्चा की। अगर आप उर्दू साहित्य के शौकीन हैं, तो ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ जानना आपके लिए बेहद रोचक होगा। आइए, इस संगोष्ठी की पूरी कहानी और ज़की अनवर के जीवन को विस्तार से समझते हैं।

ज़की अनवर का जीवन परिचय एक प्रगतिशील कथाकार की कहानी
ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ को समझने से पहले उनके जीवन की झलक देखें। ज़की अनवर का जन्म 1927 में उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ में हुआ था। वे उर्दू साहित्य के उस दौर के प्रमुख हस्ताक्षर थे जब प्रगतिशील लेखक आंदोलन अपने चरम पर था। उनका असली नाम ज़की अनवर था, लेकिन वे ज़की साहब के नाम से मशहूर हुए। युवावस्था में ही वे कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े और मजदूर-किसान आंदोलनों में सक्रिय रहे। उनकी कहानियाँ समाज के दबे-कुचले वर्गों की पीड़ा को बयान करती हैं।
Karim ज़की अनवर ने कुल 100 से ज़्यादा कहानियाँ लिखीं, जिनमें ‘गुलमोहर के फूल’, ‘अंधेरे में’, ‘मज़दूर’ जैसी रचनाएँ शामिल हैं। उनकी रचनाएँ सामंतवाद, पूँजीवाद और सामाजिक अन्याय के ख़िलाफ़ विद्रोह का प्रतीक हैं। 1948 में तेलंगाना किसान विद्रोह में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया। जेल से रिहा होने के बाद भी वे लेखन और आंदोलन से नहीं डरे। आख़िरकार, 19 अप्रैल 1984 को उनकी शहादत हुई, जब वे साम्प्रदायिक दंगों में मारे गए। ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ उनकी विचारधारा और बलिदान की गवाही देते हैं। करीम सिटी कॉलेज की संगोष्ठी ने इन्हीं पहलुओं को उजागर किया।
Karim सिटी कॉलेज संगोष्ठी का आयोजन एक साहित्यिक उत्सव
11 अप्रैल 2026 को जमशेदपुर के Karim सिटी कॉलेज के उर्दू विभाग ने ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ विषय पर संगोष्ठी आयोजित की। यह कार्यक्रम ज़की अनवर की शहादत की सालगिरह पर हुआ, जो युवा पीढ़ी को उनके योगदान से जोड़ने का बेहतरीन प्रयास था। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ और प्राध्यापक उपस्थित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत छात्रा सबीहा फिरदौस ने पवित्र कुरान की तिलावत से की, जो माहौल को आध्यात्मिक बनाया।
उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. शाहबाज़ अंसारी ने अध्यक्षता संभाली। प्रो. मुहम्मद ईसा (गौहर अज़ीज़) ने उर्दू साहित्य में ज़की अनवर के मुकाम पर व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि ज़की अनवर ने उर्दू को प्रगतिशीलता का नया आयाम दिया। छात्राओं आयशा फिरदौस, महफूज अंसारी और सदफ अत्तारिया ने विषय पर पर्चे प्रस्तुत किए और उनकी चुनिंदा कहानियाँ पढ़ीं। मुख्य अतिथि डॉ. एस. सी. गुप्ता, हिंदी विभागाध्यक्ष और हिंदी-उर्दू साझा संस्कृति के विचारक ने “ज़की अनवर और प्रगतिशील आंदोलन” पर बोलते हुए कहा कि ज़की अनवर ने विचारों को जीवन में उतारा, जो उनकी शहादत का कारण बना। अंत में डॉ. सादिक इकबाल ने धन्यवाद ज्ञापित किया। यह संगोष्ठी ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ को जीवंत करने वाली साबित हुई।

Karim संगोष्ठी के मुख्य बिंदु और चर्चाएँ
संगोष्ठी में कई दिलचस्प चर्चाएँ हुईं। प्रो. ईसा ने ज़की अनवर की कहानी ‘गुलमोहर के फूल’ का विश्लेषण किया, जिसमें किसानों की बदहाली को दर्शाया गया है। आयशा फिरदौस ने उनकी छोटी कहानियों पर फोकस करते हुए कहा कि ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। महफूज अंसारी ने प्रगतिशील आंदोलन के संदर्भ में उनके योगदान को रेखांकित किया। डॉ. गुप्ता ने हिंदी-उर्दू एकता पर जोर देते हुए बताया कि ज़की अनवर जैसे लेखक दोनों भाषाओं को जोड़ते हैं। छात्रों ने सवाल-जवाब सत्र में सक्रिय भाग लिया, जो संगोष्ठी को और जीवंत बनाया। कुल मिलाकर, यह आयोजन उर्दू विभाग की सक्रियता का प्रतीक था।
ज़की अनवर की प्रमुख रचनाएँ सामाजिक चेतना का आईना
ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ का एक बड़ा हिस्सा उनकी कहानियों से जुड़ा है। उनकी पहली कहानी संग्रह ‘गुलमोहर के फूल’ (1952) ने उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। इसमें वे भूमिहीन किसानों की पीड़ा बयान करते हैं। ‘अंधेरे में’ संग्रह में शहरी गरीबी और मज़दूर संघर्ष दिखता है। ‘मज़दूर’ कहानी तो प्रगतिशील साहित्य का मानक बन गई।
उनकी रचनाओं की खासियत सरल भाषा और गहरी संवेदना है। वे कभी-कभी व्यंग्य का सहारा लेते, जैसे ‘साहब बीबी गुलाम’ में। ज़की अनवर ने उपन्यास भी लिखे, लेकिन कहानियाँ ही उनकी ताकत हैं। संगोष्ठी में पढ़ी गई कहानियाँ ने श्रोताओं को भावुक कर दिया। आज के दौर में, जब सामाजिक असमानता बढ़ रही है, ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ हमें सोचने पर मजबूर करती हैं। उनकी रचनाएँ अनुवादित होकर हिंदी, अंग्रेजी में उपलब्ध हैं, जो उनकी व्यापक अपील दिखाती हैं।

प्रगतिशील आंदोलन में ज़की अनवर का योगदान
प्रगतिशील लेखक संघ (1936) से जुड़े ज़की अनवर ने प्रेमचंद, सआदत हसन मंटो और फैज़ अहमद फैज़ जैसे लेखकों से प्रेरणा ली। तेलंगाना आंदोलन में उनकी सक्रियता ने उन्हें क्रांतिकारी बनाया। डॉ. गुप्ता ने संगोष्ठी में कहा कि ज़की अनवर विचारों के लिए शहीद हुए। उनका जीवन उनकी रचनाओं का जीता-जागता प्रमाण है। आज उर्दू साहित्य में वे एक मील का पत्थर हैं।
उर्दू साहित्य में ज़की अनवर की प्रासंगिकता आज
आज के समय में ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ क्यों महत्वपूर्ण? क्योंकि उनकी कहानियाँ किसान आंदोलनों, मज़दूर हड़तालों और साम्प्रदायिक सद्भाव पर बोलती हैं। Karim सिटी कॉलेज जैसी संस्थाएँ युवाओं को इससे जोड़ रही हैं। ऐसे आयोजन उर्दू को जीवित रखते हैं। जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर में यह संगोष्ठी मज़दूर वर्ग से जुड़ी रचनाओं को प्रासंगिक बनाती है।

यदि आप ज़की अनवर पढ़ना चाहें, तो उनके संग्रह ‘गुलमोहर के फूल’ से शुरू करें। ये रचनाएँ नेट पर उपलब्ध हैं और पुस्तकालयों में मिलेंगी। ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ हमें सिखाती हैं कि साहित्य सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि जीवन बदलने वाली ताकत है।
Karim सिटी कॉलेज की यह संगोष्ठी ज़की अनवर: जीवन और रचनाएँ को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का शानदार प्रयास था। ज़की अनवर जैसे लेखक साहित्य को हथियार बनाते हैं। उनकी कहानियाँ हमें समाज बदलने की प्रेरणा देती हैं। उर्दू विभाग के इस आयोजन से साबित होता है कि साहित्यिक कार्यक्रम कितने जीवंत हो सकते हैं।














