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… जिंदगी से फिर ये वर्ष भी हो चली है जुदा।। विदा होते वर्ष 2025 की भावनात्मक गाथा

On: December 23, 2025 5:10 PM
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आत्मकथ्य : यह रचना केवल शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि एक पूरे वर्ष का आत्मकथ्य है—जहाँ समय, अनुभव और संवेदनाएँ एक-दूसरे में घुलकर जीवन का यथार्थ सामने रख देती हैं। करुणामय मंडल के शब्दों में बीता हुआ साल – 2025 एक जीवंत साथी की तरह है जो अब विदा लेता प्रतीत होता है, जिसने सुख-दुःख, आशा-निराशा, प्रेम-प्रतिस्पर्धा—सब कुछ अपने भीतर समेट रखा है।

लेखक के विचारों की आत्मा

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इस भावनात्मक लेख में लेखक यह स्वीकार करते हैं कि—

  • जीवन सरल नहीं है, यहाँ धूप भी है और छाँव भी।
  • खुशी और ग़म स्थायी नहीं, दोनों का आना-जाना बना रहता है।
  • समाज में झूठ, धोखा और फरेब जितने प्रबल हैं, उतनी ही मजबूती से स्नेह, सेवा और सम्मान भी मनुष्य को जीवित रखते हैं।

लेखक ने बड़े ही सहज शब्दों में यह दर्शाया है कि प्रतिस्पर्धा कब प्रतिशोध में बदल जाती है, और कैसे हर व्यक्ति इस दुनिया को अपने-अपने दृष्टिकोण से परखता है। रोजगार से लेकर राजनीति तक—हर क्षेत्र में संघर्ष है, और प्रेम या धन—कुछ भी आसानी से नहीं मिलता

आइये इस कविता को पढ़ते हैं –

“वर्ष का यह अंतिम माह
हो चली है विदा।
जिंदगी से फिर ये वर्ष भी
हो चली है जुदा।।


आशा निराशा सुख दुःख
भरी रही सालभर।
कितने खोए कितने पाए
खास नहीं है खबर।।


धूप छांव की ये जिंदगी
इतनी भी आसान नहीं।
कभी खुशी कभी गम
हर वक्त समान नहीं।।


झूठ धोंखें फरेब जंहा
सदैव टांगें खींची है।
स्नेह सम्मान सेवा सदा
नई शक्ति से सींची है।।


प्रतिस्पर्धा से प्रतिशोध तक
सब की सूरत देखी है।
सब ने इस दुनिया को
अपने ढंग से आंकी है।।


रोजगार से राजनीति तक
सब ने शिकार बनाया है।
जीवन में प्रेम हो या पैसा
कौन आसानी से पाया है?


बीत गई है हर लम्हें यंहा
बड़ी ही तेज रफ्तार से।
उम्मीदी नाउम्मीदी की
प्यार और तकरार से।।


चंद दिनों की साथ बची है
फिर तुम से रुकसत है।
बनी रहेगी यादगार मेरी
साथी तेरी जो मुहब्बत है।।”

  • करुणामय मंडल
    पूर्व जिला पार्षद पोटका
    पूर्वी सिंहभूम झारखंड
    9693623151
    प्रस्तुति – 22/12/2025
    प्रात: – 6.21 मिनट।

समय की तेज़ रफ़्तार और मानवीय अनुभूति

कविता का सबसे सशक्त भाव यह है कि समय बहुत तेज़ी से निकल जाता है, और पीछे छोड़ जाता है—यादें, अनुभव और कुछ अधूरे सवाल। उम्मीद और नाउम्मीद, प्यार और तकरार—इन सबके बीच जीवन अपनी गति से चलता रहता है।

विदाई में भी अपनापन

अंतिम पंक्तियाँ वर्ष से विदाई नहीं, बल्कि एक आत्मीय संवाद हैं— जहाँ लेखक यह कहता है कि कुछ ही दिन साथ बचे हैं, फिर बिछड़ना तय है, लेकिन साथ निभाई गई मुहब्बत और अनुभव यादगार बने रहेंगे

यह रचना हमें सिखाती है कि—

जीवन में सब कुछ हमारे नियंत्रण में नहीं होता,
पर हर अनुभव हमें कुछ न कुछ देकर जाता है।

यह लेख आत्ममंथन, स्वीकार्यता और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। विदा होते वर्ष के साथ लेखक ने अपने मन की परतें खोल दी हैं—और पाठक को भी यह अवसर दिया है कि वह अपने बीते साल को एक पल ठहरकर महसूस कर सके।

यह भावनात्मक प्रस्तुति संवेदनशील मन और गहन जीवन-बोध की सशक्त अभिव्यक्ति है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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