
झारखंड: हाईकोर्ट में Pesa नियमावली की मूल भावना से खिलवाड़ को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई हुई है। माननीय मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सोनाक और न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार को बिंदुवार जवाब दाखिल करने का सख्त निर्देश दिया है। यह मामला न सिर्फ संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का है, बल्कि स्थानीय समुदायों की स्वायत्तता को बचाने का भी।

Pesa नियमावली क्या है? मूल भावना समझिए
Pesa नियमावली यानी पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996। यह कानून पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी भाई-बहनों को मजबूत अधिकार देता है। इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामसभा को केंद्र में रखना है, ताकि स्थानीय समुदाय खुद अपने संसाधनों, भूमि, जल, जंगल और खनिजों पर फैसला ले सकें।
सरल शब्दों में कहें तो Pesa नियमावली की मूल भावना यह है कि गांव की ग्रामसभा सर्वोच्च हो। कोई भी विकास परियोजना, भूमि अधिग्रहण या खनन का काम बिना ग्रामसभा की सहमति के नहीं हो सकता। संविधान के अनुच्छेद 243M और 244 के तहत यह प्रावधान आदिवासी क्षेत्रों में लागू होता है। झारखंड जैसे राज्य जहां आदिवासी आबादी भारी है, वहां यह कानून जीवनरेखा की तरह है। लेकिन हाल के संशोधनों ने इसकी मूल भावना से खिलवाड़ किया है, जिसके खिलाफ अब अदालत में केस चल रहा है।
Pesa के प्रमुख प्रावधान जो ग्रामसभा को शक्तिशाली बनाते हैं
- भूमि अधिग्रहण पर नियंत्रण: कोई भी जमीन लेने से पहले ग्रामसभा की पूर्व सहमति जरूरी।
- प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन: जल, जंगल, जमीन पर ग्रामसभा का अधिकार।
- परंपरागत विवादों का निपटारा: स्थानीय रीति-रिवाजों से फैसले।
- शराब और मादक पदार्थों पर रोक: ग्रामसभा खुद प्रतिबंध लगा सकती है।
ये प्रावधान आदिवासियों को शोषण से बचाते हैं, लेकिन राज्य सरकार के कदमों ने इन्हें कमजोर कर दिया है।
झारखंड हाईकोर्ट में क्या हुआ? याचिका का पूरा विवरण
रांची में झारखंड हाईकोर्ट में रायमूल बांडरा और अरविंद कुमार ने याचिका दायर की। इसमें आरोप है कि झारखंड सरकार ने Pesa नियमावली की मूल भावना से खिलवाड़ करते हुए संशोधन किए हैं। सरकार ने नियमावली को अपने केंद्रीकृत नियंत्रण में रखने की कोशिश की, जिससे ग्रामसभा के अधिकार कमजोर हो गए।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों से आदिवासी वंचित हो रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, ग्रामसभा की सहमति के बिना विकास परियोजनाएं चल रही हैं, खनन कंपनियां जमीन हथिया रही हैं। Pesa नियमावली के प्रावधानों को व्यवहारिक रूप से निष्क्रिय कर दिया गया है।
कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सरकार से सवाल किए:
- क्या याचिकाकर्ताओं के बिंदु सही हैं?
- क्या संशोधन संविधान के अनुरूप हैं?
अदालत ने अगली सुनवाई जून के आखिरी हफ्ते तक विस्तृत जवाब मांगा। यह फैसला आदिवासी आंदोलन के लिए बड़ी उम्मीद जगाता है।
याचिका के मुख्य आरोप बिंदुवार विश्लेषण
- संशोधनों से मूल भावना का उल्लंघन: सरकार ने ग्रामसभा को अधीनस्थ बना दिया।
- स्वायत्तता का हनन: स्थानीय समुदायों के फैसले अब जिला स्तर पर हो रहे।
- खनन और विकास परियोजनाओं में मनमानी: बिना सहमति के काम शुरू।
- संवैधानिक अधिकारों की अवहेलना: अनुच्छेद 244 का सीधा उल्लंघन।
ये आरोप झारखंड के सुदूर ग्रामीण इलाकों से आ रहे हैं, जहां आदिवासी अपनी जमीनें खो चुके हैं।
झारखंड सरकार के संशोधन क्यों हो रहा है विवाद?
झारखंड सरकार ने Pesa नियमावली में कई संशोधन किए, जो विवादास्पद हैं। मुख्य समस्या यह है कि ग्रामसभा के अधिकारों को जिला प्रशासन या राज्य स्तर पर स्थानांतरित कर दिया गया। उदाहरणस्वरूप:
- खनन लीज देने का अधिकार अब उपायुक्त के पास।
- भूमि अधिग्रहण में ग्रामसभा की भूमिका नाममात्र की।
सरकार का तर्क है कि इससे विकास तेज होगा, लेकिन आलोचक कहते हैं कि यह Pesa नियमावली की मूल भावना से खिलवाड़ है। आदिवासी संगठन जैसे जharkhand जन अधिकार जैसे समूह लंबे समय से विरोध कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों जैसे समथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) में भी ग्रामसभा की सर्वोच्चता पर जोर दिया गया था। झारखंड में कोयला, यूरेनियम जैसे खनिजों के कारण यह मुद्दा और गंभीर है।
प्रभाव आदिवासी समुदाय पर क्या असर?
- भूमि हानि: हजारों एकड़ जमीन बिना सहमति के चली गई।
- सांस्कृतिक क्षति: परंपरागत जीवनशैली खतरे में।
- आर्थिक शोषण: लाभ कंपनियों को, नुकसान स्थानीयों को।
- प्रदर्शन और हिंसा: विरोध में आंदोलन बढ़े।
यह सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है।
पेसा नियमावली का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य: अन्य राज्यों में स्थिति
पेसा नियमावली सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं। छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी यही समस्या है। केंद्र सरकार ने 2015 में मॉडल नियमावली जारी की, लेकिन राज्य इसे लागू नहीं कर रहे।
- छत्तीसगढ़: ग्रामसभा को मजबूत करने के प्रयास, लेकिन खनन माफिया हावी।
- ओडिशा: नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में पेसा का दुरुपयोग।
- मध्य प्रदेश: हाल ही में हाईकोर्ट ने सख्ती बरती।
झारखंड का यह केस अन्य राज्यों के लिए मिसाल बन सकता है। अगर कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देता है, तो Pesa नियमावली की मूल भावना मजबूत होगी।
आदिवासी अधिकारों की रक्षा आगे क्या हो सकता है?
यह सुनवाई आदिवासी आंदोलन को नई ताकत देगी। सरकार को जवाब देना होगा, और अगर संशोधन गलत पाए गए, तो रद्द हो सकते हैं। नागरिक समाज, एनजीओ और मीडिया को इस पर नजर रखनी चाहिए। Pesa नियमावली को सही लागू करने से न सिर्फ आदिवासी सशक्त होंगे, बल्कि सतत विकास भी संभव होगा।
सरकार क्या करे?
- ग्रामसभा को पूर्ण स्वायत्तता दें।
- संशोधनों की समीक्षा करें।
- पारदर्शी प्रक्रिया अपनाएं।
Pesa नियमावली की मूल भावना से खिलवाड़ बंद होना चाहिए। झारखंड हाईकोर्ट का यह कदम स्वागतयोग्य है। आदिवासी भाई-बहनों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा हर नागरिक का कर्तव्य है। सरकार को ग्रामसभा को सशक्त बनाना होगा, ताकि विकास और अधिकार साथ-साथ चलें। यह लड़ाई जारी रहेगी, और हम सबको इसका समर्थन करना चाहिए।















