शिमला: हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला से एक अहम और संवेदनशील मामले में फास्ट ट्रैक (पोक्सो) अदालत ने कड़ा फैसला सुनाते हुए नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है और जुर्माना अदा न करने की स्थिति में छह माह के अतिरिक्त कारावास का प्रावधान किया है। इसके साथ ही अदालत ने पीड़िता के पुनर्वास के लिए 4 लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भेजी है।
यह मामला जिला शिमला के रोहड़ू क्षेत्र से जुड़ा हुआ है और घटना वर्ष 2019 की है। मामले की सुनवाई शिमला की फास्ट ट्रैक (पोक्सो) अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत में हुई, जहां लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी करार दिया गया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नाबालिग से संबंधित अपराधों में कानून बेहद सख्त है और ऐसे मामलों में किसी भी तरह की नरमी नहीं बरती जा सकती।
शादी का झांसा देकर ले गया आरोपी
मामले के अनुसार 17 अगस्त 2019 को आरोपी युवक ने 15 वर्षीय नाबालिग को शादी का झांसा देकर अपने ननिहाल ले गया। परिजनों को जब लड़की घर पर नहीं मिली तो उन्होंने पहले अपने स्तर पर उसकी तलाश शुरू की। परिवार को लगा कि वह किसी सहेली के घर गई होगी, लेकिन अगले दिन भी उसके घर न लौटने पर चिंता बढ़ गई।
इसके बाद 18 अगस्त की शाम को परिजनों ने संबंधित पुलिस थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई करते हुए नाबालिग की तलाश शुरू की और आरोपी की लोकेशन ट्रेस करने का प्रयास किया।
पांच दिन बाद बरामद हुई नाबालिग
पुलिस ने 22 अगस्त 2019 को आरोपी के ननिहाल से नाबालिग को बरामद कर लिया। कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद लड़की को परिजनों के सुपुर्द कर दिया गया। पीड़िता ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि आरोपी ने 17 अगस्त से 22 अगस्त के बीच कई बार उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने मेडिकल जांच और फोरेंसिक साक्ष्य जुटाए। फोरेंसिक रिपोर्ट में डीएनए और अन्य साक्ष्य आरोपी से मेल खाते पाए गए, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला मजबूत हुआ। वहीं स्कूल के प्रवेश रजिस्टर और पंचायत प्रमाणपत्र के आधार पर पीड़िता की उम्र 15 वर्ष साबित हुई, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वह नाबालिग थी।
अदालत में पेश हुए मजबूत साक्ष्य
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने अदालत में चालान पेश किया। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पीड़िता की गवाही, मेडिकल रिपोर्ट, फोरेंसिक जांच और अन्य गवाहों के बयान पेश किए। अदालत ने पाया कि पीड़िता की गवाही सुसंगत और विश्वसनीय है, जिसे परिवार और स्वतंत्र गवाहों के बयान से भी पुष्टि मिली।
फोरेंसिक रिपोर्ट ने मामले को और मजबूत बनाया। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि पीड़िता की उम्र नाबालिग साबित होने के बाद उसकी सहमति कानूनी रूप से मान्य नहीं मानी जा सकती। भले ही आरोपी ने शादी करने का दावा किया हो, लेकिन कानून के अनुसार नाबालिग से सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता।
इन धाराओं में दोषी करार
अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 376 और पोक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी करार दिया। हालांकि अपहरण से संबंधित आईपीसी की धारा 363 और 366 में आरोपी को बरी कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म से जुड़े साक्ष्य मजबूत और पर्याप्त हैं, इसलिए कठोर सजा दी जाना आवश्यक है।
अदालत की सख्त टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि नाबालिगों के साथ होने वाले अपराध समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं और ऐसे मामलों में दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता की गवाही और फोरेंसिक साक्ष्यों ने मामले को पूरी तरह सिद्ध कर दिया है और बचाव पक्ष के दावे टिक नहीं पाए।
अदालत ने यह भी माना कि आरोपी घटना के समय युवा था और उसने शादी का इरादा होने का दावा किया, लेकिन यह दलील कानून के सामने टिकाऊ नहीं है क्योंकि नाबालिग की सहमति को मान्यता नहीं दी जा सकती।
पीड़िता के पुनर्वास पर जोर
अदालत ने अपने आदेश में पीड़िता के पुनर्वास और भविष्य को ध्यान में रखते हुए 4 लाख रुपये मुआवजा देने की सिफारिश जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को भेजी है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष को न्याय के साथ-साथ पुनर्वास और मानसिक सहयोग भी जरूरी है।
समाज के लिए संदेश
इस फैसले को नाबालिगों के खिलाफ अपराधों के मामलों में एक महत्वपूर्ण और सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है। अदालत के इस निर्णय से यह स्पष्ट हुआ है कि कानून नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर बेहद गंभीर है और ऐसे अपराधों में दोषियों को कठोर दंड दिया जाएगा।
पुलिस अधिकारियों ने भी इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि जांच के दौरान सभी आवश्यक साक्ष्य जुटाए गए थे और अदालत में मजबूत तरीके से पेश किए गए। उन्होंने कहा कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कार्रवाई की जाती है ताकि पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।
यह मामला न केवल न्यायिक प्रक्रिया की सख्ती को दर्शाता है, बल्कि समाज को भी यह संदेश देता है कि नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और ऐसे अपराधों में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।














