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Tata Steel फाउंडेशन ने विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर Day Without Demands’ के साथ सबल–ज्ञानोदय में बच्चों के लिए बनाया नया माहौल

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On: April 3, 2026 9:29 AM
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जमशेदपुर: 2 अप्रैल 2026 विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर Tata Steel फाउंडेशन (Tata Steel Foundation, TSF) ने जमशेदपुर स्थित सबल–ज्ञानोदय (Sabal–Gyanoday) में एक अनूठी और समावेशी पहल की। इसे बच्चों के लिए एक दबाव‑मुक्त, आराम‑प्रधान अनुभव बनाने के उद्देश्य से “Day Without Demands – डे विदाउट डिमांड्स” नाम दिया गया। इस दिन फाउंडेशन ने न्यूरोडायवर्सिटी (स्वाभाविक रूप से अलग‑अलग सोच वाले बच्चों) और बाल‑केंद्रित शिक्षण‑प्रणाली के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया।

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पारंपरिक कार्यक्रमों से अलग Day Without Demands की अवधारणा

ज्यादातर ऑटिज्म‑संबंधी कार्यक्रम बच्चों के लिए प्रदर्शन, निर्देश और निर्धारित रूपरेखाओं वाले होते हैं, जिससे कई बार उनके लिए तनाव और असहजता बढ़ जाती है। Tata Steel फाउंडेशन ने इसी बात को बदलने के लिए “Day Without Demands” नामक अवधारणा लागू की, जिसका मूल विचार यह था कि:

  • बच्चों पर कोई निर्देश नहीं, कोई उम्मीद नहीं, और न किसी तरह का परफॉर्मेंस‑प्रेशर।
  • वातावरण को बच्चों की सेंसरी (संवेदन), इमोशनल (भावनात्मक) और कम्युनिकेशन (संचार) जरूरतों के हिसाब से ढाला जाए, न कि बच्चों को “वैसे” ढालने की कोशिश की जाए।

इस दिन का उद्देश्य यह दिखाना था कि जब सिस्टम बच्चों के आसपास घूमे, तभी सच्ची समावेशी शिक्षा संभव है

सबल–ज्ञानोदय का बदला हुआ वातावरण

दिन के दौरान सबल–ज्ञानोदय के डिस्कशन हॉल और कार्यक्रम कक्ष को एक बिल्कुल अलग तरह के स्पेस में बदल दिया गया:

  • फर्श पर मैट्स, सॉफ्ट प्ले मटेरियल और खुली जगह बिछाई गई, जहां बच्चे बैठ सकते थे, लेट सकते थे, आराम से चल सकते थे या बस देखते रह सकते थे।
  • एक सॉफ्ट इंस्ट्रुमेंटल म्यूजिक की पृष्ठभूमि लगातार चलती रही, जिसने एक शांत, भविष्यानुमान‑योग्य और न कठोर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण बनाया।
  • फिर (आज्ञा पालन) की जगह self‑regulation (स्वयं को नियंत्रित करने) की जगह बनाई गई, यानी बच्चों को निर्देश न देकर उन्हें अपनी गति से अनुभव करने दिया गया।

यह व्यवस्था खास तौर पर ऑटिस्टिक और न्यूरोडायवर्स बच्चों के लिए आरामदायक साबित हुई, जिनके लिए अचानक बदलते वातावरण और ज़ोर‑ज़बरदस्ती वाले अनुभव बहुत तनावपूर्ण होते हैं।

बिना किसी निर्देश की रचनात्मकता

“Day Without Demands” में बच्चों के लिए कोई थीम या “क्या बनाना है” नहीं था। उन्हें दिए गए मटेरियल थे:

  • पेपर
  • रंग
  • मिट्टी / क्ले

इनका उपयोग किसी भी तरह से, कितने भी छोटे या बड़े तरीके से करने की आज़ादी थी। बच्चों की

  • गैर‑भाषिक अभिव्यक्ति,
  • स्थिरता (stillness),
  • सेंसरी खोज (Texture और गंध का अनुभव),
  • और स्वतंत्र रूप से जुड़े रहने की क्रियाएँ

सबको वैलिड और महत्वपूर्ण माना गया। यानी यदि कोई बच्चा रंग को बस अपने आप में देख रहा था या मिट्टी को आराम से हाथ में मसल रहा था, तो इसे भी “उसकी अभिव्यक्ति” के रूप में स्वीकार किया गया।

इसी तरह “low‑demand social interaction” की अवधारणा भी लागू की गई, जिसमें बच्चों के लिए “buddy time” रखा गया, जहाँ वे:**

  • एक ही स्पेस में रह सकते थे,
  • बिना किसी दबाव या बात करने की अपेक्षा के आसान_activities में हिस्सा ले सकते थे।

“साथ बैठना बिना बात किए” (parallel presence) को भी एक मतलबपूर्ण और स्वाभाविक बात माना गया; यानी बच्चे चाहें तो बात करें, चाहें तो बस साथ में बैठकर अपना अनुभव लें।

बच्चों पर केंद्रित शिक्षकों की नई भूमिका

“Day Without Demands” में शिक्षकों ने अपनी भूमिका बदली। उन्होंने निर्देश देने वाले अध्यापक से
“attuned facilitator (संवेदनशील सहायक)” के रूप में काम किया:

  • वे बच्चों के पास फर्श पर बैठे, उनकी गति और पसंद को देखते रहे।
  • भाषा कम और अवलोकन और सह‑नियामन (co‑regulation) ज्यादा था – यानी वे बच्चे के अनुभव को बीच‑बीच में काटे बिना साथ रहे।
  • बच्चों की restlessness (बेचैनी) या withdrawal (दूर खिसकना) को “समस्या व्यवहार” की जगह “संचार का एक रूप” माना गया, जिसका जवाब सुरक्षा, सहानुभूति और समर्थन के रूप में दिया गया।

इस तरह शिक्षण‑प्रक्रिया ने बच्चे को बदलने के बजाय खुद को बदलने का संदेश दिया, जो आज के समावेशी शिक्षा फलसफे के लिए बहुत अहम है।

माता‑पिता की भागीदारी और “घर–स्कूल” जुड़ाव

इस दिन माता‑पिता को भी अवलोकक के रूप में बुलाया गया था। उन्हें बच्चे के आरामदायक और असहज पलों को बिना दखल या निर्देश देखने का मौका मिला। इससे उन्हें अपने बच्चे की:

  • सुविधा‑प्राथमिकताएँ (comfort patterns),
  • सेंसरी जरूरतें,
  • और स्वाभाविक अभिव्यक्ति के तरीके

समझने में मदद मिली। फाउंडेशन ने यह भी जोर दिया कि घर और स्कूल का वातावरण आपस में अलग‑अलग न हों, बल्कि बच्चे के लिए दोनों जगह समान रूप से समर्थक और दबाव‑मुक्त बनें।

Tata Steel फाउंडेशन के प्रतिनिधि की बात

इस अवसर पर कैप्टन अमिताभ, स्किल डेवलपमेंट, डिसऐबिलिटी एंड स्पोर्ट्स हेड Tata Steel फाउंडेशन, ने बताया:

“जब मैं सबल में बच्चों के साथ समय बिताता हूँ, तो यह याद आता है कि समावेश (inclusion) का मतलब यह नहीं है कि बच्चों को हमारी प्रणालियों पर ढालें, बल्कि हमारी प्रणालियों को उनकी जरूरतों के आसपास बनाएँ।

Tata Steel फाउंडेशन ने विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस के अवसर पर ‘Day Without Demands’ पहल के माध्यम से सबल–ज्ञानोदय केंद्र में विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए एक संवेदनशील और सकारात्मक माहौल तैयार किया। इस पहल का उद्देश्य बच्चों को बिना किसी दबाव, अपेक्षा या निर्देश के स्वतंत्र रूप से खुद को व्यक्त करने का अवसर देना था, जिससे वे सहज और आत्मविश्वास से भर सकें।

इस दौरान बच्चों के लिए विभिन्न रचनात्मक और मनोरंजक गतिविधियों का आयोजन किया गया, जैसे पेंटिंग, संगीत, खेल और मुक्त अभिव्यक्ति के सत्र। इन गतिविधियों में बच्चों ने पूरे उत्साह के साथ भाग लिया और अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त किया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य यह था कि बच्चों को यह महसूस कराया जाए कि वे जैसे हैं, वैसे ही पूर्ण और खास हैं।

शिक्षकों और विशेषज्ञों ने भी इस दौरान बच्चों के साथ समय बिताया और उनके व्यवहार, रुचियों तथा भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को समझने की कोशिश की। ‘Day Without Demands’ की यह पहल बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

Tata Steel फाउंडेशन की यह पहल समाज में ऑटिज्म के प्रति जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ समावेशिता और संवेदनशीलता का संदेश देती है। यह कार्यक्रम इस बात का उदाहरण है कि सही वातावरण और समर्थन मिलने पर विशेष जरूरतों वाले बच्चे भी अपनी क्षमताओं को बेहतर तरीके से विकसित कर सकते हैं।

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