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पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल के प्रयास से गरीब दिव्यांग Anil सरदार को मिली अबुआ आवास योजना की दूसरी किस्त

On: May 15, 2026 4:58 PM
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झारखंड: दिव्यांग Anil सरदार सरकार की महत्वाकांक्षी अबुआ आवास योजना गरीब एवं जरूरतमंद परिवारों के लिए किसी वरदान से कम नहीं मानी जाती है। इस योजना का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को पक्का घर उपलब्ध कराना है, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। लेकिन कई बार सरकारी प्रक्रिया, तकनीकी खामियां और प्रशासनिक लापरवाही गरीब लाभुकों के सपनों पर भारी पड़ जाती है। ऐसा ही एक मामला पोटका प्रखंड के पिछली गांव निवासी दिव्यांग Anil सरदार के साथ सामने आया, जहां योजना की दूसरी किस्त बैंक की तकनीकी गड़बड़ी के कारण किसी दूसरे खाते में चली गई और गरीब परिवार लगभग दो वर्षों तक परेशानियों का सामना करता रहा।

दिव्यांग Anil सरदार को मिला था अबुआ आवास योजना का लाभ

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पोटका प्रखंड के पिछली गांव निवासी Anil सरदार, पिता स्वर्गीय सुधीर सिंह सरदार, आर्थिक रूप से अत्यंत कमजोर परिवार से आते हैं। अनिल स्वयं एक दिव्यांग हैं और कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे थे। वर्ष 2023-24 में सरकार द्वारा उनके नाम से अबुआ आवास योजना स्वीकृत की गई थी।

दिनांक 15 मई 2024 को उन्हें प्रथम किस्त के रूप में 30 हजार रुपए उनके बैंक ऑफ इंडिया पोटका शाखा स्थित खाते में प्राप्त हुए थे। गरीब होने के बावजूद अनिल सरदार ने पूरी मेहनत और उम्मीद के साथ उस राशि का उपयोग घर निर्माण कार्य में किया और अपने अधूरे सपनों को आकार देना शुरू किया।

उन्होंने घर का निर्माण कार्य डीपीसी लेवल तक पूरा कर लिया था। विभागीय अधिकारियों द्वारा निर्माण कार्य का निरीक्षण एवं जियोटैग भी किया गया था। इसके बाद दूसरी किस्त के रूप में 50 हजार रुपए जारी किए गए, लेकिन यहीं से उनकी परेशानियों की शुरुआत हो गई।

बैंक की तकनीकी गड़बड़ी बनी गरीब परिवार के लिए अभिशाप

दूसरी किस्त की राशि अनिल सरदार के खाते में आने के बजाय गलती से बैंक ऑफ इंडिया की केसरिया शाखा, जिला पूर्वी चंपारण (बिहार) के किसी अन्य ग्राहक के खाते में चली गई। यह पूरी तरह बैंकिंग सिस्टम की तकनीकी त्रुटि थी, लेकिन इसका खामियाजा एक गरीब दिव्यांग परिवार को भुगतना पड़ा।

सबसे दुखद पहलू यह रहा कि लंबे समय तक संबंधित विभागों और बैंक अधिकारियों की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। Anil सरदार पंचायत कार्यालय से लेकर ब्लॉक कार्यालय और बैंक तक लगातार चक्कर लगाते रहे। वे हर जगह अपनी पीड़ा सुनाते, गुहार लगाते और मदद की उम्मीद करते रहे, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन ही मिलता रहा।

गरीबी, दिव्यांगता और अधूरे घर की चिंता ने पूरे परिवार को मानसिक रूप से तोड़ दिया था। बरसात, ठंड और तेज धूप में जर्जर घर में रहने को मजबूर परिवार हर दिन इस उम्मीद में जी रहा था कि शायद किसी दिन उनका पैसा वापस मिल जाए।

बीडीओ पोटका ने भी लिखा था पत्र

मामले की गंभीरता को देखते हुए दिनांक 09 मई 2025 को पोटका के बीडीओ द्वारा पंचायत सचिव की जांच रिपोर्ट के आधार पर अग्रणी बैंक प्रबंधक (एलडीएम) को पत्र भेजा गया था। पत्र में स्पष्ट रूप से राशि की वापसी और मामले के समाधान की मांग की गई थी।

हालांकि, इतने महत्वपूर्ण मामले में भी समय पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इससे यह स्पष्ट हो गया कि प्रशासनिक स्तर पर लापरवाही और उदासीनता किस प्रकार गरीबों के अधिकारों को प्रभावित करती है।

पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल बने गरीब परिवार की उम्मीद

जब लगभग दो वर्षों तक कहीं से भी समस्या का समाधान नहीं हुआ, तब अनिल सरदार के भाई ने पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल से संपर्क किया और पूरी घटना की जानकारी दी।

करुणा मय मंडल ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। उन्होंने केवल सहानुभूति व्यक्त करने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि तत्काल कार्रवाई करते हुए अगले ही दिन संबंधित अधिकारियों से मुलाकात की।

उन्होंने आवास विभाग के अधिकारियों, बीडीओ पोटका और बैंक ऑफ इंडिया के शाखा प्रबंधक से मिलकर पूरी स्थिति की जानकारी ली। इतना ही नहीं, उन्होंने स्वयं अग्रणी बैंक प्रबंधक से दूरभाष पर बात कर मामले में हो रही देरी पर नाराजगी जताई।

करुणा मय मंडल की सख्ती के बाद दो दिनों में लौटी राशि

पूर्व जिला पार्षद ने अधिकारियों को स्पष्ट रूप से कहा कि गरीब और दिव्यांग लाभुक के साथ अन्याय किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने बीडीओ द्वारा भेजे गए पत्र पर अब तक कार्रवाई नहीं होने को लेकर भी सवाल उठाए।

उनकी सक्रियता और सख्ती का परिणाम यह हुआ कि मात्र दो दिनों के भीतर Anil सरदार की दूसरी किस्त की राशि वापस उनके बैंक खाते में पहुंच गई। इसके बाद लाभुक को भुगतान भी कर दिया गया।

यह घटना न केवल एक गरीब परिवार के लिए राहत लेकर आई, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि यदि जनप्रतिनिधि संवेदनशील और जिम्मेदार हों तो वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान बेहद कम समय में हो सकता है।

अधूरे सपनों को मिला नया सहारा

जब Anil सरदार ने अपने हाथों में वह राशि देखी, जो लगभग दो वर्षों से खो चुकी थी, तब उनकी आंखों में खुशी साफ झलक रही थी। अधूरा पड़ा घर अब पूरा होने की उम्मीद से भर उठा।

दिव्यांग होने के बावजूद लगातार संघर्ष कर रहे Anil सरदार और उनके परिवार के लिए यह केवल पैसों की वापसी नहीं थी, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और भविष्य की नई शुरुआत थी।

गांव के लोगों ने भी इस पहल की सराहना की और कहा कि करुणा मय मंडल ने एक जनप्रतिनिधि होने का वास्तविक कर्तव्य निभाया है।

अबुआ आवास योजना गरीबों के लिए क्यों है महत्वपूर्ण

झारखंड सरकार की अबुआ आवास योजना राज्य के गरीब, मजदूर, दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को पक्का घर उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस योजना के माध्यम से हजारों परिवारों को सुरक्षित आवास का लाभ मिल रहा है।

लेकिन कई बार तकनीकी त्रुटियों और प्रशासनिक ढिलाई के कारण लाभुकों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे मामलों में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे पीड़ितों को समय पर न्याय दिलाएं।

अनिल सरदार का मामला यह दर्शाता है कि यदि समय रहते उचित हस्तक्षेप किया जाए तो गरीबों की समस्याओं का समाधान संभव है।

जनप्रतिनिधियों की सक्रियता से बढ़ता है जनता का विश्वास

समाज में जनता अपने जनप्रतिनिधियों से केवल वादों की नहीं बल्कि वास्तविक मदद की उम्मीद करती है। करुणा मय मंडल ने जिस प्रकार एक गरीब दिव्यांग परिवार की मदद की, वह अन्य जनप्रतिनिधियों के लिए भी प्रेरणादायक उदाहरण है।

आज जब लोग सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक जाते हैं, तब ऐसे प्रयास जनता के बीच विश्वास कायम करते हैं। गरीब और जरूरतमंद लोगों को उनका अधिकार दिलाना ही सच्ची जनसेवा कहलाती है।

पोटका प्रखंड के दिव्यांग Anil सरदार को लगभग दो वर्षों बाद अबुआ आवास योजना की दूसरी किस्त मिलना केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होना नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, संवेदनशीलता और जनसेवा की जीत है। बैंक की तकनीकी गड़बड़ी और प्रशासनिक लापरवाही के बीच फंसे एक गरीब परिवार को जब हर तरफ से निराशा मिली, तब पूर्व जिला पार्षद करुणा मय मंडल ने आगे बढ़कर उनकी मदद की।

उनकी तत्परता और सख्ती के कारण आखिरकार गरीब परिवार को उनका हक मिला और अधूरा घर पूरा होने की उम्मीद फिर से जीवित हो गई। यह घटना बताती है कि यदि व्यवस्था में जिम्मेदारी और संवेदनशीलता हो, तो किसी भी गरीब को अपने अधिकार के लिए वर्षों तक भटकना नहीं पड़ेगा।

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