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घर में रेडियो रखना है तो लेना होगा लाइसेंस: एक भूला हुआ अध्याय – जब रेडियो प्रवचन भी एक ‘सरकारी दस्तावेज़’ था।

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On: October 7, 2025 9:03 PM
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अनोखी बात: आज के तेज-रफ्तार डिजिटल युग में, जहां संचार के साधन (जैसे मोबाइल और इंटरनेट) हर हाथ में हैं और मुफ्त में उपलब्ध हैं, आज के नौजवानों को यह सुनकर निश्चित ही अजीब लगेगा कि एक समय ऐसा भी था जब एक साधारण रेडियो सेट रखने और हमारे पास खबरें या गाने सुनने के लिए भी सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था और हर साल लाइसेंस के नवीनीकरण (नवीनीकरण) की फीस डाकघर (डाकघर) में जमा करनी होती थी.

हाँ सच्ची हमारे संचार इतिहास का एक बेहद रोचक और ऐतिहासिक पन्ना है। आपके मित्र रामेश्वर झारिया जी, अध्यक्ष जिला अधिवक्ता संघ मंडला, द्वार सांझा किया गया रेडियो लाइसेंस की प्रति इसकी सत्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। हां सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बाल्की हमें समय की सरकारी व्यवस्था, तकनीकी की पहचान, और आम लोगों के जीवन को दिखाता है।

THE NEWS FRAME

 लाइसेंस की आवश्यकता क्यों थी?

इस नियम के पीछे मुख्यतः तीन महत्वपूर्ण कारण थे, खासकर आजादी के बाद के शुरूआती दशको में:

1. संचार पर नियंत्रण: हमारा समय रेडियो संचार का सबसे शक्तिशाली और तीव्र माध्यम था। सरकार मध्यम को नियम बनाना चाहती थी, ताकि किसी भी तरह की अफवाहों या गलत जानकारी को फेलने से रोका जा सके। लाइसेंस से हर रेडियो सेट और उसके मालिक का रिकॉर्ड रखा जाता था।

2. आय का स्रोत (राजस्व): ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर), जो सरकार द्वारा संचालित ब्रॉडकास्टिंग एजेंसी थी, उसके बड़े नेटवर्क को चलाने और बेहतर बनाने के लिए वित्त (फंड) की जरूरत थी। हाँ लाइसेंस शुल्क (जिसे वायरलेस रिसीविंग लाइसेंस शुल्क कहा जाता था) सरकार के लिए एक आय का महत्वपूर्ण स्रोत था, जो प्रसारण सेवाओं को जारी रखने में मदद करता था।

3. गणना और योजना: लाइसेंस से सरकार को यह ज्ञान होता था कि देश के किस हिस्से में कितने रेडियो सेट चल रहे हैं। क्या जानकारी के आधार पर AIR अपनी कार्यक्रमों की योजना (प्रोग्रामिंग) और प्रसार को बेहतर बना पति थी।

 व्यवस्था कैसे चलती थी?

 केंद्र: रेडियो लाइसेंस लेने और हर साल उसको नवीकरण (नवीकरण) कराने का काम मुख्य रूप से डाकघर (डाकघर) में होता था।

 प्रक्रिया: उपभोक्ता को नियत समय पर डाकघर जाकर एक निश्चित राशि शुलक के रूप में जमा करनी होती थी। इसके बदले उन्हें मोहर लगी रसीद और लाइसेंस की प्राप्ति थी।

 कानूनी प्रतिबंध:बिना लाइसेंस के रेडियो सुनना अवस्थिक था और पकड़े जाने पर जुर्माना भी हो सकता था।

 आज के नौजवानों के लिए सबक

ये ऐतिहासिक कहानी आज की पीढ़ी के लिए एक महत्वपूर्ण सबक देती है:

 तकनीकी बदलाव का आईना:याह दरशाता है कि पिछले कुछ दशकों में तकनीक और उस पर लागू होने वाले नियमों में कितना बड़ा बदलाव आया है। संचार क्रांति और आर्थिक उधारीकरण के चलते यह लाइसेंस व्यवस्था अप्रसांगिक हो गई और समाप्त कर दी गई।

 संचार के साधनों का मूल्य:इससे हम अपने मुफ्त और सरल संचार के साधनों (जैसे मोबाइल और इंटरनेट) का सच्चा महत्व समझ में आता है। उस समय रेडियो सेट और उसके लाइसेंस को बड़ी मुश्किल से खरीदा जाता था, और रेडियो सुनना एक विलासिता और गौरव की बात हुई थी।

रामेश्वर झारिया जी और उनके जैसे बड़े-बुज़ुर्गों का धन्यवाद, जिन्होंने अनमोल इतिहास को संजोक कर रखा है।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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