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Tata स्टील फाउंडेशन ने बिरहोर समुदाय की पहली पीढ़ी की छात्रा को नर्सिंग की करियर में मदद कैसे दी?

On: March 31, 2026 7:07 PM
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शिक्षा: आज हम एक ऐसी कहानी सुनने जा रहे हैं, जो न सिर्फ दिल छू लेती है, बल्कि यह भी सिखाती है कि अगर सही समय पर मौका और मार्गदर्शन मिल जाए, तो छोटे से गांव से आने वाला व्यक्ति भी बड़ी जिंदगी बना सकता है। ये कहानी है बालिका बिरहोर की — जो झारखंड के एक छोटे से गांव चोटा बंकी से निकलकर अब बैंगलोर के एक बड़े अस्पताल में नर्स के रूप में काम करने जा रही है। इस पूरी यात्रा में उनका साथ दिया है Tata स्टील फाउंडेशन की दो प्रमुख परियोजनाओं — प्रोजेक्ट आकांक्षा और प्रोजेक्ट समृद्धि — ने। आइए, इस दिल छू लेने वाली कहानी को धीरे‑धीरे हिंदी में समझते हैं।

शुरुआत एक छोटे से गांव से

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बालिका बिरहोर का जन्म और बचपन है ईस्ट सिंहभूम के चोटा बंकी नामक छोटे से बस्ती में। उम्र सिर्फ 21 साल है, लेकिन उनकी जिंदगी की कहानी पूरे बिरहोर समुदाय के लिए प्रेरणा बन गई है। वे अपने माता–पिता, सुखरानी और सुबोध बिरहोर की बेटी हैं, जो बिरहोर PVTG (Particularly Vulnerable Tribal Group) समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। इन परिवारों की ज्यादातर आजीविका जंगल से जुड़े कामों पर निर्भर होती है।

बालिका के माता–पिता स्थानीय बाजार में चावल से बनी देसी शराब को बेचकर लगभग महीने के 500 रुपये कमाते हैं। इतनी कम आय में घर–बार चलाना भी बड़ी मुश्किल है, फिर ज़िक्र पढ़ाई–लिखाई का तो और भी दूर लगता है। बालिका अपने परिवार में पहली जनरेशन लर्नर है, मतलब उनके पहले घर में कोई भी आधिकारिक तौर पर बहुत ज्यादा पढ़ा‑लिखा नहीं था। छोटे‑से गांव में बच्चों के सामने ज़्यादातर विकल्प नहीं होते, लेकिन बालिका ने तय किया कि वह चुपचाप घर पर बैठकर काम नहीं करेगी, बल्कि आगे बढ़ेगी।

इसी गांव से शुरू होने वाली ये कहानी बताती है कि सही मौका और सही संस्था का समर्थन कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।

पढ़ाई की नई दुनिया कर्मेल स्कूल तक का सफर

बालिका की शिक्षा की शुरुआत हुई एक स्थानीय हिंदी माध्यम स्कूल से। यहां उन्हें बेसिक ज्ञान मिला, लेकिन उसके बाद की दिशा तय हुई तब, जब Tata स्टील फाउंडेशन ने उनकी मदद की। फाउंडेशन ने उनकी पढ़ाई के लिए एक बड़ा समर्थन दिया और उनकी दाखिला की दिशा में काम किया। इसी के बाद उन्हें कर्मेल स्कूल, चक्रधरपुर (झारखंड) में दाखिला मिला।

यह स्कूल उनके लिए एक नई दुनिया खोल गया। यहां उन्हें न सिर्फ हाईक्वालिटी शिक्षा मिली, बल्कि उनकी सोच और दृष्टिकोण भी बदलने लगा। 2020 में उन्होंने कर्मेल स्कूल से मैट्रिकुलेशन 82 प्रतिशत अंकों के साथ पास किया। फिर उन्होंने स्टेट एक्सपीयर कॉलेज, लूपुंडुतु से विज्ञान स्ट्रीम में इंटरमीडिएट किया और 63 प्रतिशत अंक लाकर सफल हुईं।

इस पूरी प्रक्रिया ने उन्हें आत्मविश्वास दिया और उन्हें अपने भविष्य के बारे में सोचने का मौका दिया। वे समझ गईं कि पढ़ाई उन्हें बस गांव से दूर कर ही नहीं देगी, बल्कि उन्हें एक स्वतंत्र और सुरक्षित जीवन जीने में भी मदद कर सकती है।

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परिवार की चिंता और प्रोजेक्ट आकांक्षा की मदद

इंटरमीडिएट के बाद बालिका के लिए सबसे बड़ा संकट था: अगली सीढ़ी पर जाना। वे उच्च शिक्षा करना चाहती थीं, लेकिन उनके परिवार को ये बात बहुत अजीब और अनसुरक्षित लग रही थी। गांव से बाहर बड़े शहर जाना, वहां रहना, अपने आस‑पास के लोगों से दूर होना – ये सब उनके माता‑पिता के लिए बहुत बड़ा डर था। इसी दौर में “प्रोजेक्ट आकांक्षा” की टीम उनके जीवन में आई।

प्रोजेक्ट आकांक्षा Tata स्टील फाउंडेशन की एक पहल है, जो विशेष रूप से PVTG समुदायों के बच्चों, खासकर सबर बिरहोर, पहाड़ीया और बिरहोर समुदायों के बच्चों की शिक्षा के लिए काम करती है। इसी प्रोजेक्ट की टीम ने बालिका और उनके परिवार से लगातार जुड़ाव बनाया।

टीम ने उन्हें और उनके परिवार को समझाया कि उच्च शिक्षा केवल सिर्फ “पढ़ना–लिखना” नहीं है, बल्कि यह एक स्थिर करियर और आत्मनिर्भरता का माध्यम है। बालिका को कई प्रोफेशनल टेस्ट और काउंसलिंग सत्र में शामिल किया गया, ताकि उनकी क्षमताएं और करियर विकल्प साफ हो सकें। इस दौरान उनके अंदर नर्सिंग जैसे करियर में जाने का विचार भी विकसित हुआ।

परिवार को इस बात का आश्वासन दिया गया कि वे अकेले नहीं हैं, उनके साथ एक संस्था भी है जो उनकी सहायता करेगी। इस ट्रस्ट और मार्गदर्शन के बाद ही उन्होंने परिवार को ये समझाने में सफलता पाई कि वे आगे की पढ़ाई के लिए शहर जाकर अपना भविष्य बनाना चाहती हैं।

नर्सिंग की ओर कदम प्रोजेक्ट समृद्धि की भूमिका

करियर की दिशा तय होने के बाद अगली चुनौती थी – किसी अच्छे संस्थान में दाखिला लेना और एंट्रेंस एग्जाम पास करना। इसी चरण में Tata स्टील फाउंडेशन की दूसरी पहल – प्रोजेक्ट समृद्धि – (Project Samriddhi) उनके साथ आई।

प्रोजेक्ट समृद्धि झारखंड और ओडिशा के जनजातीय मूल की युवा महिलाओं को नर्सिंग प्रोफेशनल बनाने के लिए डिज़ाइन की गई है। इस प्रोग्राम के तहत चुनी गई युवा लड़कियों को कोचिंग, मेंटरशिप, फाइनेंशियल सपोर्ट और राइट गाइडेंस दिया जाता है। बालिका को भी इसी प्रोग्राम में शामिल किया गया।

उन्हें नर्सिंग एंट्रेंस एग्जाम के लिए तैयारी करने के लिए विशेष कोचिंग और गाइडेंस दी गई। अपने अध्यवस

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