नई दिल्ली, 26 अगस्त 2025। ऑल इंडिया संताली राइटर्स एसोसिएशन (AISWA) और जाहेर थान कमेटी, दीशोम जाहेर करनडीह, जमशेदपुर की महिला प्रकोष्ठ की 13 सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल ने आज भारत की महामहिम राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू से राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में ऐतिहासिक भेंट की।
झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से पहुँची महिला प्रतिनिधियों के लिए यह अनुभव जीवन का अविस्मरणीय क्षण रहा।
राष्ट्रपति भवन में आत्मीय मुलाकात
प्रतिनिधि मण्डल ने बताया कि महामहिम राष्ट्रपति अत्यंत मृदुभाषी और आत्मीय रही और वार्ता बेहद सार्थक रही। राष्ट्रपति भवन परिसर में प्रतिनिधियों को भ्रमण कराया गया, जहाँ उन्होंने भवन के लगभग 340 कक्षों में से कुछ विशेष हिस्सों का अवलोकन किया।
प्रतिनिधियों को विशेष रूप से अमृत उद्यान के वीआईपी क्षेत्र में ले जाया गया, जहाँ राष्ट्रपति महोदया प्रातः भ्रमण करती हैं। इसके साथ ही जनजातीय संग्रहालय का भी दर्शन कराया गया, जहाँ देश के महान आदिवासी विभूतियों के चित्र प्रदर्शित हैं। प्रतिनिधिमण्डल की एक सदस्य ने वहाँ अपना ही चित्र देखकर भावुकता और गर्व प्रकट किया।

उपहार और आतिथ्य
इस अवसर पर महामहिम राष्ट्रपति ने प्रत्येक प्रतिनिधि को व्यक्तिगत उपहार (स्टोल) भेंट किया। तत्पश्चात सभी को राष्ट्रपति भवन के डाइनिंग हॉल में नाश्ता और चाय का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
मुख्य उद्देश्य: ओल चिकी शताब्दी समारोह के लिए आमंत्रण
प्रतिनिधि मण्डल का मुख्य उद्देश्य राष्ट्रपति महोदया को आगामी “ओल चिकी के 100 वर्ष पूरे होने” के उपलक्ष्य में दिसम्बर 2025 में जमशेदपुर में आयोजित होने वाले संताली भाषा सप्ताह सह ओल चिकी शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित करना था।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने स्नेहपूर्वक आश्वासन दिया कि यदि समय अनुकूल हुआ तो वे इस ऐतिहासिक समारोह में अवश्य सम्मिलित होंगी।

प्रतिनिधि मण्डल की सदस्याएं
- जोबा मुर्मू
- सुचित्रा सोरेन
- सरोजिनी बेसरा
- ताला टुडू
- सारो हांसदा
- अंजलि किस्कू
- स्वप्ना हेम्ब्रम
- साल्हो सोरेन
- सरस्वती हांसदा
- झानो मुर्मू
- सोनाली हांसदा
- सुस्मिता हेम्ब्रम
- सरस्वती टुडू
ऐतिहासिक अवसर
AISWA महासचिव रबिन्द्र नाथ मुर्मू ने कहा कि यह मुलाकात केवल सम्मान का क्षण नहीं, बल्कि संताली भाषा और ओल चिकी लिपि के गौरवपूर्ण भविष्य की दिशा में एक प्रेरणादायी कदम भी है।
यह भेंट न केवल प्रतिनिधियों के लिए यादगार रही, बल्कि आदिवासी समाज और उनकी भाषा-लिपि की वैश्विक पहचान को भी नई ऊँचाई देने वाला क्षण साबित हुआ।













