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मानवता के मार्गदर्शक और गुरुमुखी के प्रणेत Guru अंगद देव जी

On: March 28, 2026 10:55 PM
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सिख धर्म के दूसरे गुरु, Guru अंगद देव जी का जीवन सेवा, समर्पण और सामाजिक क्रांति का प्रतीक है। 31 मार्च 1504 को पंजाब के मुक्तसर जिले के मत्ते दी सराय में जन्मे भाई लहणा ने गुरु नानक देव जी की कृपा से ‘अंगद’ नाम पाया और 1539 से 1552 तक गुरुगद्दी संभाली।

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उनके योगदान आज भी प्रासंगिक हैं। आइए, उनके जीवन, कार्यों और विरासत को जानें।

Guru मुखी लिपि का आविष्कार शिक्षा की क्रांति

Guru अंगद देव जी का सबसे बड़ा और क्रांतिकारी योगदान ‘गुरुमुखी’ लिपि का मानकीकरण और प्रचार था। उस समय शिक्षा और धर्मग्रंथ केवल संस्कृत जैसी जटिल भाषाओं तक सीमित थे, जिन्हें आम जनता नहीं समझ पाती थी। Guru साहिब ने महसूस किया कि यदि आध्यात्मिक ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाना है, तो उसे लोकभाषा में लाना होगा।उन्होंने पंजाबी की वर्णमाला को व्यवस्थित किया और उसे ‘गुरुमुखी’ (गुरु के मुख से निकली) का नाम दिया। उन्होंने बच्चों के लिए बाल-बोध (कायदे) बनवाए और खुद उन्हें पढ़ाया।

उन्होंने Guru नानक देव जी की वाणियों को संकलित किया और उन्हें गुरुमुखी में लिखवाया। इस कदम ने न केवल साक्षरता बढ़ाई, बल्कि उच्च वर्ग के बौद्धिक एकाधिकार को भी चुनौती दी। आज पंजाबी भाषा का जो स्वरूप हम देखते हैं, उसका श्रेय Guru अंगद देव जी के दूरदर्शी प्रयासों को ही जाता है।

प्रारंभिक जीवन और गुरु नानक से मुलाकात

Guru अंगद देव जी का मूल नाम लहणा था। वे दुर्गा भक्त थे और ज्वालाजी यात्रा का नेतृत्व करते थे। गुरु नानक देव जी की वाणी सुनकर प्रभावित होकर वे करतारपुर पहुँचे। कठिन परीक्षाओं में सफल होकर 1539 में दूसरे गुरु बने।

उनकी पत्नी माता खीवी जी ने सेवा में साथ दिया। खड़ूर साहिब को अपना केंद्र बनाया, जहाँ 13 वर्ष रहे।

लंगर प्रथा समानता का प्रतीक

Guru नानक देव जी द्वारा शुरू की गई ‘लंगर’ (सामुदायिक रसोई) की परंपरा को Guru अंगद देव जी ने एक संस्थागत रूप दिया। उन्होंने जात-पात, धर्म और वर्ग के भेदभाव को जड़ से खत्म करने के लिए यह अनिवार्य किया कि जो भी Guru से मिलने आएगा, उसे पहले ‘पंगत’ (एक कतार) में बैठकर लंगर छकना होगा।इस सेवा में उनकी पत्नी, माता खीवी जी का योगदान अतुलनीय रहा।

वे स्वयं लंगर की देखरेख करती थीं और प्रेमपूर्वक भोजन परोसती थीं। लंगर केवल भूख मिटाने का साधन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक क्रांति का एक मंच था जहाँ राजा और रंक, ब्राह्मण और अछूत एक साथ बैठकर भोजन करते थे। इसने समाज में भाईचारे और समानता के बीज बोए।

मल्ल अखाड़ा शारीरिक और आध्यात्मिक बल

स्वस्थ शरीर में स्वस्थ आत्मा का सिद्धांत अपनाया। खड़ूर साहिब में मल्ल अखाड़े बनवाए। युवाओं को कुश्ती-व्यायाम सिखाया। धर्म कायरों का नहीं, मजबूतों का मार्ग बताया।

63 शब्दों की रचना की, जो गुरु ग्रंथ साहिब में हैं। अहंकार त्याग, निष्काम सेवा पर जोर।

तरनतारन जिले का खड़ूर साहिब गुरु जी का कर्मक्षेत्र। आठ Guru की चरण रज प्राप्त। यहाँ लंगर, शिक्षा, खेल का संगम हुआ। 29 मार्च 1552 को ज्योति जोत समाई। गुरु अमर दास जी को योग्यता आधारित उत्तराधिकारी चुना।

सामाजिक प्रभाव और विरासत

पंजाब के तरनतारन जिले में स्थित खडूर साहिब केवल एक नगर नहीं, बल्कि सिख इतिहास की वह पवित्र धरती है, जहाँ दूसरे Guru अंगद देव जी ने अपने गुरुगद्दी काल के १३ वर्ष (१५३९-१५५२) व्यतीत किए। इस स्थान को ‘आठ गुरु साहिबान की चरण स्पर्श प्राप्त धरती’ होने का गौरव प्राप्त है, लेकिन गुरु अंगद देव जी के काल में यह सिख धर्म के प्रचार-प्रसार का मुख्य केंद्र बनकर उभरा।

नगर की स्थापना और गुरु साहिब का आगमन


खडूर साहिब एक प्राचीन गाँव था, लेकिन इसे आध्यात्मिक पहचान तब मिली जब Guru नानक देव जी के आदेशानुसार गुरु अंगद देव जी यहाँ आकर बस गए। Guru नानक देव जी ने ज्योति-जोत समाने से पहले भाई लहणा जी (गुरु अंगद देव जी) को निर्देश दिया था कि वे खडूर साहिब को अपना कार्यक्षेत्र बनाएँ। यहाँ रहकर उन्होंने सिख मत की नींव को संगठित और संस्थागत रूप दिया।

आधुनिक प्रासंगिकता

आज भेदभाव के दौर में लंगर समानता सिखाता है। Guru मुखी शिक्षा का प्रतीक। फिटनेस पर जोर स्वास्थ्य जागरूकता देता है।

चुनौतियाँ और सबक

उस समय धार्मिक कट्टरता थी, लेकिन सेवा से जीता। आज हम ‘सेवा करो, मेवा न मांगो’ अपनाएँ।

Guru अंगद देव जी मानवता के मार्गदर्शक बने। गुरुमुखी से शिक्षा, लंगर से समानता, अखाड़े से बल प्रदान किया। उनका जीवन सिखाता है – विनम्रता से महानता आती है। उनकी जयंती पर संकल्प लें, सेवा का मार्ग अपनाएँ। सिख धर्म की नींव मजबूत की, समाज को नई दिशा दी!

Guru अंगद देव जी का जीवन हमें सिखाता है कि महानता पद से नहीं, बल्कि सेवा और विनम्रता से आती है। उन्होंने शिक्षा, भाषा, स्वास्थ्य और सामाजिक समानता के जो प्रतिमान स्थापित किए, वे आज भी प्रेरणा के स्रोत हैं। Guru मुखी के रूप में उन्होंने पंजाब को उसकी पहचान दी और लंगर के माध्यम से दुनिया को मानवता का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया। आज जब हम उनके महान व्यक्तित्व को याद करते हैं, तो हमारे लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके द्वारा बताए गए ‘सेवा और सिमरन’ के मार्ग पर चलें।

वरुण कुमार
लेखन एवं कवि
Varun १४६९@gmail.com

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