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soil की गूंज में गूंजे भारत के बहुरंगी लोक सुर लोक संस्कृति का दिखा भव्य संगम

On: August 17, 2026 5:30 PM
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जमशेदपुर: भारतीय संस्कृति की विविधता और देश के अलग-अलग प्रांतों की समृद्ध लोक परंपराओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने वाला भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम soil की गूंज 16 अगस्त 2026 को जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया। कार्यक्रम का आयोजन पंडित चंद्रकांत आप्टे म्यूजिक फाउंडेशन, उत्तर प्रदेश संघ एवं संस्कार भारती के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

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कार्यक्रम में भारत के विभिन्न राज्यों की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता लोकगीतों, लोकनृत्यों और पारंपरिक प्रस्तुतियों के माध्यम से देखने को मिली। अलग-अलग भाषाओं में प्रस्तुत लोकगीतों ने सभागार में मौजूद दर्शकों को भारत की समृद्ध लोक संस्कृति से रूबरू कराया। कार्यक्रम का मूल संदेश यही रहा कि आधुनिकता और बदलते समय के बीच भी लोगों को अपनी माटी, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहना चाहिए।

दीप प्रज्वलन और ‘वंदे मातरम’ से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

‘माटी की गूंज’ कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ मुख्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। इसके बाद राष्ट्र वंदना ‘वंदे मातरम’ का सुमधुर गायन हुआ। राष्ट्रभक्ति और सांस्कृतिक भावनाओं से ओत-प्रोत इस शुरुआत ने पूरे कार्यक्रम को गरिमामय वातावरण प्रदान किया।

इस अवसर पर कला, साहित्य और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम में श्री गोविंद दोदराज, श्री शिव शंकर सिंह, श्री अखिलेश दुबे, श्रीमती मंजू ठाकुर, श्रीमती पूर्वी घोष एवं डॉ. रागिनी भूषण सहित कई विशिष्ट अतिथियों ने अपनी उपस्थिति से समारोह की गरिमा बढ़ाई।

फाउंडेशन की ओर से श्री सत्य प्रकाश तिवारी ने सभी आगंतुक अतिथियों का पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र यानी शॉल भेंट कर स्वागत और सम्मान किया।

लोक संस्कृति के संवर्धन पर दिया गया जोर

कार्यक्रम के दौरान उत्तर प्रदेश संघ के अध्यक्ष श्री अखिलेश दुबे ने ‘माटी की गूंज’ की विशेषता और लोक संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।

उन्होंने लोकगीतों और लोक परंपराओं को भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए इनके संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। लोक संस्कृति केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि यह पीढ़ियों से चली आ रही हमारी परंपराओं, जीवनशैली और सामाजिक मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।

भारत और भारतीय के संवाद ने दिया भावनात्मक संदेश

कार्यक्रम की सबसे विशेष प्रस्तुतियों में से एक श्री पंकज झा की मौलिक परिकल्पना पर आधारित ‘भारत’ और ‘भारतीय’ के बीच संवाद रहा।

मंच पर प्रस्तुत इस संवाद के माध्यम से आधुनिकता की तेज दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होती युवा पीढ़ी के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल रखा गया। प्रस्तुति में यह संदेश दिया गया कि जब युवा अपनी मिट्टी की खुशबू, लोक परंपराओं, लोकगीतों और संस्कृति से दूर होते हैं, तो देश की सांस्कृतिक आत्मा भी व्यथित होती है।

प्रस्तुति के माध्यम से दर्शकों से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने और लोकगीतों एवं लोक परंपराओं को समझने तथा उनका आनंद लेने का आत्मीय आग्रह किया गया।

अनिकेत और वंदना के अभिनय ने जीता दर्शकों का दिल

मंच पर ‘भारत’ और ‘भारतीय’ के जीवंत पात्रों का अभिनय श्री अनिकेत एवं सुश्री वंदना ने किया। दोनों कलाकारों ने संवाद और अभिनय के माध्यम से विषय की भावनात्मक गहराई को प्रभावी ढंग से दर्शकों तक पहुंचाया।

उनके सशक्त अभिनय और प्रस्तुति को दर्शकों की खूब सराहना मिली। कार्यक्रम के दौरान कई अवसरों पर सभागार तालियों से गूंज उठा।

झारखंडी लोक नृत्य से हुई सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत

सांस्कृतिक संध्या की शुरुआत करीम सिटी कॉलेज के बी.एड. संकाय के छात्र-छात्राओं द्वारा प्रस्तुत ऊर्जावान झारखंडी लोक नृत्य से हुई।

झारखंड की लोक संस्कृति और परंपराओं को दर्शाती इस प्रस्तुति ने शुरुआत से ही पूरे सभागार का माहौल जीवंत कर दिया। विद्यार्थियों ने पूरे उत्साह और तालमेल के साथ नृत्य प्रस्तुत किया।

झारखंडी लोक नृत्य के बाद भारत के विभिन्न राज्यों और क्षेत्रों की लोक परंपराओं को दर्शाने वाली प्रस्तुतियों का सिलसिला शुरू हुआ।

बांग्ला संकीर्तन और लोकगीत ने बांधा समां

कार्यक्रम में श्री नीलकमल ने बांग्ला संकीर्तन एवं कीर्तन की प्रस्तुति दी। इसके बाद श्री सुब्रतो ने बांग्ला लोकगीत प्रस्तुत कर बंगाल की लोक संगीत परंपरा से दर्शकों को परिचित कराया।

दोनों प्रस्तुतियों में बांग्ला भाषा और वहां की सांस्कृतिक विरासत की सुंदर झलक देखने को मिली। दर्शकों ने प्रस्तुतियों का आनंद लिया और कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

भोजपुरी लोकगीत में दिखी मिट्टी की मिठास

श्री मुन्ना तिवारी ने भोजपुरी लोकगीत की प्रस्तुति दी। उनके गीत में भोजपुरी अंचल की मिट्टी, लोक जीवन और आम जनमानस की भावनाओं की झलक दिखाई दी।

भोजपुरी लोकगीत की प्रस्तुति ने दर्शकों को अपनी जड़ों और ग्रामीण जीवन की यादों से जोड़ने का काम किया।

मैथिली युगल गीत ने मोहा मन

श्री पंकज झा एवं श्रीमती पद्मा झा ने पारंपरिक मैथिली युगल गीत प्रस्तुत किया। दोनों की प्रस्तुति में मैथिली भाषा और मिथिला की लोक परंपरा की सुंदरता देखने को मिली।

युगल गीत ने कार्यक्रम में एक अलग रंग भर दिया और दर्शकों ने तालियों के साथ कलाकारों का स्वागत किया।

ओड़िया और मराठी लोकगीतों की भी रही धूम

कार्यक्रम में सुश्री इंद्राणी सरकार ने ओड़िया लोकगीत प्रस्तुत किया। इसके बाद श्री भास्कर जोशी एवं सुश्री बॉबी ने मराठी लोकगीत की प्रस्तुति देकर महाराष्ट्र की लोक संगीत परंपरा को मंच पर जीवंत किया।

दोनों प्रस्तुतियों ने यह संदेश दिया कि भारत की पहचान उसकी भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में ही निहित है।

पहाड़ी और राजस्थानी लोकगीतों ने बढ़ाई सांस्कृतिक रंगत

डॉ. रागिनी भूषण ने सुरीला पहाड़ी लोकगीत प्रस्तुत किया। पहाड़ी लोकधुनों की मधुरता ने दर्शकों को खूब आकर्षित किया।

इसके बाद डॉ. सनातन दीप ने मरुधरा का राजस्थानी लोकगीत प्रस्तुत किया। राजस्थान की लोक संस्कृति, परंपरा और संगीत की झलक ने कार्यक्रम की रंगत और बढ़ा दी।

इन प्रस्तुतियों के माध्यम से दर्शकों को भारत के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों की लोक परंपराओं को समझने और महसूस करने का अवसर मिला।

उत्तर प्रदेश के पारंपरिक लोक संगीत की प्रस्तुति

श्रीमती दीप्ति झा एवं सुश्री रूबी पांडे ने उत्तर प्रदेश का पारंपरिक लोक संगीत प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में उत्तर प्रदेश की लोक संस्कृति और पारंपरिक संगीत की झलक देखने को मिली।

कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश संघ की सहभागिता के बीच इस प्रस्तुति ने समारोह को विशेष सांस्कृतिक रंग प्रदान किया।

पंजाबी लोकगीत ने बढ़ाया उत्साह

सुश्री अमृत कौर ने ऊर्जावान पंजाबी लोकगीत प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने पूरे सभागार में उत्साह भर दिया।

पंजाबी लोकगीत की ऊर्जा और जोश ने दर्शकों को खूब प्रभावित किया और कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने तालियों के साथ कलाकार का उत्साह बढ़ाया।

देशभक्ति से ओत-प्रोत देशगीत ने बांधा समां

कार्यक्रम के अंतिम चरण में श्री शंकर नाथ झा ने राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत देशगीत प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति ने पूरे कार्यक्रम को देशभक्ति की भावना से जोड़ दिया।

विभिन्न राज्यों के लोकगीतों और नृत्यों के बाद देशगीत ने समारोह को एकता और राष्ट्रीय भावना के संदेश के साथ आगे बढ़ाया।

भारत की ‘अनेकता में एकता’ का दिखा सुंदर रूप

‘माटी की गूंज’ कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता रही। बंगाल से लेकर झारखंड, भोजपुरी क्षेत्र, मिथिला, ओडिशा, महाराष्ट्र, पहाड़ी क्षेत्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पंजाब तक की लोक परंपराएं एक ही मंच पर दिखाई दीं।

अलग-अलग भाषाओं में प्रस्तुत गीतों के बावजूद कार्यक्रम की मूल भावना एक रही—भारत की संस्कृति और अपनी मिट्टी से जुड़ाव।

इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि भाषा, वेशभूषा और क्षेत्र अलग हो सकते हैं, लेकिन भारत की सांस्कृतिक आत्मा सभी को एक सूत्र में जोड़ती है।

मंच संचालन ने कार्यक्रम को बनाया प्रभावी

पूरे कार्यक्रम का कुशल और ओजस्वी मंच संचालन श्रीमती माहेश्वरी दुबे ने किया। उन्होंने अपनी प्रभावी प्रस्तुति और मंच संचालन शैली से कार्यक्रम को व्यवस्थित और जीवंत बनाए रखा।

उन्होंने अलग-अलग कलाकारों और प्रस्तुतियों का परिचय देते हुए कार्यक्रम को सहज रूप से आगे बढ़ाया। उनके संचालन को भी उपस्थित लोगों की सराहना मिली।

आयोजन की सफलता में इनका रहा विशेष योगदान

‘माटी की गूंज’ के सफल आयोजन में श्री अखिलेश दुबे, डॉ. रागिनी भूषण, श्री पंकज कुमार झा, श्री सत्य प्रकाश तिवारी, श्री शंकर नाथ झा एवं करीम सिटी कॉलेज के बी.एड. के विद्यार्थियों का विशेष योगदान रहा।

सभी के सामूहिक प्रयास से कार्यक्रम को भव्य और सफल रूप दिया जा सका। कलाकारों, विद्यार्थियों, आयोजकों और सहयोगियों ने मिलकर भारतीय लोक संस्कृति की विविधता को एक मंच पर प्रस्तुत किया।

आधुनिकता के बीच संस्कृति से जुड़े रहने का संदेश

soil की गूंज’ केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि इसने आधुनिक समय में अपनी सांस्कृतिक जड़ों को बचाए रखने का महत्वपूर्ण संदेश भी दिया।

आज की युवा पीढ़ी तेजी से बदलती तकनीक और आधुनिक जीवनशैली के बीच अपनी पारंपरिक संस्कृति से दूर होती जा रही है। ऐसे समय में लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक कलाएं नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती हैं।

कार्यक्रम ने लोगों को यह याद दिलाया कि आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी माटी, भाषा, लोकगीत, लोकनृत्य और परंपराओं को नहीं भूलना चाहिए।

राष्ट्रगान के साथ हुआ गरिमामय समापन

विभिन्न राज्यों की लोक प्रस्तुतियों, गीत-संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजी इस शानदार शाम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

राष्ट्रगान के दौरान सभागार में मौजूद सभी लोग सम्मानपूर्वक खड़े रहे। इस भावपूर्ण क्षण के साथ ‘माटी की गूंज’ कार्यक्रम का गरिमामय समापन हुआ।

soil की गूंज’ ने जमशेदपुर में भारतीय लोक संस्कृति की विविधता और समृद्ध परंपरा को एक मंच पर प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया। पंडित चंद्रकांत आप्टे म्यूजिक फाउंडेशन, उत्तर प्रदेश संघ एवं संस्कार भारती के संयुक्त आयोजन में विभिन्न राज्यों के लोकगीतों और नृत्यों ने दर्शकों को भारत की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा।

कार्यक्रम में झारखंडी, बांग्ला, भोजपुरी, मैथिली, ओड़िया, मराठी, पहाड़ी, राजस्थानी, उत्तर प्रदेश और पंजाबी लोक संगीत की प्रस्तुतियों ने ‘अनेकता में एकता’ की भावना को मजबूत किया।

‘माटी की गूंज’ का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही रहा कि समय कितना भी बदल जाए, अपनी मिट्टी और संस्कृति से जुड़ाव हमेशा हमारी पहचान का आधार रहेगा।

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