“पीस रही हैं निरीह जो
वो तो देश की भविष्य है।
पक्ष विपक्ष की राजनीत में
छुपी स्वार्थ की रहस्य है।।
दोनों जिसे औजार समझा
देश के पीड़ित वो छात्र थे।
राजनीति से वास्ता नहीं
वास्ता भविष्य मात्र थे।।
नई आग की धधक थी
जिसे विपक्ष ने दिया हवा।
जो उकसावे में हदे लांघी
शांति को किया तवाह।।

घिनौने खेल दोनों खेले
अपने अपने अंदाजों में।
अब भी वही खेल रहे हैं
दोनों ओर गेंदबाजों ने।।
छात्रों की कोई चिंता नहीं
आंसू इनके घड़ियाली है।
“पैपर लीक” तो इनके लिए
मानो चाय की प्याली है।।
सबके काल में सब लिया है
चुस्की इसकी अपनी ढंग से।
जरूरत पड़ी तो रंग दी इसे
राजनीति की स्वार्थी रंग से।।
सहमर्मी गर इतने थे तुम
संसद में देते इनके आवाज।
उकसाने का मतलब क्या था
बनवाने इन्हें पत्थरबाज?
शुरू में ही इनके बात को
क्यों तुम भी मानी नहीं ?
सत्ता में चूर इनके व्यथा
क्या तुमने जानी नहीं?
छात्र हो तुम शिक्षित हो
निषेधाज्ञा था पता होना।
हद को गर पार किया तो
हश्र बुरा का खता होना।।
राजनीत से ऊपर उठ कर
‘सत्ता हट’ को दूर भगाओ।
न्याय दो देश के भविष्य को
पत्थरबाज उन्हें मत बनाओ।।
चिंगारी को मत ललकारो
आग अभी धधकी नहीं है।
पक्ष विपक्ष संभल जाओ
धधकी आग अच्छी नहीं है।।”
– करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम झारखंड
कविता का भावार्थ
यह कविता वर्तमान समय में छात्रों के आंदोलनों, पेपर लीक जैसी घटनाओं और उन पर होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। कवि करुणामय मंडल ने इसमें यह संदेश देने का प्रयास किया है कि देश के छात्र राष्ट्र का भविष्य हैं और उन्हें राजनीतिक स्वार्थ का माध्यम नहीं बनाया जाना चाहिए।
कवि कहते हैं कि आज जो छात्र कठिनाइयों और अन्याय का सामना कर रहे हैं, वे देश की आने वाली पीढ़ी हैं। लेकिन राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के लिए उनकी भावनाओं का उपयोग कर रहे हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों ही छात्रों को अपने राजनीतिक लाभ के लिए एक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं, जबकि छात्रों का उद्देश्य केवल अपने भविष्य को सुरक्षित करना होता है।
कवि के अनुसार, पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं पर दोनों पक्ष समय-समय पर राजनीति करते रहे हैं। जब सत्ता में रहते हैं तो समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकालते और विपक्ष में आने पर उसी मुद्दे को राजनीतिक हथियार बना लेते हैं। छात्रों के प्रति उनकी संवेदनाएं वास्तविक कम और राजनीतिक अधिक प्रतीत होती हैं।
कविता में यह भी कहा गया है कि यदि विपक्ष वास्तव में छात्रों के हितैषी होता, तो उनकी समस्याओं को संसद और संवैधानिक मंचों पर मजबूती से उठाता, न कि उन्हें उग्र आंदोलन या टकराव की ओर प्रेरित करता। दूसरी ओर, सत्ता पक्ष पर भी आरोप है कि उसने समय रहते छात्रों की पीड़ा को गंभीरता से नहीं समझा और उनकी समस्याओं का समाधान करने में देर की।
कवि छात्रों को भी संयम और कानून का पालन करने की सलाह देते हैं। उनका कहना है कि शिक्षित होने के नाते छात्रों को यह समझना चाहिए कि विरोध लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से होना चाहिए। हिंसा, निषेधाज्ञा का उल्लंघन और पत्थरबाजी जैसे कदम उनके आंदोलन को कमजोर करते हैं और उनके भविष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालते हैं।
अंत में कवि सत्ता और विपक्ष दोनों से आग्रह करते हैं कि वे राजनीति से ऊपर उठकर देश के युवाओं के भविष्य को प्राथमिकता दें। छात्रों को न्याय मिले, उनकी समस्याओं का समाधान हो और उन्हें किसी भी प्रकार की हिंसा या राजनीतिक संघर्ष का हिस्सा न बनाया जाए। कवि चेतावनी देते हैं कि छोटी-सी चिंगारी भी यदि भड़क गई तो वह बड़े संकट का रूप ले सकती है, इसलिए सभी पक्षों को समय रहते जिम्मेदारी और संयम का परिचय देना चाहिए।
मुख्य संदेश: देश का भविष्य छात्रों के हाथों में है। इसलिए राजनीतिक दलों को उनके भविष्य के साथ राजनीति नहीं करनी चाहिए और छात्रों को भी अपने अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण एवं कानूनसम्मत तरीके से संघर्ष करना चाहिए।
















