जमशेदपुर। तुलसी जयंती के पावन अवसर पर प्रत्येक वर्ष सिंहभूम जिला हिन्दी साहित्य सम्मेलन/तुलसी भवन द्वारा साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले किसी एक मूर्धन्य साहित्यकार को प्रतिष्ठित ‘तुलसी सारस्वत सम्मान’ प्रदान किया जाता है। बिहार और झारखंड के प्रमुख गैर-सरकारी साहित्यिक सम्मानों में शुमार इस सम्मान के लिए वर्ष 2026 में प्रख्यात साहित्यकार, चिंतक और भाषाविद् आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ का चयन किया गया है।
तुलसी भवन की कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया। आचार्य चेतन वर्ष 1976 से तुलसी भवन की साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं और हिंदी, संस्कृत तथा भोजपुरी साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय माना जाता है। वर्तमान में उनका निवास रांची (झारखंड) में है।
23 अगस्त को होगा सम्मान समारोह
तुलसी जयंती समापन समारोह के अवसर पर 23 अगस्त 2026 को आयोजित विशेष कार्यक्रम में आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ को अंगवस्त्र, श्रीफल, पुष्पगुच्छ, सम्मान-पत्र तथा ₹51,000 की सम्मान राशि का चेक प्रदान किया जाएगा।
इस प्रतिष्ठित सम्मान से पूर्व डॉ. त्रिभुवन ओझा, दिनेश्वर सिंह ‘दिनेश’, पद्मश्री अशोक भगत, पुरुषोत्तम झुनझुनवाला, डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय, कमलेश कमल तथा मयंक मुरारी जैसे साहित्यकार और विद्वान सम्मानित हो चुके हैं।
साहित्य साधना का छह दशक से अधिक का सफर
19 मार्च 1942 को बिहार के भोजपुर जिले के चारघाट गांव में जन्मे आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ के पिता स्वर्गीय रामछबीला त्रिपाठी संस्कृत के विद्वान एवं भोजपुरी के प्रतिष्ठित कवि थे, जबकि माता स्वर्गीय राजमणि देवी थीं।
उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए. तथा संस्कृत साहित्य, सांख्य दर्शन और व्याकरण में आचार्य की उपाधि प्राप्त की। वाराणसी के नंदराज बाजोरिया महाविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ उन्होंने देशभर के शैक्षणिक एवं साहित्यिक संस्थानों में व्याख्यान दिए तथा ‘वाक्यवट प्रकाशन’ की स्थापना कर साहित्य सेवा को नई दिशा दी।

हिंदी और भोजपुरी साहित्य को दी नई ऊंचाई
आचार्य चेतन ने हिंदी और भोजपुरी साहित्य में अनेक महत्वपूर्ण कृतियों की रचना की है। हिंदी में ‘प्रेममयी शबरी’, ‘उलगुलान की आग’, ‘समय की चीख’, ‘मदालसा’, ‘अंगूठे का निशान’, ‘दो पल अतीत के’ जैसी चर्चित कृतियां उनके साहित्यिक वैभव की पहचान हैं।
वहीं भोजपुरी साहित्य में ‘उबियान’, ‘माटी गावे गीत’, ‘भीतर आंत धुंआत बा’, ‘सावन के झींसी’, ‘नंद नंदन’, ‘लोकगंधी संस्कारगीत’ सहित अनेक काव्य, गीत और आलोचनात्मक ग्रंथों की रचना कर उन्होंने भोजपुरी भाषा को समृद्ध बनाया।
इसके अलावा उन्होंने कई प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया तथा कन्नड़ सहित अन्य भाषाओं के महत्वपूर्ण ग्रंथों का भोजपुरी में अनुवाद भी किया।
साहित्य पर हो रहा शोध
आचार्य चेतन की रचनाओं पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में शोध कार्य जारी है। उनकी कई हिंदी कहानियों का तमिल भाषा में अनुवाद हो चुका है। उनके साहित्य पर पीएचडी और डी.लिट. स्तर के शोध कार्य भी प्रगति पर हैं। उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर कई आलोचनात्मक और शोध ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं।
अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से हो चुके हैं सम्मानित
आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ को झारखंड सरकार के कार्मिक, प्रशासनिक एवं राजभाषा विभाग, महात्मा गांधी हिंदी विद्यापीठ (अहमदाबाद), वसव समिति (बेंगलुरु), हिंदी साहित्य सम्मेलन (गाजियाबाद), डॉ. निर्भीक स्मृति सम्मान, काव्यालंकार सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है।
सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में भी सक्रिय
साहित्य सृजन के साथ-साथ आचार्य चेतन विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं का नेतृत्व करते रहे हैं। उन्होंने ‘फूही फूही’ भोजपुरी संस्था तथा ‘हिंदी साहित्य संकल्प संधान पीठ’ की स्थापना की। हिंदी, भोजपुरी एवं जनजातीय साहित्य को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से उन्होंने ‘राजमणि सम्मान समारोह’ की शुरुआत भी की, जिसके माध्यम से हर वर्ष साहित्यकारों को सम्मानित किया जाता है। वे अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
साहित्य जगत में खुशी की लहर
आचार्य हरेराम त्रिपाठी ‘चेतन’ के ‘तुलसी सारस्वत सम्मान 2026’ के लिए चयन पर साहित्यकारों, शिक्षाविदों और हिंदी-भोजपुरी प्रेमियों ने प्रसन्नता व्यक्त की है। साहित्य जगत का मानना है कि यह सम्मान उनके छह दशकों से अधिक समय तक किए गए साहित्यिक, सांस्कृतिक और भाषाई योगदान का उचित सम्मान है तथा नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध होगा।
















