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तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं टिप्पणी को हाई कोर्ट ने माना उकसावा Wife की हत्या मामले में पति की उम्रकैद घटाकर 7 साल की सजा

On: June 27, 2026 6:21 PM
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भोपाल: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने Wife की हत्या के एक चर्चित मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए आरोपी पति की उम्रकैद की सजा को घटाकर सात वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया है। अदालत ने माना कि घटना पूर्व नियोजित नहीं थी, बल्कि पति-पत्नी के बीच हुए अचानक विवाद और पत्नी की कथित टिप्पणी के बाद आरोपी ने अपना आत्मसंयम खो दिया था।

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हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि Wife द्वारा कथित रूप से “तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं” जैसी टिप्पणी करना गंभीर और अचानक उकसावे (Grave and Sudden Provocation) की श्रेणी में माना जा सकता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आरोपी द्वारा पत्नी की मृत्यु का कारण बनने वाला कृत्य अपराध है, लेकिन मामले की परिस्थितियों को देखते हुए इसे हत्या के बजाय अलग कानूनी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा

इस मामले में निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने आरोपी पति को पत्नी की हत्या का दोषी मानते हुए आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में संशोधन करते हुए आरोपी की सजा को कम कर सात वर्ष के सश्रम कारावास में परिवर्तित कर दिया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के चौरई क्षेत्र का है। रिकॉर्ड के अनुसार, 18 और 19 जुलाई की रात पति शिवा और उसकी पत्नी किरण के बीच कुलबहेरी नदी स्थित खर्रा घाट के पास किसी बात को लेकर विवाद हो गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, विवाद के दौरान पत्नी ने कथित रूप से अपने पति से कहा कि “तुम्हारे जैसे 1000 पति रख सकती हूं।” आरोप है कि इस टिप्पणी से आक्रोशित होकर शिवा ने पास में पड़ा पत्थर उठाकर पत्नी पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

घटना के बाद आरोपी ने स्वयं पुलिस और पत्नी के परिजनों को फोन कर पूरी घटना की जानकारी दी थी।

हाई कोर्ट ने किन आधारों पर बदली सजा?

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयान और घटना की परिस्थितियों का विस्तार से परीक्षण किया।

अदालत ने माना कि आरोपी द्वारा किए गए हमले के कारण ही महिला की मृत्यु हुई, लेकिन रिकॉर्ड से यह साबित नहीं होता कि आरोपी पहले से हत्या की योजना बनाकर वहां पहुंचा था।

कोर्ट ने कहा कि घटना अचानक हुए झगड़े के दौरान हुई और आरोपी ने आवेश में आकर हमला किया। इसलिए इस मामले में पूर्व नियोजित हत्या (Pre-planned Murder) का तत्व स्पष्ट रूप से साबित नहीं होता।

टिप्पणी पति के सम्मान और अस्तित्व पर चोट

अपने फैसले में हाई कोर्ट की बेंच ने कहा कि पत्नी की कथित टिप्पणी केवल वैवाहिक संबंधों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उससे पति के सम्मान और उसके मानवीय अस्तित्व को भी ठेस पहुंचती है।

अदालत ने माना कि ऐसी टिप्पणी के कारण आरोपी ने अचानक अपना मानसिक संतुलन खो दिया और आवेश में अपराध कर बैठा। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उकसावा अपराध को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, बल्कि अपराध की प्रकृति के मूल्यांकन में एक महत्वपूर्ण परिस्थिति के रूप में देखा जाता है।

घटना के बाद आरोपी के व्यवहार को भी माना महत्वपूर्ण

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया कि यदि आरोपी पहले से हत्या की योजना बनाकर गया होता, तो घटना के बाद वह मौके से फरार हो जाता और पुलिस या मृतका के परिजनों को सूचना नहीं देता।

इसके विपरीत, आरोपी ने स्वयं पुलिस और पत्नी के रिश्तेदारों को फोन कर घटना की जानकारी दी। अदालत ने इसे इस बात का संकेत माना कि घटना अचानक हुई और आरोपी ने अपराध छिपाने का प्रयास नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

डिवीजन बेंच ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति गंभीर और अचानक उकसावे के कारण अपना आत्मसंयम खो देता है, तो अपराध की प्रकृति का आकलन उसी कानूनी सिद्धांत के अनुसार किया जाना चाहिए।

अदालत ने कहा कि प्रत्येक मामले की परिस्थितियां अलग होती हैं और केवल परिणाम को देखकर नहीं, बल्कि घटना तक पहुंचने वाली परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना आवश्यक होता है।

बार-बार हमला करने के पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले

हाई कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट और उपलब्ध साक्ष्यों का भी विश्लेषण किया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं होता कि आरोपी ने बार-बार पत्थर से हमला किया था।

कोर्ट ने यह संभावना भी जताई कि मृतका के शरीर पर पाई गई कुछ चोटें घटनास्थल पर मौजूद पत्थरों पर गिरने के कारण भी हो सकती हैं। इस पहलू को भी अदालत ने अपने निर्णय में महत्वपूर्ण माना।

बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?

आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत में तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने कहा कि मामले में कई साक्ष्यों में विरोधाभास है और अभियोजन पक्ष हत्या की पूर्व योजना साबित करने में असफल रहा।

बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि आरोपी का घटना के बाद का व्यवहार इस बात का संकेत देता है कि उसने अपराध छिपाने की कोशिश नहीं की, बल्कि स्वयं इसकी जानकारी पुलिस को दी।

फैसले का कानूनी महत्व

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला इस सिद्धांत को दोहराता है कि प्रत्येक आपराधिक मामले में अदालत केवल अपराध के परिणाम को नहीं, बल्कि घटना की परिस्थितियों, आरोपी की मानसिक स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों का भी विस्तृत परीक्षण करती है।

यह निर्णय किसी भी प्रकार की हिंसा या हत्या को उचित नहीं ठहराता, बल्कि यह दर्शाता है कि भारतीय कानून में ‘गंभीर और अचानक उकसावे’ जैसी परिस्थितियों का प्रभाव अपराध की कानूनी श्रेणी और सजा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में आरोपी को दोषमुक्त नहीं किया है, बल्कि यह माना है कि उसकी कार्रवाई से Wife की मृत्यु हुई। हालांकि अदालत ने यह भी निष्कर्ष निकाला कि घटना पूर्व नियोजित नहीं थी और अचानक हुए विवाद व कथित उकसावे के कारण आरोपी ने आत्मसंयम खो दिया। इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को संशोधित करते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास में बदल दिया गया।

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