
“The future will survive only if mountains and rivers survive”.
- जमशेदपुर में उठी पहाड़ और नदियों को बचाने की आवाज, 22-23 मई को होगी राष्ट्रीय संगोष्ठी
Environmental Protection: झारखंड के जमशेदपुर में पर्यावरण संरक्षण को लेकर एक बड़ा राष्ट्रीय विमर्श शुरू होने जा रहा है। सोमवार 11 मई 2026 को आयोजित एक प्रेस सम्मेलन में सामाजिक कार्यकर्ताओं और पर्यावरण चिंतकों ने कहा कि देशभर की पर्वत श्रृंखलाएं और नदियां गंभीर संकट से गुजर रही हैं। अवैज्ञानिक खनन, अतिक्रमण, बांध परियोजनाओं, अनियंत्रित शहरीकरण और प्रदूषण ने प्राकृतिक संसाधनों के अस्तित्व पर खतरा पैदा कर दिया है।

सम्मेलन में कहा गया कि भारत में अभी तक पहाड़ों और नदियों की सुरक्षा एवं पुनर्जनन के लिए कोई व्यापक और सशक्त केंद्रीय कानून मौजूद नहीं है। यही कारण है कि इनके संरक्षण को लेकर संवैधानिक और कानूनी ढांचे की मांग तेज हो गई है।
22 और 23 मई को जमशेदपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी
इस गंभीर विषय पर व्यापक चर्चा के लिए 22 और 23 मई 2026 को जमशेदपुर के Motilal Nehru Public School सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी।
यह संगोष्ठी जल संरक्षण के लिए देशभर में प्रसिद्ध Rajendra Singh तथा विधायक Saryu Roy के संरक्षण में आयोजित होगी।
संगोष्ठी में देशभर से पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, न्यायविद, सामाजिक कार्यकर्ता, प्रशासनिक अधिकारी और जल विशेषज्ञ शामिल होंगे। विचार-विमर्श के बाद “भारतीय पर्वत संरक्षण एवं संवर्धन अधिनियम” तथा “नदियों के संरक्षण एवं पुनर्जनन अधिनियम” के प्रारूप तैयार किए जाएंगे, जिन्हें भारत सरकार को सौंपने की योजना है।

“पहाड़ और नदियों की कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं”
प्रेस वार्ता में संयोजक दिनेश मिश्र ने कहा कि वर्तमान में पहाड़ों और नदियों की कोई स्पष्ट वैधानिक परिभाषा तय नहीं है। यही वजह है कि इनके संरक्षण का कार्य बेहद कठिन हो गया है।
उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 48A और 51A(ग) पर्यावरण संरक्षण का दायित्व राज्य और नागरिक दोनों को सौंपते हैं, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर पहाड़ और नदियां लगातार नष्ट हो रही हैं।
उनके अनुसार हिमालय, पश्चिमी घाट, अरावली, विंध्य, सतपुड़ा और नीलगिरि जैसी पर्वत श्रृंखलाएं जलवायु परिवर्तन, खनन, वनों की कटाई और अवसंरचना विस्तार के कारण खतरे में हैं।
प्रस्तावित पर्वत संरक्षण कानून में क्या होगा खास?
प्रस्तावित कानून में पर्वतीय क्षेत्रों को पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर चिन्हित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके तहत—
- बड़े पैमाने पर खनन और विस्फोट पर रोक
- जंगलों की कटाई पर प्रतिबंध
- हिमनदों और जलस्रोतों की सुरक्षा
- बड़े बांधों और हाई-रिस्क परियोजनाओं पर नियंत्रण
- 20 कमरों से बड़े होटलों पर सीमा
- 3500 मीटर से ऊपर सड़क निर्माण पर नियमन
- 10 मेगावाट से बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं पर प्रतिबंध जैसी सिफारिशें शामिल की गई हैं।
साथ ही स्थानीय आदिवासी और पारंपरिक समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने की भी बात कही गई है।

“नदियां बीमार हो रही हैं, उन्हें चिकित्सा की जरूरत”
नदियों के संरक्षण से जुड़े प्रस्ताव में कहा गया कि आज देश की अधिकांश नदियां अतिक्रमण, प्रदूषण और अत्यधिक दोहन के कारण “गंदे नाले” बनती जा रही हैं।
प्रस्ताव में कहा गया कि नदी पुनर्जनन केवल सफाई अभियान नहीं बल्कि उनकी पूरी पारिस्थितिकी और प्राकृतिक प्रवाह को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया है।
इसमें नदी पंचायत, स्थानीय निगरानी व्यवस्था, जल उपयोग का सामाजिक लेखा-जोखा और प्रदूषण फैलाने वालों पर सख्त कार्रवाई का सुझाव दिया गया है।
कई राष्ट्रीय विशेषज्ञ होंगे शामिल
संगोष्ठी में शामिल होने के लिए कई प्रमुख विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों ने सहमति दी है। इनमें न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) गोपाल गावड़ा, डॉ. पीयूष कांत पांडेय, प्रो. अंशुमाली, सिद्धार्थ त्रिपाठी (IFS), डॉ. राम बूझ, दीपक परबतियार, विभूति देबरामा, बी. सत्यनारायण, संजय उपाध्याय, डॉ. एस.एन. पाठक, अधिवक्ता ए.के. कश्यप और डॉ. गोपाल शर्मा प्रमुख हैं।
पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय आंदोलन बनाने की तैयारी
आयोजकों का कहना है कि अब समय आ गया है कि नदी और पर्वत संरक्षण को केवल सरकारी योजना नहीं बल्कि राष्ट्रीय जन आंदोलन बनाया जाए। उनका मानना है कि यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में जल संकट, भूस्खलन, बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएं और भयावह रूप ले सकती हैं।
विशेष बात
इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं बल्कि संसद के लिए ठोस विधायी प्रारूप तैयार करना है, ताकि पहाड़ों और नदियों को संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मिल सके।
विधायक Saryu Roy द्वारा पहाड़ों और नदियों के संरक्षण जैसे अत्यंत गंभीर और भविष्य से जुड़े विषय पर पहल करना न केवल झारखंड बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणादायक कदम माना जा रहा है। आज जब विकास की अंधी दौड़ में प्राकृतिक संसाधनों का लगातार दोहन हो रहा है, ऐसे समय में समाज, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के हित में इस प्रकार की राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित करना दूरदर्शी नेतृत्व का परिचायक है।
इस अभियान में जलपुरुष Rajendra Singh सहित देशभर से जुड़े न्यायविदों, वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों, शिक्षाविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की सहभागिता यह दर्शाती है कि अब प्रकृति संरक्षण केवल एक मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना का विषय बन चुका है। यह पहल समाज को एक मजबूत संदेश देती है कि यदि नदियां और पहाड़ सुरक्षित रहेंगे तभी जल, जंगल, जमीन और मानव सभ्यता सुरक्षित रह पाएगी। आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, सुरक्षित पर्यावरण और संतुलित प्रकृति देने के लिए सरकार, समाज और नागरिकों को मिलकर आगे आना होगा।













