
इस्लामाबाद/लाहौर: पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में पुलिस कार्रवाई को लेकर एक बेहद गंभीर मामला सामने आया है। देश के प्रमुख मानवाधिकार संगठन Human Rights Commission of Pakistan (HRCP) की एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अप्रैल 2025 से दिसंबर 2025 के बीच पंजाब पुलिस की एक विशेष यूनिट द्वारा 900 से अधिक लोगों की कथित तौर पर ‘एनकाउंटर’ में हत्या की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब पुलिस की Crime Control Department (CCD) नाम की विशेष यूनिट, जिसे संगठित अपराध पर नियंत्रण के लिए बनाया गया था, अब विवादों में घिर गई है। HRCP का आरोप है कि यह यूनिट कानूनन गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया अपनाने के बजाय सीधे मुठभेड़ के जरिए आरोपियों को मार रही है, जिसे मानवाधिकारों का उल्लंघन और अवैध हत्या की श्रेणी में रखा जाता है।
आंकड़ों की बात करें तो रिपोर्ट में बताया गया है कि इस अवधि में 670 से अधिक एनकाउंटर हुए, जिनमें कुल 924 संदिग्धों की मौत हुई। इन घटनाओं का सबसे ज्यादा असर लाहौर, फैसलाबाद और शेखुपुरा जैसे शहरों में देखने को मिला। यह संख्या इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि पूरे वर्ष 2024 में पंजाब और सिंध प्रांत मिलाकर 341 लोगों की ही मौत एनकाउंटर में हुई थी, जबकि यहां सिर्फ आठ महीनों में यह आंकड़ा दोगुने से भी ज्यादा पहुंच गया।
इस रिपोर्ट में एक पीड़ित परिवार की कहानी भी सामने आई है, जिसने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। जुबैदा बीबी नाम की महिला ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उनके घर पर छापा मारकर नकदी, गहने और अन्य सामान जब्त कर लिया और उनके परिवार के पांच सदस्यों को उठा ले गई। महिला का कहना है कि मात्र 24 घंटे के भीतर उनके सभी परिजनों को अलग-अलग स्थानों पर एनकाउंटर में मार दिया गया। परिवार का दावा है कि उनके बेटे निर्दोष थे और पुलिस ने केस वापस लेने के लिए उन्हें धमकाया भी।
HRCP ने अपनी रिपोर्ट में यह भी कहा है कि इन एनकाउंटर मामलों में एक जैसा पैटर्न देखने को मिलता है। कई FIR और पुलिस रिपोर्ट में लगभग एक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि घटनाओं को एक ही तरीके से तैयार किया गया है। इसके अलावा, कई परिवारों ने आरोप लगाया कि उन्हें शवों को तुरंत दफनाने के लिए दबाव डाला गया, ताकि पोस्टमार्टम जैसी प्रक्रिया पूरी न हो सके।
हालांकि, पंजाब सरकार और पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया है कि उनकी कार्रवाई पूरी तरह से कानून के दायरे में है और इससे अपराध में करीब 60 प्रतिशत तक कमी आई है। पुलिस का कहना है कि ये सभी एनकाउंटर आत्मरक्षा में किए गए हैं और यह एक इंटेलिजेंस आधारित अभियान का हिस्सा है। इसके विपरीत, HRCP का मानना है कि भले ही अपराध कम हुआ हो, लेकिन कानून को दरकिनार करके इस तरह की कार्रवाई किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक है।
विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति, कमजोर जांच प्रणाली और राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस इस तरह के शॉर्टकट अपनाने लगी है। उनका कहना है कि अगर इस प्रवृत्ति को नहीं रोका गया, तो भविष्य में निर्दोष लोग भी इसका शिकार हो सकते हैं और यह व्यवस्था कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है।
अंत में, यह पूरा मामला सिर्फ अपराध नियंत्रण तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह सवाल खड़ा करता है कि क्या कानून के बाहर जाकर की गई कार्रवाई को सही ठहराया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह न केवल मानवाधिकारों का उल्लंघन है बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी एक खतरनाक संकेत है।















