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Supreme Court की चेतावनी सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल से खतरा निष्पक्ष सुनवाई को

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On: March 22, 2026 8:11 PM
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Supreme Court
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Supreme Court ने सोशल मीडिया वीडियो अपलोड की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता जताई है। हर व्यक्ति के मोबाइल को मीडिया मानकर तुरंत वीडियो डालने से आरोपियों की निष्पक्ष सुनवाई खतरे में पड़ रही है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने पुलिस, मीडिया और जनता के लिए व्यापक एसओपी की जरूरत बताई। आइए, इस महत्वपूर्ण फैसले, Supreme Court सोशल मीडिया चिंता और निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार को विस्तार से समझते हैं।

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Supreme Court की सुनवाई जनहित याचिका का आधार

Supreme Court सोशल मीडिया मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने की। जनहित याचिका में आरोप था कि पुलिस गिरफ्तार आरोपियों के वीडियो-तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालकर पूर्वाग्रह पैदा करती है। बाद में बरी होने पर न्यायपालिका को कोसा जाता है। वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने तर्क दिया कि आज हर कोई मोबाइल से वीडियो बनाकर अपलोड कर रहा, यहां तक कि सड़क हादसे में खून बहते व्यक्ति को भी।

Supreme Court ने सहमति जताई और कहा – यह निष्पक्ष सुनवाई के लिए गंभीर खतरा है। दुर्घटना में भी लोग फोन निकाल लेते हैं। जस्टिस बागची ने याचिकाकर्ता से कहा, पुलिस के हैंडल पर फोकस न करें, बल्कि पुलिस, पारंपरिक-सोशल मीडिया के लिए व्यापक तंत्र बनाएं। सभी राज्यों को पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार करने के निर्देश दिए, तीन महीने में लागू करें।

मुख्य टिप्पणियां

  • सीजेआई सूर्यकांत: “यह डिजिटल गिरफ्तारी जैसा। लोग वाहनों पर ‘मीडिया’ स्टिकर लगाकर गुप्त डिजाइन चलाते।”
  • जस्टिस बागची: “पुलिस को ब्रीफिंग से पूर्वाग्रह न पैदा करना चाहिए। सोशल मीडिया ‘परमाणुकृत’ समस्या। टीवी संयमित है।”
  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: “सोशल मीडिया पर ब्लैकमेलर टैब्लॉयड।”

निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार संवैधानिक खतरा क्यों?

सोशल मीडिया वीडियो अपलोड से जनता में पूर्वाग्रह बनता है, जो अनुच्छेद 21 (जीवन-स्वतंत्रता) के तहत निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार का उल्लंघन है। पुलिस हथकड़ी-रस्सी में आरोपी दिखाकर ‘दोषी’ साबित कर देती। कोर्ट ने कहा – जांच में पारदर्शिता, RTI और ट्रायल अधिकार संतुलित हों। बड़ा कैनवास पर व्यापक नीति जरूरी। याचिका वापस लेने को कहा, अप्रैल बाद विस्तारित दायर करें जब SOP लागू हो जाए।

Supreme Court यह फैसला ‘मीडिया ट्रायल’ को रोकने का प्रयास है। पुलिस ब्रीफिंग नियंत्रित होगी, लेकिन सोशल मीडिया को कैसे? कोर्ट ने चिंता जताई – जनता को रोका नहीं जा सकता।

प्रभावित क्षेत्र

पक्षसमस्यासमाधान
पुलिसपूर्वाग्रह पैदाSOP अनिवार्य
सोशल मीडियावायरल वीडियोनियंत्रण तंत्र
जनतामोबाइल मीडियाजागरूकता
आरोपीट्रायल प्रभावितसंवैधानिक सुरक्षा

सोशल मीडिया का ‘परमाणुकृत’ खतरा Supreme Court की नजर

Supreme Court ने परमाणुकृत सोशल मीडिया को समस्या बताया। हर व्यक्ति ‘मीडिया’ बन गया। सड़क पर घायल को वीडियो बनाने की होड़। वकील टोल बचाने ‘SC एडवोकेट’ स्टिकर लगाते। सॉलिसिटर मेहता ने ब्लैकमेलर कहा। Supreme Court ने मान लिया – व्यापक दृष्टिकोण चाहिए। राज्यों को SOP बनानी होगी, जिसमें इंटरनेट पोस्ट शामिल।

पिछले फैसलों में कोर्ट ने राज्यों को दिशा-निर्देश दिए थे, अब सोशल मीडिया जोड़ा। यह डिजिटल युग की चुनौती है।

पुलिस-मीडिया संबंध SOP की जरूरत क्यों?

Supreme Court  ने तीन महीने में SOP का समय दिया। इसमें:

  • जांच विवरण सीमित शेयर।
  • आरोपी की तस्वीर-वीडियो पर रोक।
  • पारदर्शिता बनाए रखें।
  • पूर्वाग्रह रोकें।

जस्टिस बागची ने कहा – पुलिस नियंत्रित, लेकिन मीडिया? टीवी बेहतर, सोशल खतरनाक। यह संतुलन आपराधिक न्याय प्रणाली के लिए जरूरी।

व्यापक प्रभाव समाज और न्याय पर असर

यह फैसला पुलिस सुधार लाएगा। सोशल मीडिया यूजर्स सोचेंगे – वीडियो डालने से ट्रायल प्रभावित। जनता में जागरूकता बढ़ेगी। लेकिन लागू कैसे? केंद्र-राज्य समन्वय चाहिए। ब्लैकमेलर फर्जी मीडिया पर लगाम लगेगी। Supreme Court सोशल मीडिया चिंता ने डिजिटल नैतिकता पर बहस छेड़ी।

सोशल मीडिया नियंत्रण मुश्किल, फ्री स्पीच vs ट्रायल अधिकार। कोर्ट ने व्यापक PIL का इंतजार। अप्रैल 2026 में नई सुनवाई संभव। राज्यों को निर्देश मानना होगा।

Supreme Court सोशल मीडिया चिंता ने साफ संदेश दिया – डिजिटल होड़ न्याय को नुकसान न पहुंचाए। SOP से पुलिस संयमित होगी, जनता जागरूक बने। निष्पक्ष ट्रायल संविधान का मूल। वीडियो बनाने से पहले सोचें – क्या यह न्याय का हनन है?

शंकरनारायणन ने कहा, “मैं कुछ ऐसे अधिवक्ताओं को जानता हूं जो राजमार्गों पर टोल चुकाने से बचने के लिए अपनी कारों पर  Supreme Court एडवोकेट’ स्टिकर लगाते हैं।” पीठ ने कहा कि चूंकि आरोपियों के लिए निष्पक्ष सुनवाई के मुद्दे पर एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, इसलिए बेहतर होगा कि याचिका वापस ले ली जाए और अप्रैल के बाद विस्तारित दायरे के साथ फिर से दायर की जाए जब पुलिस के लिए एसओपी लागू किया जाएगा।

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