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Bistupur में मनाई गई डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती सरयू राय बोले राजनीतिक कार्यकर्ता देश के हालात का भी अध्ययन करें

On: July 7, 2026 5:46 PM
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जमशेदपुर: Bistupur स्थित आवास पर आयोजित कार्यक्रम में जमशेदपुर पश्चिम के विधायक सरयू राय ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती के अवसर पर कार्यकर्ताओं और उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि आज राजनीति से जुड़े हर व्यक्ति को देश की बदलती परिस्थितियों, राजनीतिक घटनाक्रमों और विभिन्न विचारधाराओं की समझ होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई भी कार्यकर्ता चाहे किसी भी दल से जुड़ा हो, यदि वह देश और राजनीति को गंभीरता से समझना चाहता है तो उसे केवल अपनी पार्टी की विचारधारा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि भारत की राजनीति, उसके इतिहास, विभिन्न विचारधाराओं और देश में चल रहे समकालीन हालात का भी अध्ययन करना चाहिए

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कार्यक्रम में सरयू राय ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व, उनके राष्ट्रवादी विचारों, कश्मीर को भारत के साथ पूर्ण रूप से जोड़ने के लिए उनके संघर्ष और सिद्धांतनिष्ठ जीवन का विस्तार से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी केवल एक राजनेता नहीं थे, बल्कि वे ऐसे चिंतक और राष्ट्रपुरुष थे, जिन्होंने अपने सिद्धांतों के लिए संघर्ष किया और देशहित को सर्वोपरि रखा। राय ने कार्यकर्ताओं से कहा कि आज के दौर में केवल नारे या सीमित राजनीतिक जानकारी से काम नहीं चलेगा, बल्कि देश की राजनीति को व्यापक संदर्भ में समझना होगा।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने के लिए किया संघर्ष

सरयू राय ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कश्मीर को भारत का हिस्सा बनाने के लिए अपना जीवन खपा दिया। उन्होंने कहा कि मुखर्जी ऐसे नेता थे, जिन्होंने राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगा दिया। उनका संघर्ष केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि वह भारत की एकता, संविधान की समानता और राष्ट्रीय अस्मिता की लड़ाई थी।

राय ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का मानना था कि एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चल सकते। उन्होंने जम्मू-कश्मीर को लेकर जो आवाज उठाई, वह केवल उस समय की राजनीतिक परिस्थिति का सवाल नहीं था, बल्कि भारत के संवैधानिक ढांचे और राष्ट्रीय एकता का मूल प्रश्न था। इसी कारण वे आज भी राष्ट्रवादी राजनीति के एक बड़े प्रतीक के रूप में याद किए जाते हैं। सरयू राय ने कहा कि वर्तमान पीढ़ी के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को यह समझना चाहिए कि मुखर्जी जैसे नेताओं ने जिन मुद्दों पर संघर्ष किया, वे केवल इतिहास की बातें नहीं हैं, बल्कि आज भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा हैं।

डॉ. मुखर्जी मुसलमानों के विरोधी नहीं, देशहित के पक्षधर थे”

कार्यक्रम में सरयू राय ने एक महत्वपूर्ण बात कहते हुए स्पष्ट किया कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी मुसलमानों के विरोधी नहीं थे। उन्होंने कहा कि कई बार राजनीतिक विमर्श में कुछ ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को एकतरफा ढंग से प्रस्तुत करने की कोशिश की जाती है, जबकि वास्तविकता इससे अलग होती है। राय ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का दृष्टिकोण किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं था, बल्कि वह पूरी तरह देशहित और राष्ट्रहित पर आधारित था।

उन्होंने कहा कि मुखर्जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि वे भारत की एकता, सुरक्षा और संविधान की मजबूती के लिए समर्पित थे। उनके निर्णयों और विचारों को किसी समुदाय विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। सरयू राय ने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को ऐसे नेताओं के बारे में गहराई से पढ़ना चाहिए, ताकि वे सतही या पूर्वाग्रहपूर्ण धारणाओं से बच सकें और सही ऐतिहासिक समझ विकसित कर सकें।

सिद्धांतों पर अडिग, मेधावी और हठी व्यक्तित्व के धनी थे डॉ. मुखर्जी

सरयू राय ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए उन्हें मेधावी, हठी और सिद्धांतों पर अडिग रहने वाला नेता बताया। उन्होंने कहा कि मुखर्जी अपनी बातों, नीतियों और विचारधारा पर पूरी दृढ़ता के साथ कायम रहते थे। वे किसी भी परिस्थिति में अपने मूल सिद्धांतों से समझौता करने वाले नेता नहीं थे।

उन्होंने कहा कि डॉ. मुखर्जी जीवनभर अलग धारा पर चलते रहे, लेकिन जब भी देशहित में दूसरे विचारधारा के लोगों के साथ काम करने की जरूरत पड़ी, उन्होंने उससे परहेज नहीं किया। उनके लिए देश पहले था और राजनीति बाद में। यही कारण है कि उनका राजनीतिक जीवन आज भी अध्ययन और प्रेरणा का विषय है। सरयू राय ने कहा कि आज के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इस गुण से सीख लेने की जरूरत है कि राजनीति केवल विरोध या समर्थन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में सही निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी है

राजनीतिक कार्यकर्ता 1947 से अब तक के घटनाक्रमों का करें अध्ययन

अपने संबोधन में सरयू राय ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि राजनीति से जुड़े लोगों को 1947 से अब तक के राजनीतिक घटनाक्रमों और तथ्यों की जानकारी होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद देश की राजनीति किन-किन चरणों से गुजरी, किस तरह अलग-अलग राज्यों में राजनीतिक परिवर्तन हुए, किन मुद्दों ने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया—इन सभी बातों की जानकारी एक राजनीतिक कार्यकर्ता के लिए बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आज राजनीति में सक्रिय बहुत से लोग केवल वर्तमान घटनाओं तक सीमित रह जाते हैं, जबकि किसी भी राजनीतिक सोच की गहराई उसके ऐतिहासिक संदर्भों को समझने से ही आती है। सरयू राय ने खास तौर पर कहा कि जो लोग जनता दल यूनाइटेड से जुड़े हैं, उन्हें इस दिशा में विशेष अध्ययन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं को न केवल अपने संगठन की विचारधारा समझनी चाहिए, बल्कि भारतीय राजनीति के विकासक्रम और अन्य दलों की वैचारिक पृष्ठभूमि का भी ज्ञान होना चाहिए।

सभी राजनीतिक विचारधाराओं को पढ़ें और समझें

सरयू राय ने कार्यकर्ताओं से कहा कि सभी राजनीतिक विचारधाराओं को पढ़ना और समझना जरूरी है, भले ही कोई व्यक्ति अंततः किसी एक विशेष विचारधारा को ही क्यों न मानता हो। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में राजनीति बहुविचारधारात्मक होती है और एक गंभीर राजनीतिक कार्यकर्ता को यह जानना चाहिए कि देश में कौन-कौन सी विचारधाराएं प्रभावी रही हैं, उनके मूल सिद्धांत क्या हैं और वे समाज तथा शासन को किस नजरिए से देखती हैं।

उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं कि हर विचारधारा को स्वीकार ही किया जाए, लेकिन उसके बारे में जानकारी जरूर होनी चाहिए। इससे राजनीतिक समझ विकसित होती है, तर्क मजबूत होते हैं और व्यक्ति किसी मुद्दे पर अधिक संतुलित दृष्टिकोण रख पाता है। राय ने कहा कि राजनीति में रहने वाले व्यक्ति को केवल अपने पक्ष की बात नहीं पता होनी चाहिए, बल्कि दूसरे पक्ष की सोच, उसके तर्क और उसके सामाजिक प्रभाव की भी जानकारी होनी चाहिए। यही एक प्रबुद्ध और जागरूक कार्यकर्ता की पहचान है।

देश में क्या चल रहा है, इसकी जानकारी भी रखें कार्यकर्ता

सरयू राय ने कहा कि आज के राजनीतिक कार्यकर्ता को देश में क्या चल रहा है, कहां क्या हो रहा है और विभिन्न राज्यों में किस तरह की राजनीतिक परिस्थितियां बन रही हैं, इसकी जानकारी भी लगातार रखनी चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि तमिलनाडु जैसे राज्यों में बार-बार किस प्रकार की सरकार बनती है, वहां की राजनीति किन मुद्दों पर केंद्रित रहती है, यह जानने की जिज्ञासा एक गंभीर कार्यकर्ता के मन में होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि जो कार्यकर्ता देशहित के बारे में सोचता है और भारतीय राजनीति को समग्रता में देखना चाहता है, वह केवल अपने शहर, जिले या राज्य तक सीमित नहीं रह सकता। उसे राष्ट्रीय राजनीति की धारा, राज्यों की राजनीति, सामाजिक बदलाव, क्षेत्रीय दलों की भूमिका और केंद्र-राज्य संबंधों की भी समझ होनी चाहिए। राय के मुताबिक, यही अध्ययन एक राजनीतिक कार्यकर्ता को सामान्य कार्यकर्ता से अलग बनाता है और उसे गंभीर राजनीतिक चेतना से लैस करता है।

आज का दौर सामासिक राजनीति का, सभी को साथ लेकर चलना होगा

सरयू राय ने कहा कि आज का दौर सामासिक राजनीति का दौर है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्तमान समय में राजनीति केवल शुद्ध वैचारिक आग्रहों के आधार पर नहीं चल सकती। यदि कोई व्यक्ति या दल अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर इस हद तक अड़ जाए कि वह दूसरों के साथ चलने की गुंजाइश ही खत्म कर दे, तो वह राजनीतिक रूप से अकेला पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि आज की राजनीति में संवाद, समन्वय, व्यावहारिकता और साझेदारी की जरूरत है। इसका मतलब यह नहीं है कि अपनी विचारधारा छोड़ दी जाए, बल्कि इसका आशय यह है कि विविध विचारों को समझते हुए, लोकतांत्रिक सहमति के साथ आगे बढ़ने की क्षमता विकसित की जाए। राय ने कहा कि यह समय विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं को समझने, बूझने और जहां जरूरी हो, व्यावहारिक स्तर पर उन्हें अंगीकार करने का दौर है। राजनीति को केवल सैद्धांतिक कठोरता से नहीं, बल्कि सामाजिक यथार्थ और लोकतांत्रिक व्यावहारिकता के साथ समझना होगा।

व्यावहारिक राजनीति को समझने और आत्मसात करने की जरूरत

अपने भाषण में सरयू राय ने यह भी कहा कि आज के समय में केवल विशुद्ध सिद्धांतों की बात करके राजनीति करना आसान नहीं रह गया है। उन्होंने कहा कि राजनीति अब समाज, शासन, गठबंधन, जनभावनाओं और परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की कला भी बन चुकी है। इसलिए जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, उन्हें व्यावहारिक राजनीति को समझने और आत्मसात करने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि विचारधारा महत्वपूर्ण है, लेकिन राजनीति में सफल और प्रभावी भूमिका निभाने के लिए यह समझना भी जरूरी है कि समाज किस दिशा में सोच रहा है, जनता की प्राथमिकताएं क्या हैं और बदलते समय में कौन से मुद्दे अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं। राय के अनुसार, सिद्धांत और व्यवहार—दोनों का संतुलन ही आज की राजनीति की वास्तविक जरूरत है। उन्होंने कार्यकर्ताओं को सलाह दी कि वे जिज्ञासु बनें, पढ़ें, समझें और अपने राजनीतिक दृष्टिकोण को लगातार विकसित करें।

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जदयू जिलाध्यक्ष सुबोध श्रीवास्तव ने मुखर्जी को बताया भारत की आत्मा

कार्यक्रम में जदयू के पूर्वी सिंहभूम जिलाध्यक्ष सुबोध श्रीवास्तव ने भी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान पर विस्तार से अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारत की आत्मा हैं। उन्होंने बताया कि डॉ. मुखर्जी कभी नेहरू मंत्रिमंडल में मंत्री थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि नेहरू-लियाकत पैक्ट का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, तो उन्होंने मंत्री पद को ठुकरा दिया।

सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि डॉ. मुखर्जी का नारा “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे” भारतीय राजनीति में बेहद प्रभावशाली रहा। उन्होंने कहा कि आज जम्मू-कश्मीर में तिरंगा उसी मजबूती के साथ लहरा रहा है और वहां भारतीय संविधान के अनुरूप व्यवस्था लागू है। उनके अनुसार, डॉ. मुखर्जी की सोच और संघर्ष का प्रभाव आज भी देश की राजनीतिक संरचना में महसूस किया जा सकता है।

अन्य वक्ताओं ने भी रखे विचार, कार्यकर्ताओं से मुखर्जी के आदर्श अपनाने की अपील

कार्यक्रम में प्रवीण सिंह, चुन्नू भूमिज और उषाय यादव ने भी अपने विचार रखे। वक्ताओं ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रवादी दृष्टिकोण, उनके संघर्ष और सिद्धांतनिष्ठ जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी को उनके विचारों से प्रेरणा लेने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं को केवल संगठनात्मक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें अध्ययनशील, जागरूक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ा होना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राजनीति को समझने के लिए इतिहास, संविधान, समाज और विभिन्न राजनीतिक धाराओं का ज्ञान जरूरी है। डॉ. मुखर्जी की जयंती केवल श्रद्धांजलि देने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों और राष्ट्रीय दृष्टि पर गंभीरता से सोचने का भी समय है।

कुलविंदर सिंह पन्नू ने किया मंच संचालन, विकास साहनी ने जताया आभार

Bistupur स्थित आवास पर आयोजित इस कार्यक्रम का संचालन कुलविंदर सिंह पन्नू ने किया, जबकि विकास साहनी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता, समर्थक और स्थानीय लोग मौजूद रहे। जयंती समारोह के दौरान डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई और उनके विचारों को स्मरण किया गया।

कार्यक्रम का माहौल वैचारिक चर्चा, राजनीतिक संवाद और राष्ट्रवादी चिंतन से भरा रहा। उपस्थित लोगों ने मुखर्जी के योगदान को याद करते हुए उनके विचारों को आज के दौर में भी प्रासंगिक बताया।

Bistupur में आयोजित डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 125वीं जयंती का कार्यक्रम केवल एक स्मृति आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए अध्ययन, वैचारिक विस्तार और राष्ट्रीय राजनीति की समझ का संदेश देने वाला मंच भी बना। सरयू राय ने अपने संबोधन में साफ कहा कि आज के कार्यकर्ता को केवल अपनी पार्टी या विचारधारा तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि देश की राजनीति, इतिहास, विभिन्न विचारधाराओं और समकालीन परिस्थितियों की व्यापक समझ विकसित करनी चाहिए।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन, उनके राष्ट्रवादी संघर्ष और सिद्धांतनिष्ठ राजनीति को याद करते हुए कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि राजनीति में अध्ययन, संवेदनशीलता, वैचारिक परिपक्वता और व्यावहारिक समझ—चारों की बराबर जरूरत है। यही संदेश इस जयंती समारोह की सबसे बड़ी उपलब्धि बनकर सामने आया।

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