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ड्रग तस्करों के खिलाफ Zero Tolerance: नशा मुक्त भारत के लिए सरकार की नई रणनीति कितनी प्रभावी?

On: August 4, 2026 10:08 PM
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Zero tolerance towards drug traffickers: नशीले पदार्थों की तस्करी आज केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। इसका सबसे अधिक प्रभाव युवाओं पर पड़ता है, जो किसी भी देश की सबसे बड़ी ताकत माने जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत में सिंथेटिक ड्रग्स, अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क, डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से संचालित अवैध कारोबार में वृद्धि ने सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने ड्रग तस्करों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ (Zero Tolerance) की नीति अपनाई है और इसे लागू करने के लिए कई स्तरों पर व्यापक रणनीति तैयार की है।

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गृह मंत्रालय में राज्य मंत्री श्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर के माध्यम से सरकार द्वारा उठाए गए कदमों की जानकारी देते हुए बताया कि अब ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई केवल जब्ती और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे नेटवर्क, उसकी आर्थिक व्यवस्था, साइबर माध्यमों और अंतरराष्ट्रीय कड़ियों को समाप्त करने पर विशेष जोर दिया जाएगा। इसके लिए 26 जून 2026 को ‘नारकोटिक्स कंट्रोल पर विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029)’ जारी किया गया, जिसे आने वाले तीन वर्षों की राष्ट्रीय कार्ययोजना माना जा रहा है।


नारकोटिक्स कंट्रोल पर विजन डॉक्यूमेंट: तीन वर्षों की व्यापक कार्ययोजना

भारत सरकार द्वारा जारी ‘नारकोटिक्स कंट्रोल पर विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029)’ ड्रग्स के खिलाफ देश की अब तक की सबसे व्यापक रणनीतियों में से एक माना जा रहा है। इस दस्तावेज़ की विशेषता यह है कि इसमें केवल कानून लागू करने वाली एजेंसियों पर निर्भर रहने के बजाय “सम्पूर्ण सरकार” और “सम्पूर्ण समाज” की अवधारणा को अपनाया गया है। अर्थात केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ पुलिस, शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, सामाजिक संस्थाएं, अभिभावक और आम नागरिक भी इस अभियान का हिस्सा होंगे।

इस कार्ययोजना में स्पष्ट समयसीमा के साथ ऐसे लक्ष्य तय किए गए हैं, जिनका उद्देश्य ड्रग्स की आपूर्ति कम करना, नशे की मांग घटाना, युवाओं को जागरूक बनाना, पुनर्वास सेवाओं को मजबूत करना और आधुनिक तकनीक के माध्यम से तस्करी के नए तरीकों पर रोक लगाना है। सरकार का मानना है कि यदि सभी एजेंसियां समन्वय के साथ कार्य करें तो आने वाले वर्षों में ड्रग तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया जा सकता है।


एनडीपीएस अधिनियम के तहत सख्त कार्रवाई

ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई का सबसे मजबूत कानूनी आधार स्वापक औषधि एवं मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (NDPS Act) है। इस कानून के तहत नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी), राज्य पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियां लगातार अभियान चला रही हैं। पिछले वर्षों में बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थों की जब्ती, हजारों मामलों का पंजीकरण, बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां और ड्रग्स की अवैध खेती को नष्ट करने जैसी कार्रवाइयों से यह स्पष्ट होता है कि सरकार अब केवल छोटे तस्करों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि पूरे नेटवर्क को समाप्त करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है।

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि समय-समय पर एनडीपीएस अधिनियम की समीक्षा की जाएगी, ताकि बदलती परिस्थितियों और नई चुनौतियों के अनुरूप आवश्यक संशोधन किए जा सकें। विशेष रूप से सिंथेटिक ड्रग्स, ऑनलाइन तस्करी और अंतरराष्ट्रीय गिरोहों को ध्यान में रखते हुए कानून को और प्रभावी बनाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है।


एनसीओआरडी व्यवस्था से बढ़ेगा एजेंसियों का तालमेल

ड्रग तस्करी अक्सर कई राज्यों और देशों तक फैले संगठित नेटवर्क के माध्यम से संचालित होती है। ऐसे में केवल एक एजेंसी के प्रयास पर्याप्त नहीं होते। इसी आवश्यकता को देखते हुए सरकार ने चार स्तरीय नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) व्यवस्था स्थापित की है। इसका उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों, पुलिस, सीमा सुरक्षा बल, आबकारी विभाग तथा अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना है।

एनसीबी द्वारा विकसित NCORD पोर्टल इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ड्रग अपराधियों का डाटा, प्रशिक्षण सामग्री, कानूनी जानकारी और विभिन्न राज्यों की सफल पहलों का विवरण उपलब्ध कराया गया है। इससे एजेंसियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान तेज और प्रभावी हुआ है, जिससे संयुक्त कार्रवाई की सफलता की संभावना भी बढ़ी है।


सिंथेटिक ड्रग्स और डार्कनेट: नई चुनौती

आज ड्रग्स की दुनिया तेजी से बदल रही है। पहले जहां अफीम, हेरोइन और गांजा जैसी पारंपरिक मादक पदार्थों की तस्करी अधिक होती थी, वहीं अब मेफेड्रोन, एमडीएमए, एम्फेटामिन और अन्य सिंथेटिक ड्रग्स तेजी से फैल रहे हैं। इनका निर्माण छोटी-छोटी गुप्त प्रयोगशालाओं में आसानी से किया जा सकता है, जिससे इनकी पहचान और रोकथाम अधिक कठिन हो जाती है।

इसी के साथ डार्कनेट और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म तस्करों के लिए सुरक्षित माध्यम बन गए हैं। क्रिप्टोकरेंसी के जरिए भुगतान होने के कारण इन लेन-देन का पता लगाना भी चुनौतीपूर्ण होता है। सरकार ने इन नई चुनौतियों को देखते हुए साइबर विशेषज्ञों की सहायता लेना शुरू किया है तथा डिजिटल फॉरेंसिक, डार्कनेट निगरानी और क्रिप्टोकरेंसी जांच को मजबूत किया जा रहा है। साथ ही विजन डॉक्यूमेंट में प्रत्येक एंटी-नारकोटिक्स टास्क फोर्स में समर्पित डार्कनेट और क्रिप्टोकरेंसी सेल स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है।


वित्तीय जांच और संपत्ति जब्ती पर विशेष जोर

ड्रग्स का कारोबार केवल नशीले पदार्थों तक सीमित नहीं होता, बल्कि इसके पीछे अरबों रुपये का अवैध वित्तीय नेटवर्क काम करता है। सरकार ने अब इस आर्थिक ढांचे पर भी प्रहार करने की रणनीति अपनाई है। इसके तहत अपराध से अर्जित संपत्ति की पहचान, बैंक खातों की जांच, निवेश, अचल संपत्ति और अन्य वित्तीय स्रोतों को चिन्हित कर कुर्क करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तस्करों की आर्थिक ताकत कमजोर कर दी जाए तो पूरे नेटवर्क को लंबे समय तक सक्रिय रखना कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि वित्तीय जांच अब ड्रग्स विरोधी अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।


युवाओं पर विशेष फोकस: मिशन ड्रग फ्री कैंपस

सरकार का मानना है कि नशे की समस्या का स्थायी समाधान केवल तस्करों की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि युवाओं को नशे से दूर रखना भी है। इसी उद्देश्य से देशभर के स्कूलों, कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में ‘मिशन ड्रग फ्री कैंपस’ शुरू किया गया है। इसके अंतर्गत विद्यार्थियों को नशे के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया जा रहा है तथा परामर्श और सहायता सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं।

विजन डॉक्यूमेंट में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह भी है कि प्रत्येक शैक्षणिक संस्थान के चारों ओर 500 मीटर के दायरे को ‘ड्रग फ्री कैंपस प्लस 500 मीटर’ क्षेत्र के रूप में विकसित किया जाए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि स्कूलों और कॉलेजों के आसपास किसी भी प्रकार की नशीले पदार्थों की बिक्री या तस्करी न हो। इसके अलावा केंद्रीय वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में विद्यार्थियों के लिए सहमति-आधारित स्क्रीनिंग परीक्षण का भी प्रस्ताव रखा गया है, ताकि समय रहते नशे की पहचान कर आवश्यक परामर्श और उपचार उपलब्ध कराया जा सके।


अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आधुनिक तकनीक का उपयोग

ड्रग तस्करी एक अंतरराष्ट्रीय अपराध है, इसलिए इसका मुकाबला केवल राष्ट्रीय स्तर पर संभव नहीं है। भारत ने अमेरिका, नेपाल, म्यांमार, थाईलैंड, श्रीलंका, इंडोनेशिया और सिंगापुर सहित कई देशों के साथ सहयोग बढ़ाया है। एनसीबी ने 27 देशों के साथ द्विपक्षीय समझौते तथा 19 देशों के साथ समझौता ज्ञापन किए हैं, जिससे सूचनाओं का आदान-प्रदान और संयुक्त कार्रवाई आसान हुई है।

इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डिजिटल फॉरेंसिक और डेटा एनालिटिक्स जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग भी बढ़ाया जा रहा है। इन तकनीकों की मदद से संदिग्ध गतिविधियों, ऑनलाइन नेटवर्क और वित्तीय लेन-देन की निगरानी अधिक प्रभावी ढंग से की जा सकती है।


जनभागीदारी और जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक

सरकार ने ‘मादक-पदार्थ निषेध आसूचना केंद्र (MANAS)’ के नाम से 24×7 टोल-फ्री हेल्पलाइन (1933) शुरू की है। इसके माध्यम से नागरिक फोन, ई-मेल, वेब पोर्टल और उमंग ऐप के जरिए ड्रग्स से संबंधित शिकायतें और सूचनाएं दे सकते हैं। यह व्यवस्था आम नागरिकों को भी ड्रग्स विरोधी अभियान का सक्रिय भागीदार बनाती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल पुलिस या सरकार नहीं जीत सकती। परिवार, विद्यालय, समाज, धार्मिक संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन यदि जागरूकता अभियान चलाएं और युवाओं को सही दिशा दें, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान संभव होगा।


ड्रग तस्करों के खिलाफ भारत सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति यह स्पष्ट संदेश देती है कि अब नशे के कारोबार के प्रति किसी प्रकार की नरमी नहीं बरती जाएगी। ‘नारकोटिक्स कंट्रोल पर विजन डॉक्यूमेंट (2026-2029)’ केवल एक सरकारी दस्तावेज नहीं, बल्कि नशा-मुक्त भारत के लिए तैयार किया गया व्यापक रोडमैप है, जिसमें कानून प्रवर्तन, आधुनिक तकनीक, वित्तीय जांच, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जनभागीदारी और युवाओं की सुरक्षा को समान महत्व दिया गया है।

हालांकि इस अभियान की सफलता केवल सरकारी प्रयासों पर निर्भर नहीं करेगी। जब तक समाज, परिवार, शैक्षणिक संस्थान और नागरिक स्वयं नशे के खिलाफ जागरूक होकर सहयोग नहीं करेंगे, तब तक इस चुनौती का पूरी तरह समाधान संभव नहीं है। यदि सरकार की सख्त कार्रवाई के साथ समाज का सहयोग भी जुड़ जाए, तो आने वाले वर्षों में भारत न केवल ड्रग तस्करी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकेगा, बल्कि देश की युवा शक्ति को नशे के दुष्चक्र से बचाकर एक स्वस्थ, सुरक्षित और सशक्त भविष्य की ओर भी अग्रसर कर सकेगा।

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है। अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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