नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में नाबालिगों से जुड़े अपराधों में लगातार हो रही बढ़ोतरी ने कानून-व्यवस्था और समाज दोनों के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। विशेषकर झुग्गी-बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों में रहने वाले 12 से 17 वर्ष के किशोर तेजी से गंभीर आपराधिक घटनाओं में शामिल हो रहे हैं। पुलिस की सख्ती और लगातार अभियान के बावजूद अपराध का ग्राफ नीचे आने के बजाय बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस समस्या पर ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और चिंताजनक हो सकती है।
गलियों का बदलता माहौल
एक समय था जब निम्न आय वर्ग की बस्तियों की गलियों में बच्चों के खेलकूद और हंसी-ठिठोली की आवाजें सुनाई देती थीं। गिल्ली-डंडा, कंचे और क्रिकेट जैसे खेल इन इलाकों की पहचान हुआ करते थे। लेकिन अब कई जगहों पर माहौल बदल चुका है। इन्हीं गलियों में हत्या, लूट, चाकूबाजी और हिंसक झगड़ों की घटनाएं सामने आ रही हैं। पुलिस सायरन की आवाजें अब बच्चों के खेल की जगह लेती दिख रही हैं। सवाल उठता है कि इतनी कम उम्र में बच्चे अपराध की राह क्यों पकड़ रहे हैं।
जमीनी स्तर पर पड़ताल करने पर सामने आया है कि नाबालिग अपराध की जड़ें परिवार, सामाजिक परिवेश और उपेक्षा से जुड़ी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जुवेनाइल से जुड़े लगभग 75 प्रतिशत मामले झुग्गी-झोपड़ी और पुनर्वास बस्तियों से सामने आते हैं। करीब 22 प्रतिशत मामले लोअर मिडल क्लास परिवारों से जुड़े हैं, जबकि मिडल क्लास से यह आंकड़ा लगभग 3 प्रतिशत है। यह केवल आंकड़े नहीं, बल्कि उस सामाजिक स्थिति का संकेत हैं जहां कई बच्चों का बचपन दबाव, अभाव और गलत संगति में खोता जा रहा है।
हाल के मामलों ने बढ़ाई चिंता
पिछले कुछ दिनों में सामने आए कई मामलों ने स्थिति की गंभीरता को उजागर किया है 12 फरवरी 2026 को नरेला के बवाना जेजे कॉलोनी में 17 वर्षीय किशोर की चाकू से गोदकर हत्या कर दी गई। इस मामले में सात आरोपियों को पकड़ा गया, जिनमें चार नाबालिग शामिल थे 11 फरवरी को रोहिणी के विजय विहार इलाके में एक किशोर को मामूली विवाद में चाकू मार दिया गया।
बाद में उसकी मौत हो गई और मामला हत्या में बदल गया 9 फरवरी को मंगोलपुरी क्षेत्र में 15 वर्षीय छात्र की हत्या चार नाबालिगों ने सरकारी स्कूल के सामने कर दी। यह घटना 25 दिन पुराने झगड़े का नतीजा बताई गई इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि अब नाबालिग केवल छोटी-मोटी चोरी या झगड़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गंभीर अपराधों में भी शामिल हो रहे हैं।
आंकड़े दे रहे खतरनाक संकेत
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में हत्या के मामलों में 2024 की तुलना में 17 अधिक नाबालिग शामिल पाए गए। जानलेवा हमलों में 123 और डकैती में 8 अधिक किशोरों की गिरफ्तारी हुई। लूट के मामलों में 109 और दुष्कर्म से जुड़े मामलों में भी नाबालिगों की संख्या बढ़ी है 2024 में जहां सभी प्रकार के अपराधों में शामिल नाबालिगों की संख्या 3270 थी, वहीं 2025 में यह बढ़कर 3833 हो गई। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार 2023 में दिल्ली में 3098 नाबालिग आरोपियों को पकड़ा गया था। यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या केवल स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता का विषय है।
परिवार और सामाजिक उपेक्षा बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले अधिकतर माता-पिता दिहाड़ी मजदूर होते हैं। वे सुबह से शाम तक काम में व्यस्त रहते हैं, जिससे बच्चों की दिनचर्या पर ध्यान नहीं दे पाते। बच्चे स्कूल से लौटने के बाद अक्सर बिना मार्गदर्शन के समय बिताते हैं। शाम तक थके-हारे लौटे माता-पिता के पास बातचीत का समय नहीं होता, जिससे बच्चों और परिवार के बीच संवाद की कमी हो जाती है।
छोटे घर, निजी स्थान का अभाव और गलत संगति का प्रभाव धीरे-धीरे बच्चों को गलत रास्ते की ओर धकेल देता है। शुरुआत जिज्ञासा से होती है, जो आदत बनती है और बाद में अपराध में बदल सकती है।
मानसिक स्वास्थ्य भी अहम पहलू
मनोचिकित्सकों के अनुसार कई बच्चों में हिंसक व्यवहार या नियम तोड़ने की प्रवृत्ति केवल शरारत नहीं होती, बल्कि यह ‘कंडक्ट डिसऑर्डर’ जैसी मानसिक स्थिति का संकेत हो सकती है। ऐसे बच्चे अक्सर नकारात्मक छवि वाले लोगों को अपना आदर्श मान लेते हैं और जोखिम भरे व्यवहार की ओर आकर्षित होते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि शुरुआती स्तर पर ऐसे बच्चों को काउंसलिंग, सही मार्गदर्शन और सकारात्मक वातावरण मिले तो उन्हें अपराध की राह पर जाने से रोका जा सकता है।
संवेदनशील उम्र में सही दिशा जरूरी
12 से 17 वर्ष की उम्र बेहद संवेदनशील होती है। इस दौर में बच्चे तेजी से सीखते हैं और प्रभावित होते हैं। यदि परिवार सही मार्गदर्शन देने में असफल रहता है तो सड़क, सोशल मीडिया और गलत संगति उनके शिक्षक बन जाते हैं।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि यदि माता-पिता रोज कुछ समय बच्चों से बातचीत करें और उनकी गतिविधियों पर नजर रखें तो कई अपराध होने से पहले ही रोके जा सकते हैं।
समाधान की दिशा में प्रयास जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए सामुदायिक स्तर पर प्रयास जरूरी हैं। स्कूलों में काउंसलिंग, खेलकूद और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम बढ़ाने होंगे। परिवारों को भी बच्चों के साथ संवाद बढ़ाना होगा।
सरकार और सामाजिक संस्थाओं को मिलकर ऐसी योजनाएं बनानी होंगी, जिससे झुग्गी-बस्तियों के बच्चों को शिक्षा, खेल और रोजगार से जुड़ने के अवसर मिलें।
नाबालिग अपराध की बढ़ती घटनाएं यह संकेत दे रही हैं कि समाज को इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना होगा। यदि अभी ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को अपराध से दूर रखने के लिए परिवार, समाज और प्रशासन सभी को मिलकर काम करना होगा, तभी इस चुनौती से निपटा जा सकेगा।












