
झारखंड के Purvi सिंहभूम जिले के सुदूर ग्रामीण इलाकों में आज भी बुनियादी सुविधाओं की मार झेल रहे लोग हैं। जनता दल (यूनाइटेड) की जिला इकाई ने डुमरिया प्रखंड के करीब 90 गांवों की जमीनी समस्याओं को लेकर उपायुक्त को ज्ञापन सौंपा है। यह कदम ग्रामीणों की आवाज को बुलंद करने और विकास की गति तेज करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

डुमरिया प्रखंड विकास से वंचित क्षेत्र
डुमरिया प्रखंड Purvi सिंहभूम का ऐसा इलाका है जहां जंगल ब्लॉक, लांगो, माड़ोतोलिया, पुनासिबाद, मानिकपुर, कालियामकोया, बकुचंदा, कुंडालुका, डीबुडीह, भागाबंदी जैसे 90 गांव आजादी के दशकों बाद भी अंधेरे में जी रहे हैं। बिजली की अनियमित सप्लाई, जर्जर सड़कें, पेयजल के लिए जलमीनारों की कमी—ये समस्याएं रोजमर्रा की जिंदगी को कठिन बना रही हैं। ग्रामीणों को डॉक्टर, दवा या एम्बुलेंस तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं।
शिक्षा व्यवस्था की हालत तो और भी खराब है। स्कूलों में शिक्षक कम हैं, बुनियादी सुविधाएं न के बराबर। मोबाइल नेटवर्क की कमी से प्रमाण पत्र बनवाना या सरकारी योजनाओं का लाभ लेना मुश्किल हो जाता है। जदयू का यह ज्ञापन इन सभी मुद्दों को विस्तार से रखता है, जो 24 मार्च 2026 को जिला महासचिव बिरसिंह देवगाम के नेतृत्व में सौंपा गया।
ज्ञापन की मुख्य मांगें
जदयू नेताओं ने स्पष्ट कहा कि डुमरिया प्रखंड बुनियादी सुविधाओं से कोताही का शिकार है। उन्होंने मांगा है कि सभी गांवों का विशेष सर्वे हो और प्राथमिकता से विकास कार्य शुरू हों। सड़क निर्माण, बिजली नियमितीकरण, जलमीनारों की स्थापना जरूरी है। एम्बुलेंस सेवा, मोबाइल टावर लगाना और प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाना पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस दौरान जिला अध्यक्ष सुबोध श्रीवास्तव, सागेन देवगम, उपेंद्र कुमार सिंह, जवाहर लाल टुडू, बीरस्पति कर्मकार जैसे नेता मौजूद रहे। उनकी एकजुटता से साफ है कि पार्टी ग्रामीण हितों के लिए सक्रिय है। Purvi सिंहभूम जैसे जिले में जहां खनिज संपदा भरपूर है, वहां ग्रामीणों का यह हाल शर्मनाक है।
ग्रामीण समस्याओं का व्यापक चित्र
डुमरिया जैसे प्रखंडों में सड़कें टूटी होने से फसलें बाजार तक नहीं पहुंच पातीं। बरसात में गांव कट जाते हैं। स्वास्थ्य के मामले में तो हालात गंभीर हैं—प्रसव, दुर्घटना या बीमारी में एम्बुलेंस न मिलने से जान जोखिम में पड़ जाती है। नेटवर्क न होने से आधार कार्ड, राशन कार्ड या जाति प्रमाण पत्र बनवाना सपना बन जाता है।
शिक्षा के क्षेत्र में बच्चे दूर के स्कूल जाते हैं, लेकिन गुणवत्ता शून्य। लड़कियों की पढ़ाई तो और प्रभावित होती है। जदयू की यह पहल सराहनीय है, क्योंकि कई बार राजनीतिक दल चुनावी वादों तक सीमित रहते हैं। लेकिन यहां जमीनी मुद्दों पर कार्रवाई की मांग हो रही है।
झारखंड के ग्रामीण विकास की चुनौतियां
झारखंड में 32 जिले हैं, लेकिन आदिवासी बहुल पूर्वी सिंहभूम के ग्रामीण इलाके सबसे पिछड़े हैं। केंद्र और राज्य की योजनाएं—पीएम ग्राम सड़क योजना, जल जीवन मिशन, सौभाग्य—कागजों तक सीमित हैं। डुमरिया में सड़क चौड़ीकरण का 90% काम पूरा होने के बावजूद मुआवजा नहीं मिला। जदयू जैसी पार्टियां जब आवाज उठाती हैं, तो शायद प्रशासन जागेगा।
राजनीतिक दलों को ग्रामीणों के साथ खड़ा होना चाहिए। जदयू ने साबित किया कि वे जनहित के लिए लड़ने को तैयार हैं। उपायुक्त को अब त्वरित कार्रवाई करनी होगी, वरना ग्रामीण आंदोलन करेंगे।
राजनीतिक सक्रियता का महत्व
Purvi सिंहभूम में जदयू की जिला इकाई की यह सक्रियता प्रशंसनीय है। बिरसिंह देवगाम जैसे नेता ग्रामीणों की पकड़ रखते हैं। सुबोध श्रीवास्तव की अध्यक्षता में पार्टी मजबूत हो रही है। ऐसी पहलें लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। ग्रामीण वोट बैंक हैं, लेकिन उनकी समस्याएं अनसुनी नहीं होनी चाहिए।
जदयू Purvi सिंहभूम का डुमरिया ज्ञापन ग्रामीण भारत की कड़वी सच्चाई को उजागर करता है। 90 गांवों—जंगल ब्लॉक, लांगो, माड़ोतोलिया से लेकर भागाबंदी तक—की समस्याओं को उठाकर उन्होंने प्रशासन की नींद तोड़ दी है। बिजली की कटौती, जर्जर सड़कें, पेयजल की किल्लत, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव—ये मुद्दे न सिर्फ डुमरिया प्रखंड, बल्कि पूरे झारखंड की ग्रामीण तस्वीर बयां करते हैं। 72 हजार आबादी वाले इन इलाकों में सीएचसी की हालत दयनीय है, जहां प्रसव से लेकर आपातकाल तक सब संकट में है।
इस ज्ञापन ने साफ संदेश दिया है कि खनिज संपदा से भरपूर Purvi सिंहभूम के ग्रामीण आज भी मूलभूत सुविधाओं के भूखे हैं। बिरसिंह देवगाम, सुबोध श्रीवास्तव जैसे नेताओं की अगुवाई में जदयू ने एम्बुलेंस, मोबाइल टावर, सड़क-पानी जैसी मांगें रखीं। विशेष सर्वे और त्वरित कार्रवाई की पुकार सही है, क्योंकि बरसात में गांव कट जाते हैं, बीमारी में जान risk पर लगती है, और शिक्षा का सपना अधूरा रह जाता है।
जदयू की यह सक्रियता सराहनीय है। ऐसी पहलें बढ़ेंगी तो विकास की धारा नीचे तक पहुंचेगी। झारखंड चमकेगा जब ग्रामीण सशक्त होंगे। अब प्रशासन की बारी है—कार्रवाई हो, वरना आंदोलन की चिंगारी भड़केगी। यह ज्ञापन सिर्फ कागज नहीं, बल्कि लाखों ग्रामीणों की उम्मीद है।










