जमशेदपुर। हमारे यहाँ एक कहावत है सांप चले गया लोग लकीरें पीटते रह गए। ऐसा ही मामला आजकल जिला पूर्वी सिंहभूम के सरकारी अस्पताल का है, जहाँ ब्लड बैंकों का निरीक्षण किया जा रहा। आखिर इसकी आवश्यकता अचानक से क्यों पड़ी? इसपर कभी पढ़े – लिखे समझदार, प्रशासन, विधायक, सांसद या फिर किसी मंत्री को क्यों नहीं सूझी?
सवाल तो बनता है, और हर नागरिक को अधिकार है – सवाल पूछने का
और हमारे यहाँ ऐसा ही है, जबतक कोई अप्रिय घटना नहीं घटती और न ही किसी को भारी नुकसान होता है, तबतक न सरकार जागती है न ही प्रशासन। लोगों का क्या है वो तो बस एक ऊँगली में स्याही लगाने भर के लायक है और बटन दबाने के। बस उनका खेल ख़तम। मजे की बात- एक बटन दबाकर उन्होंने अपनी सारी जिंदगी गिरवी रख दी है।
पूर्वी सिंहभूम जिला प्रशासन द्वारा हाल ही में एमजीएम अस्पताल, सदर अस्पताल और जमशेदपुर ब्लड बैंक का निरीक्षण किया गया। उपायुक्त सह जिला दंडाधिकारी श्री कर्ण सत्यार्थी के नेतृत्व में यह समीक्षा स्वास्थ्य मानकों, ब्लड स्टोरेज, रिकॉर्ड संधारण और सुरक्षा व्यवस्था के आकलन के लिए की गई। सतह पर यह कदम सराहनीय लगता है — लेकिन सवाल यह भी उठता है कि अचानक यह निरीक्षण क्यों जरूरी पड़ गया?
निरीक्षण का औचित्य और देर से जागरूकता
जिले के ब्लड बैंक वर्षों से अपनी सीमित संसाधनों, स्टाफ की कमी और तकनीकी दिक्कतों के बावजूद किसी तरह संचालित हो रहे हैं। न तो प्रशासन ने समय रहते किसी व्यापक सुधार पर ध्यान दिया, न ही किसी जनप्रतिनिधि ने इस दिशा में गंभीर पहल की।
अब जब निरीक्षण हुआ तो जनता का पहला सवाल यही है —
“क्या यह नियमित प्रक्रिया है या किसी अप्रिय घटना के बाद दिखावा?”
उपायुक्त के निर्देश और जमीनी सवाल
निरीक्षण के दौरान उपायुक्त ने ब्लड बैंक संचालन में भारत सरकार और झारखंड सरकार की गाइडलाइंस का सख्ती से पालन करने को कहा। एमजीएम अस्पताल में CB NAT मशीन व्यवस्था सुधारने और सदर अस्पताल में ब्लड सेपरेशन यूनिट की स्थापना के लिए पत्राचार करने का निर्देश दिया गया। हालांकि, इन व्यवस्थाओं की आवश्यकता कोई नई नहीं है — सवाल यह है कि इन कदमों को पहले क्यों नहीं उठाया गया?
जनता की दृष्टि से समीक्षा
जनता का यह तर्क वाजिब है कि प्रशासन अक्सर तभी जागता है जब कोई संकट या हादसा सामने आता है।
लोग कहते हैं —
“हमारे यहाँ तो कहावत है — साँप निकल गया, लोग लकीरें पीटते रह गए।”
हर बार निरीक्षण, बैठक और निर्देश तो मिलते हैं, मगर स्थायी सुधार क्यों नहीं दिखते? रक्तदान और ब्लड बैंक व्यवस्था जनजीवन की नींव हैं। यह केवल निरीक्षण की नहीं बल्कि निरंतर पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है।
उपायुक्त का यह कदम स्वागतयोग्य है, परंतु यदि प्रशासन वास्तव में जनता का विश्वास पाना चाहता है तो निरीक्षण को औपचारिकता नहीं बल्कि लगातार चलने वाली प्रक्रिया बनाना होगा। क्योंकि, ब्लड बैंक में लापरवाही केवल व्यवस्था की नहीं, किसी की जिंदगी की कीमत बन सकती है।














