“हे गुरु,
चिर स्मरणीय
चिर वरणीय
चिर आदरणीय हैं आप।
आप आदि हैं
अनन्त हैं
चिर पूजनीय हैं आप।।
शिक्षा संस्कृति
संस्कार के
असली धरोहर हैं आप।
समाज के
नव निर्माण के
कुशल कारीगर हैं आप।।
सभ्यता की
संपन्नता की
मूल आधार हैं आप।
सृष्टि की
सफलता की
सर्व सार हैं आप।।
कभी अर्जुन के
गांडीव के
अचूक वाण हैं आप।
तो कभी
मिसाइल निर्माण के
अद्भुत ज्ञान हैं आप।।
कभी गीता बाइबिल
पुराण कुरान हैं आप।
कभी मानविक
कभी आनविक
ज्ञान विज्ञान हैं आप।।
कभी शिक्षक
कभी गुरु, कभी
भक्त के भगवान हैं आप।
चिर वंदनीय
अविस्मरणीय
चिर अम्लान हैं आप।।
स्वच्छ एवं
सत्मार्ग की
सटीक पहचान हैं आप।
भक्ति विश्वास
भक्तों की
नर रूपी नारायण हैं आप।।”
कविता का भावार्थ
करुणामय मंडल द्वारा रचित यह कविता “हे गुरु” गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता की भावपूर्ण अभिव्यक्ति है। इसमें कवि ने गुरु को केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, ज्ञान और मानवता का वास्तविक मार्गदर्शक बताया है।
कवि के अनुसार गुरु चिरस्मरणीय, चिरवंदनीय और चिरपूजनीय हैं। वे ज्ञान के आदि और अनंत स्रोत हैं, जिनकी महत्ता समय के साथ कभी कम नहीं होती। गुरु ही शिक्षा, संस्कृति और संस्कारों के सच्चे संरक्षक हैं। वे समाज के नव-निर्माण के कुशल शिल्पकार हैं, जो अपने ज्ञान और आदर्शों से श्रेष्ठ नागरिकों का निर्माण करते हैं।
कविता में गुरु को सभ्यता और समृद्धि का आधार माना गया है। कवि का मानना है कि सृष्टि की सफलता और मानव जीवन की सार्थकता गुरु के ज्ञान और मार्गदर्शन से ही संभव होती है। गुरु केवल पुस्तकीय ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाते हैं।
कवि ने गुरु की बहुआयामी भूमिका को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया है। कभी गुरु अर्जुन के गांडीव के अचूक बाण की तरह लक्ष्य प्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं, तो कभी आधुनिक युग में मिसाइल निर्माण और वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे जटिल विषयों का ज्ञान प्रदान करते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि गुरु का ज्ञान प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं से लेकर आधुनिक विज्ञान और तकनीक तक विस्तृत है।
आगे कवि बताते हैं कि गुरु गीता, बाइबिल, पुराण और कुरान जैसे सभी धर्मग्रंथों की मूल भावना के प्रतीक हैं। वे मानवीय मूल्यों, नैतिकता, विज्ञान और आध्यात्मिकता का समन्वय हैं। गुरु के माध्यम से मनुष्य धर्म, विज्ञान और जीवन के सत्य को समझता है।
कविता के अंतिम भाग में गुरु को कभी शिक्षक, कभी गुरु और कभी भक्तों के भगवान के रूप में चित्रित किया गया है। कवि के अनुसार गुरु मानव रूप में नारायण के समान हैं, जो अपने शिष्यों को सत्य, स्वच्छता, सदाचार और सत्मार्ग की ओर अग्रसर करते हैं। वे श्रद्धा, विश्वास और आदर्श जीवन के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
सारांश
यह कविता गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और सम्मान का संदेश देती है। कवि ने गुरु को ज्ञान, संस्कार, संस्कृति, विज्ञान, आध्यात्मिकता और मानवता का आधार स्तंभ बताया है। कविता का मूल संदेश यह है कि गुरु केवल शिक्षा देने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के निर्माता, चरित्र निर्माण के शिल्पी तथा मानव जीवन को सही दिशा देने वाले दिव्य मार्गदर्शक हैं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने गुरु का सदैव सम्मान, आदर और स्मरण करना चाहिए।
– करुणामय मंडल, पूर्व जिला पार्षद पोटका, पूर्वी सिंहभूम झारखंड















