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Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती मनाई गई माटी भाषा संस्कृति ही आदिवासी समाज की पहचान

On: May 1, 2026 11:16 PM
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Rajnagar

झारखंड: धरती पर आदिवासी संस्कृति की जड़ें गहरी हैं। Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती धूमधाम से मनाई गई, जहां पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन ने कहा माटी, भाषा, संस्कृति एवं परंपराएं ही आदिवासी समाज की पहचान हैं। पंडित रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा के ओलचिकी लिपि के आविष्कारक थे। उनकी जयंती पर यह कार्यक्रम आदिवासी गौरव को नई ऊंचाई दे रहा है। आइए, इस ब्लॉग में विस्तार से जानें कि Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती कैसे मनाई गई और चम्पाई सोरेन ने क्या महत्वपूर्ण बातें कहीं। यह आर्टिकल आदिवासी संस्कृति, भाषा संरक्षण और वर्तमान चुनौतियों पर रोशनी डालेगा। अगर आप झारखंड के हैं या आदिवासी संस्कृति में रुचि रखते हैं, तो अंत तक पढ़ें।

पंडित रघुनाथ मुर्मू संथाली भाषा के जनक

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पंडित रघुनाथ मुर्मू का जन्म 15 जनवरी 1905 को हुआ था। वे संथाली भाषा को ओलचिकी लिपि देने वाले महान सपूत थे। ओलचिकी लिपि ने संथाली को लिखित रूप दिया, जो आदिवासी समाज की पहचान बन गई। Rajnagar (सरायकेला-खरसावां जिले के गामदेसाई) में उनकी जयंती हर साल धूमधाम से मनाई जाती है। इस बार भी कार्यक्रम भव्य रहा।

पूर्व मुख्यमंत्री चम्पाई सोरेन मुख्य अतिथि थे। बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता और ग्रामीण शामिल हुए। यह जयंती सिर्फ समारोह नहीं, बल्कि संथाली भाषा और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प है। चम्पाई सोरेन ने प्राइमरी स्तर से ओलचिकी में पढ़ाई पर जोर दिया।

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चम्पाई सोरेन का संबोधन भाषा और संस्कृति पर जोर

कार्यक्रम में चम्पाई सोरेन ने भावुक होकर कहा—माटी, भाषा, संस्कृति एवं परंपराएं ही आदिवासी समाज की पहचान हैं। उन्होंने अपने कार्यकाल का जिक्र किया, जब झारखंड में संथाली समेत आदिवासी भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा शुरू हुई। दुर्भाग्य से बाद में इसे रोक दिया गया।

Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती पर उन्होंने अपील की—प्राइमरी से ओलचिकी लिपि में पढ़ाई हो। इससे संथाली साहित्य समृद्ध होगा। आज बांग्लादेशी घुसपैठिए जमीन हड़प रहे हैं, धर्मांतरण का खतरा है। ऐसे में अपनी जड़ों से जुड़ना जरूरी है। भाषा-संस्कृति का संरक्षण ही अस्तित्व बचा सकता है।

ऐतिहासिक संघर्ष की याद

चम्पाई सोरेन ने बताया—दशकों के आंदोलन के बाद 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संथाली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया। मोदी सरकार ने संसद कार्यवाही का संथाली अनुवाद शुरू किया। इस साल ओलचिकी के 100 वर्ष पर शताब्दी समारोह है। केंद्र ने ₹100 का स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी किया। यह सम्मान पंडित रघुनाथ मुर्मू को है।

ओलचिकी लिपि संथाली की धरोहर

ओलचिकी लिपि 1925 में पंडित रघुनाथ मुर्मू ने बनाई। यह 30 स्वर और 18 व्यंजन वाली वैज्ञानिक लिपि है। इससे संथाली साहित्य फला-फूला। ‘विद्रोह’ उनका प्रसिद्ध नाटक है। राजनगर में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती पर ओलचिकी की महत्ता पर चर्चा हुई।

आज डिजिटल युग में ओलचिकी को यूनिकोड में शामिल किया गया। मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स उपलब्ध हैं। लेकिन चुनौती यह है कि युवा हिंदी-अंग्रेजी की ओर मुड़ रहे। प्राइमरी शिक्षा से इसे रोका जा सकता है।

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आदिवासी संस्कृति की चुनौतियां

आदिवासी समाज पर घुसपैठ, शहरीकरण और वैश्वीकरण का दबाव है। चम्पाई सोरेन ने साफ कहा—माटी से जुड़ाव बनाए रखें। झारखंड में 32 आदिवासी भाषाएं हैं। इनका संरक्षण जरूरी। Rajnagar जैसे गांव संस्कृति के केंद्र हैं।

झारखंड में आदिवासी भाषा शिक्षा वर्तमान स्थिति

झारखंड सरकार ने संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख जैसी भाषाओं को मान्यता दी। लेकिन प्राइमरी स्तर पर ओलचिकी पढ़ाई रुकी हुई। चम्पाई सोरेन की मांग जायज है। केंद्र ने ओलचिकी को शेड्यूल 8 में शामिल किया। अब स्कूलों में इसे लागू करने का समय है।

राजनगर में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती ने नई बहस छेड़ी। ग्रामीणों ने संकल्प लिया भाषा बचाएंगे। भाजपा कार्यकर्ताओं ने इसे राजनीतिक मुद्दा भी बनाया।

युवाओं के लिए संदेश

युवा ओलचिकी सीखें। सोशल मीडिया पर इस्तेमाल करें। साहित्य लिखें। इससे पहचान मजबूत होगी।

राष्ट्रीय स्तर पर ओलचिकी शताब्दी विशेष आयोजन

इस साल ओलचिकी के 100 वर्ष पूरे हो रहे। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय समारोह की घोषणा की। स्मारक सिक्का, डाक टिकट के अलावा पुस्तकें जारी होंगी। पंडित रघुनाथ मुर्मू को ‘झारखंड का गुरु’ कहा जाता है। उनकी जन्मभूमि ओडिशा के मयूरभंज में भी कार्यक्रम हुए। झारखंड-ओडिशा मिलकर इसे सेलिब्रेट कर रहे।

आदिवासी समाज का भविष्य संरक्षण ही समाधान

माटी, भाषा, संस्कृति से जुड़ाव ही आदिवासी समाज को बचा सकता है। Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती ने यह संदेश दिया। चम्पाई सोरेन जैसे नेता संघर्ष कर रहे। अब समाज को आगे आना होगा। शिक्षा, जागरूकता से घुसपैठ रोकी जा सकती। परंपराएं निभाएं, तो पहचान बनी रहेगी।

Rajnagar में पंडित रघुनाथ मुर्मू की जयंती ने आदिवासी समाज को एकजुट किया। माटी, भाषा, संस्कृति एवं परंपराएं ही हमारी पहचान हैं—चम्पाई सोरेन सही कहते हैं। ओलचिकी को प्राइमरी शिक्षा में लाएं, घुसपैठ-धर्मांतरण रोकें। यह जयंती नई शुरुआत है। झारखंड के सभी आदिवासी भाइयों-बहनों से अपील—अपनी धरोहर बचाएं। ओलचिकी सीखें, साहित्य लिखें। सफलता मिलेगी। जय झारखंड, जय आदिवासी!

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