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कुड़मालि भाषा के पुरोधा Laxmikantमुतरुआर की जयंती पर अनूठी पहल विवाह समारोह बना सांस्कृतिक पहचान का संदेशवाहक

On: April 23, 2026 6:02 PM
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झारखंड: सांस्कृतिक धरोहर को मजबूत करने वाली कुड़मालि भाषा के महान पुरोधा Laxmikant मुतरुआर की जयंती हर साल 22 अप्रैल को धूमधाम से मनाई जाती है। इस बार कुड़मी समाज के अगुआ दिलीप कडुआर ने अपने बेटे राजकिशोर के विवाह को इस खास दिन से जोड़कर एक अनूठी मिसाल कायम की। यह शादी न सिर्फ पारिवारिक खुशी का प्रतीक बनी, बल्कि भाषा, संस्कृति और सामाजिक सुधार का जीवंत संदेश बन गई।

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यह आयोजन जमशेदपुर के बालीगुमा से शुरू होकर सरायकेला-खरसावां के तिरुलडीह क्षेत्र के बाहमनडीह गांव में संपन्न हुआ। बिना तिलक-दहेज के कुड़मालि नेग-नीति के अनुसार हुई इस शादी ने समाज को नई दिशा दिखाई। आइए, इस प्रेरणादायक पहल को विस्तार से जानते हैं।

Laxmikant मुतरुआर कुड़मालि भाषा के अग्रदूत

Laxmikant मुतरुआर का जन्म 22 अप्रैल 1939 को बोकारो जिले के चास प्रखंड के भंडरो गांव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। वे कुड़मालि भाषा, साहित्य और संस्कृति के प्रबल समर्थक थे, जिन्होंने अपनी लेखनी और सामाजिक कार्यों से इस भाषा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। 26 सितंबर 2012 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनके योगदान को अमर बनाने के लिए कुड़मी समाज ने उनकी जयंती को “कुड़मालि दिवस” के रूप में घोषित कर दिया।

मुतरुआर जी ने कुड़मालि को साहित्यिक रूप दिया, लोककथाओं को संजोया और समाज में भाषाई गौरव जगाया। साहित्य अकादमी जैसे मंचों पर भी कुड़मालि सम्मेलनों में उनकी चर्चा होती रही। आज कुड़मालि को झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार में लाखों लोग बोलते हैं, और 8वीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज हो रही है। उनकी बदौलत यह भाषा केवल बोलचाल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्मिता का प्रतीक बन गई।

उनके कार्यों ने युवाओं को अपनी मातृभाषा से जोड़ने का संदेश दिया। हर साल कुड़मालि दिवस पर गोष्ठियां, सांस्कृतिक कार्यक्रम और श्रद्धांजलि सभाएं होती हैं, जो भाषा संरक्षण का संकल्प दिलाती हैं।

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अनूठी पहल विवाह समारोह में सांस्कृतिक संदेश

इस वर्ष 22 अप्रैल 2026 को दिलीप कडुआर ने अपने पुत्र राजकिशोर का विवाह प्रिंसि से करवाया, जो कुड़मालि दिवस पर एक सकारात्मक संदेश बना। यह शादी पूरी तरह पारंपरिक कुड़मालि नेग-नीति के अनुसार हुई – बिना किसी तिलक या दहेज के। नेग-नीति कुड़मी समाज के रीति-रिवाज हैं, जिसमें संगीत, नृत्य और सामूहिक आशीर्वाद प्रमुख हैं। इस पहल ने दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ मजबूत आवाज बुलंद की।

बारात जमशेदपुर के सुखना बस्ती, डिमना से निकली। हर गाड़ी पर Laxmikant मुतरुआर की तस्वीर सजी थी, साथ ही प्रेरणादायक नारे लिखे गए:

  • “परंपरा हमारी, जिंदगी पहचान हमारी”
  • “भाषा, जिंदगी, संस्कृति और गौरव हमारी”
  • “राजकिशोर संग प्रिंसि”

यह दृश्य देखकर हर कोई प्रभावित हुआ। विवाह स्थल बाहमनडीह गांव में कुड़मालि गीतों, नृत्यों और स्थानीय व्यंजनों से सजा रहा। दिलीप कडुआर ने साबित कर दिया कि निजी आयोजन भी सामाजिक जागरूकता का माध्यम बन सकते हैं। समाज में इसकी खूब तारीफ हो रही है।

कुड़मालि भाषा और संस्कृति की महत्ता

कुड़मालि एक इंडो-आर्यन भाषा है, जो कुड़मी (कुरमी) समुदाय की मातृभाषा है। यह झारखंड के सिंहभूम, रांची, खूंटी, सरायकेला जैसे जिलों में प्रचलित है। देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली यह भाषा लोकगीतों, कहानियों और मुहावरों से समृद्ध है। मुतरुआर जी ने इसे व्याकरण और साहित्य दिया, जिससे अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर भी इसे महत्व मिला।

कुड़मी समाज कृषि-आधारित है, और उनकी संस्कृति में सरना पूजा, जत्रा और त्योहार जैसे करमा-सरहुल प्रमुख हैं। भाषा संरक्षण से पहचान मजबूत होती है। आज युवा सोशल मीडिया पर कुड़मालि कंटेंट शेयर कर रहे हैं, जो मुतरुआर जी का सपना पूरा कर रहा है।

इस विवाह ने दिखाया कि कैसे परंपराओं को आधुनिक तरीके से जीवंत रखा जा सकता है। दहेज-मुक्त विवाह कुड़मी समाज में नई लहर ला सकता है।

समाज पर प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं

यह पहल कुड़मी समाज के लिए मील का पत्थर है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां दहेज प्रथा आम है, वहां बिना दहेज की शादी ने प्रेरणा दी। सांस्कृतिक नारों वाली बारात ने हजारों लोगों तक संदेश पहुंचाया। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो रहे हैं, जो कुड़मालि दिवस को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित बना रहे हैं।

भविष्य में ऐसी पहलें बढ़ेंगी। कुड़मालि को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने, ऐप्स विकसित करने और साहित्यिक सम्मेलनों की जरूरत है। सरकार से 8वीं अनुसूची की मांग तेज हो। युवा पीढ़ी को भाषा सिखाने से सांस्कृतिक निरंतरता बनी रहेगी।

कुड़मालि नेग-नीति पारंपरिक विवाह की झलक

कुड़मालि नेग-नीति में विवाह सरल होता है:

  1. मंगनी: सामूहिक चर्चा और उपहार।
  2. बारात: गीत-संगीत से सजी।
  3. कन्यादान: आशीर्वाद के साथ।
  4. बिदाई: भावुक लेकिन हर्षपूर्ण।

इस समारोह में ये सभी तत्व थे, बिना फिजूलखर्ची के। यह दिखाता है कि परंपरा आधुनिकता के साथ चल सकती है।

कुड़मालि भाषा के पुरोधा Laxmikant मुतरुआर की जयंती पर अनूठी पहल, विवाह समारोह बना सांस्कृतिक पहचान का संदेशवाहक – यह आयोजन समाज को नई ऊर्जा दे रहा है।

दिलीप कडुआर जैसे लोग दिखाते हैं कि छोटे प्रयास बड़े बदलाव ला सकते हैं। अपनी भाषा-संस्कृति पर गर्व करें, कुरीतियां त्यागें। ऐसी पहलें बढ़ें, तो झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर और मजबूत होगी। आप भी अपनी परंपराओं को ऐसे संवारे!

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