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Maa Bhagwati सिद्ध पीठ, केरा (चक्रधरपुर) 400 वर्षों की आस्था और अनूठी विरासत

On: April 1, 2026 8:52 PM
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झारखंड: अगर आप सिंहभूम–झारखंड की धार्मिक व ऐतिहासिक विरासत से जुड़े हैं या बस एक छोटे‑से गाँव में बसी Maa Bhagwati सिद्ध पीठ, केरा (चक्रधरपुर) की गहरी आस्था और रहस्यमय किंवदंती सुनना चाहते हैं, तो यह ब्लॉग आपके लिए ही है। यहाँ न सिर्फ प्राचीन इतिहास बोलता है, बल्कि आज भी जीवंत रूप से जारी है एक ऐसी भक्ति जो देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

 Maa Bhagwati केरा सिंहभूम की 400 साल पुरानी आस्था

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पश्चिमी सिंहभूम के चक्रधरपुर प्रखंड में स्थित केरा गाँव का  Maa Bhagwati मंदिर झारखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का एक अनूठा निशान माना जाता है।
लोकमान्यता और राजपरिवार के वृत्तांत के अनुसार, यहाँ स्थापित  Maa Bhagwati की सिद्ध प्रतिमा लगभग 300–500 वर्ष पुरानी मानी जाती है, जिसे अनेक स्रोत 400 साल पुरानी विरासत के रूप में भी देखते हैं।

यही कारण है कि केरा मंदिर को न केवल सिंहभूम का आस्था केंद्र कहा जाता है, बल्कि एक “सिद्ध पीठ” और लोक ‑ट्रेडिशन का जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।

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सन्यासी और कामरूप कामाख्या से लाए गए दिव्य शिलाखंड

केरा मंदिर की रहस्यमयी कहानी इसी बात से शुरू होती है कि एक सिद्ध साधु/सन्यासी ने असम‑आसाम के आधुनिक क्षेत्र में स्थित कामरूप कामाख्या से Maa Bhagwati की एक दिव्य शिलाप्रतिमा लेकर आये थे।

इस कथा के अनुसार, वह सन्यासी केरा नदी के किनारे आया और वहाँ एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे आश्रम बनाकर तपस्या में लीन हो गया। धीरे‑धीरे वहीं उसका जीवन भी समाप्त हो गया और वे उसी पवित्र वृक्ष के नीचे ब्रह्मलीन हो गए।

इस तरह एक दूर के शक्तिपीठ से लाई गई शिलाप्रतिमा ने चक्रधरपुर के एक छोटे‑से गाँव में अपनी नई जीवन‑यात्रा शुरू की, जिसका आज भी यहाँ गहरा असर दिखता है।

राजा लोकनाथ सिंहदेव और Maa का स्वप्न‑दर्शन

सन्यासी के तपोनिष्ठ जीवन के बाद यह क्षेत्र आस्था और राज‑संरक्षण के बीच जुड़ने लगा। केरा राजपरिवार के राजा ठाकुर लोकनाथ सिंहदेव को Maa Bhagwati का एक स्वप्न‑दर्शन हुआ, जिसमें माँ ने स्पष्ट किया:

मैं तुम्हारे राज्य की रक्षा के लिए यहाँ आ बसी हूँ। इस स्थान पर अपना मंदिर बनवाओ और मेरी नियमित उपासना करो।”

इस दर्शन के बाद राजा ने उसी बरगद के नीचे विराजमान माँ की प्रतिमा के लिए एक संगठित मंदिर का निर्माण कराया। तब से केरा राजपरिवार माँ भगवती के संरक्षक और पुजारी के रूप में अपनी भूमिका निभाता आया है।

छऊ नृत्य का चमत्कार 13 अप्रैल का विशेष दिन

Maa Bhagwati केरा की आस्था सिर्फ पूजा‑अर्चना तक नहीं रुकती, बल्कि छऊ नृत्य, झारखंड की विश्वप्रसिद्ध लोककला, के साथ भी जुड़ी हुई है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, एक बार माँ ने खुद एक सुंदर युवती का रूप धारण कर छऊ नृत्य देखने आई और उस नृत्य से इतनी प्रसन्न हुईं कि राजपरिवार ने उनकी प्रसन्नता के सम्मान में हर वर्ष 13 अप्रैल को मंदिर के सामने भव्य छऊ नृत्य का आयोजन शुरू किया।

आज भी यह आयोजन जारी है:

  • 12 अप्रैल: राजबाड़ी परिसर में छऊ नृत्य।
  • 13 अप्रैल: मंदिर परिसर में रात भर चलने वाला छऊ नृत्य।

यानी यहाँ नृत्य और भक्ति का ऐसा मिलन दिखता है, जो देखकर कला और आस्था दोनों का अनुभव एक साथ हो जाता है।

केरा मेला अप्रैल का वार्षिक उत्सव

केरा मंदिर सिर्फ दिन‑दिनार नहीं, बल्कि एक विशाल मेला के रूप में भी ख्याति रखता है।

  • हर साल अप्रैल माह में मंदिर में नौ दिन तक विशेष अनुष्ठान और मेला आयोजित होता है।
  • इस दौरान शुभ घट, यात्रा घट, वृंदावन यात्रा, गरियाभार यात्रा, जलाभिषेक और कालिका घट जैसे विशिष्ट अनुष्ठान होते हैं।

इस मेले में हजारों की संख्या में श्रद्धालु चक्रधरपुर, चाइबासा, रांची और अन्य क्षेत्रों से आते हैं, जिससे केरा मंदिर सिंहभूम का सबसे बड़ा मेला कहलाता है।

अग्निपथ और कांटों की शय्या हठभक्ति का अद्भुत नज़ारा

केरा मंदिर की सबसे विशिष्ट विशेषता है – अग्निपथ और कांटों की शय्या पर सोने वाली हठभक्ति

  • श्रद्धालु माँ से अपनी मुराद पूरी होने की अपील में
  • नंगे पैर धधकते अंगारों पर चलते हैं (अग्निपथ)
  • और कांटों की शय्या पर सोकर अपनी भक्ति का परिचय देते हैं।

इन अनुष्ठानों के दौरान होने वाला “कालिका घट” मेले के अंतिम दिन (14 अप्रैल) का एक विशेष आयोजन है, जिसमें अग्नि और कांटों के माध्यम से भक्त अपनी शक्ति और विश्वास का इज़हार करते हैं।

धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व

  1. धर्मिक महत्व
    • Maa Bhagwati की प्रतिमा को “सिद्ध” माना जाता है, यानी जिसके दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
    • यहाँ दुर्गा पूजा की परंपरा 400 वर्षों से भी अधिक पुरानी मानी जाती है।
  2. सांस्कृतिक महत्व
    • चक्रधरपुर‑सिंहभूम के लोक‑नृत्य छऊ के साथ जुड़ा हुआ एकमात्र मंदिर‑संदर्भों में से एक।
    • यहाँ नृत्य, यात्राएं, यात्रा घट और लोक‑नाटक एक साथ चलते ह

यहाँ भक्त अपनी मुरादें पूरी करने के लिए नंगे पैर धधकते अंगारों पर चलते हैं (अग्निपथ) और कांटों की शय्या पर सोते हैं। यह भक्ति और शक्ति का एक ऐसा मिलन है जिसे देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

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