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पत्रकार को अंतरिम संरक्षण: “सत्ता की आलोचना अपराध नहीं” — सुप्रीम कोर्ट का लोकतंत्र की रक्षा पर ऐतिहासिक संदेश

On: October 7, 2025 8:48 PM
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला — पत्रकारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मिला नया आयाम

नई दिल्ली, 7 अक्टूबर 2025। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता को दबाने की हर कोशिश पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि —

“सरकार की आलोचना करना अपराध नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा है।”

  • यूपी सरकार की आलोचना पर दर्ज एफआईआर में पत्रकार को अंतरिम संरक्षण
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उत्तर प्रदेश के पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ दर्ज एफआईआर पर सुनवाई करते हुए अदालत ने उन्हें अंतरिम संरक्षण प्रदान किया और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। कोर्ट ने साफ कहा कि केवल सरकारी नीतियों की आलोचना के आधार पर किसी पत्रकार को दंडित नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

लखनऊ के स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने सितंबर 2024 में एक लेख प्रकाशित किया था —
“यादव राज वर्सेज ठाकुर राज (या सिंह राज)”

इस लेख में उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन के प्रशासनिक ढांचे में जातिगत असंतुलन और पदों के बंटवारे पर सवाल उठाए थे।
लेख के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व ट्विटर) पर वायरल होने के बाद पत्रकार पंकज कुमार की शिकायत पर लखनऊ के हजरतगंज थाने में एफआईआर नंबर 265/2024 दर्ज की गई।

एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई गंभीर धाराएं लगाई गईं —
353(2), 197(1)(C), 302, 356(2) और आईटी एक्ट की धारा 66

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सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

यह मामला जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस एसवीएन भट्टी की खंडपीठ के समक्ष आया।
सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा —

“पत्रकारों को सत्ता से सवाल करने का अधिकार है। केवल सरकारी आलोचना को आधार बनाकर आपराधिक मुकदमे दर्ज करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) का उल्लंघन है।”

अदालत ने यूपी सरकार को चार सप्ताह में हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि उपाध्याय के खिलाफ गिरफ्तारी या कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगी। साथ ही, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम याचिका से हटाने की अनुमति दी गई।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर कोर्ट का स्पष्ट संदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि —

“सरकारी आलोचना लोकतंत्र की सुरक्षा का साधन है, न कि अपराध।
पत्रकार की कलम सच्चाई की आवाज़ है, उसे डराया नहीं जा सकता।”

अदालत ने यह भी माना कि एफआईआर बदले की भावना से प्रेरित लगती है और प्रशासन को पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।

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पत्रकारिता जगत की प्रतिक्रिया

इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर #PressFreedom और #SupremeCourt ट्रेंड करने लगे।
पत्रकार संगठनों, विपक्षी नेताओं और नागरिक समाज ने इसे “प्रेस फ्रीडम की ऐतिहासिक जीत” बताया।

फ्रीलांस पत्रकार ममता त्रिपाठी के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह का अंतरिम संरक्षण दिया था, जिसे अब अभिषेक उपाध्याय की याचिका से जोड़ा गया है।

आगामी सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 5 नवंबर 2024 को होगी, जिसमें उत्तर प्रदेश सरकार अपना पक्ष रखेगी।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि राज्य सरकारों को पत्रकारों के खिलाफ दमनकारी धाराओं के दुरुपयोग से बचना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल अभिषेक उपाध्याय के लिए राहत है,
बल्कि पूरे भारतीय मीडिया जगत के लिए एक संवैधानिक ढाल साबित हुआ है।
न्यायालय ने दोहराया —
“सच्चाई की कलम कभी नहीं झुकेगी, और आलोचना लोकतंत्र की जान है।”

(स्रोत: सुप्रीम कोर्ट रिकॉर्ड, एक्स पोस्ट्स एवं संबंधित रिपोर्ट्स)

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Anil Kumar Maurya

अनिल कुमार मौर्य एक अनुभवी पत्रकार, मीडिया रणनीतिकार और सामाजिक चिंतक हैं, जिन्हें पत्रकारिता एवं मीडिया क्षेत्र में 10 से अधिक वर्षों का अनुभव है। वे वर्तमान में The News Frame के संस्थापक और मुख्य संपादक के रूप में कार्यरत हैं — एक डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म जो क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और सामाजिक सरोकारों को निष्पक्ष और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करता है।अनिल जी राष्ट्रीय पत्रकार मीडिया संगठन (Rashtriya Patrakar Media Sangathan) के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं, जहां वे पत्रकारों के अधिकारों, मीडिया की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

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