पोटका, पूर्वी सिंहभूम | पोटका प्रखंड के हाथीबिंधा पंचायत अंतर्गत बांधडीह गांव की 78 वर्षीय विशाखा मंडल और उनके पति मलिन मंडल की पीड़ा आज शासन-प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक सवाल बनकर खड़ी है। बीते चौदह महीनों से विशाखा मंडल को वृद्धा पेंशन नहीं मिल रही है, जबकि उनके पति को भी कई माह से पेंशन नहीं मिली है। इस बुजुर्ग दंपति के लिए सरकारी पेंशन और जन वितरण प्रणाली से मिलने वाला अनाज ही जीवन का एकमात्र सहारा है।
इस विषम परिस्थिति में दोनों पति-पत्नी आधार कार्ड, पासबुक और अन्य दस्तावेजों की फोटो कॉपी के साथ महीनों से पंचायत और प्रखंड कार्यालय का चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी स्थिति जस की तस बनी हुई है। इस दौरान किसी भी अधिकारी या कर्मचारी ने न तो समस्या को गंभीरता से लिया और न ही समाधान की दिशा में कोई ठोस प्रयास किया।
एक मानवीय हस्तक्षेप की मिसाल
बुजुर्ग दंपति की यह दुर्दशा देखकर गांव के ही सामाजिक कार्यकर्ता सुखदेव मंडल ने उन्हें पोटका के पूर्व जिला पार्षद करुणामय मंडल के पास पहुंचाया। श्री मंडल ने समस्या को गंभीरता से लिया और यथाशीघ्र उचित कार्यवाही और पेंशन की बहाली का आश्वासन दिया।
यह मामला केवल एक वृद्धा या एक गांव का नहीं है, यह हमारे सामाजिक ताने-बाने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति को उजागर करता है। वृद्धा पेंशन योजना उन लोगों के लिए है जिनका जीवन अब आश्रय और सहारे का मोहताज है। लेकिन जब पात्र लाभार्थियों को उनका हक समय पर न मिले, तो यह व्यवस्था पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न बन जाता है।
जरूरत इस बात की है कि –
- प्रशासन ऐसी समस्याओं पर संवेदनशीलता दिखाए,
- तकनीकी या फाइलों की भूलभुलैया में बुजुर्गों को न उलझाया जाए,
- ग्राम स्तर पर जनप्रतिनिधियों की निगरानी और सक्रियता को बढ़ाया जाए,
- और समाज, ऐसे असहाय लोगों की आवाज़ बने, जैसा कि सुखदेव मंडल ने किया।
बांधडीह के इस बुजुर्ग दंपति की तरह न जाने कितने वृद्ध आज भी अपनी पेंशन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। यह सिर्फ प्रशासन का दायित्व नहीं, बल्कि हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम ऐसी आवाज़ों को न सिर्फ सुनें, बल्कि उन्हें उनका हक दिलाने के लिए आगे भी आएं।








