खरसावां | 26 जुलाई 2025: राजकीय पॉलिटेक्निक खरसावां के प्राचार्य डॉ. उमेश कुमार पर हाल ही में गंभीर आरोप लगाए गए, जिनमें से एक यह था कि उन्होंने छात्रों को जबरन छात्रावास से निकालकर किराये पर रूम लेने को मजबूर किया।
आरोप था कि छात्रावास पूर्णतः रहने योग्य होते हुए भी उसे ‘खराब’ घोषित कर खाली कराया गया। आरोप लगाने वालों का कहना है कि गरीब छात्र किराये के मकानों में रहने को मजबूर हैं, जिससे उनका आर्थिक बोझ बढ़ा है।
लेकिन जब हमारी टीम ने इस पूरे मामले की पड़ताल की, तो सच्चाई की परतें एकएक कर खुलने लगीं।
जांच में क्या सामने आया?
प्राचार्य डॉ. उमेश कुमार अगस्त 2024 में पदस्थापित हुए हैं। छात्रावास अप्रैल–मई 2024 में ही खाली कराया जा चुका था — यानी यह निर्णय उनके कार्यभार संभालने से पूर्व का है। डॉ. उमेश कुमार ने बताया कि छात्रावास की स्थिति जर्जर है और ऐसे भवन में छात्रों को रखना उनके जीवन के साथ खिलवाड़ होगा।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनके खिलाफ एक सोचीसमझी षड्यंत्र रची जा रही है। इस साजिश के पीछे उन्होंने संस्थान के परीक्षा नियंत्रक एवं शिक्षक उत्तम कुमार का नाम लिया।

भवन की जमीनी हकीकत: हमारी टीम की रिपोर्ट
हमारी रिपोर्टिंग टीम ने राजकीय पॉलिटेक्निक खरसावां के छात्रावास भवन का स्थलीय निरीक्षण किया। नतीजा स्पष्ट था: दीवारें चटक चुकी हैं, छत से प्लास्टर झड़ रहा है, नालियां जाम हैं और भवन में मूलभूत सुरक्षा की कमी है।
एक वीडियो रिपोर्ट भी तैयार की गई है जिसमें साफ दिखता है कि छात्रावास फिलहाल रहने योग्य नहीं है।
प्राचार्य डॉ. उमेश कुमार ने लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा की, सभी आरोप बेबुनियाद है। – https://www.thenewsframe.com/government-polytechnic-kharsawan-principal-dr/

तो सवाल उठता है…
- क्या यह मामला प्राचार्य की छवि धूमिल करने का प्रयास था?
- क्या कुछ आंतरिक गुटबाज़ी संस्थान की कार्यसंस्कृति को प्रभावित कर रही है?
- क्या छात्रों की भलाई के नाम पर झूठे नैरेटिव खड़े किए जा रहे हैं?
सरकार की भूमिका अहम
अब जब तथ्यों से यह स्पष्ट हो रहा है कि छात्रावास की स्थिति ही छात्रों को बाहर रहने के लिए बाध्य कर रही है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य सरकार इस पूरे प्रकरण को किस दृष्टिकोण से देखती है।
क्या सरकार इस मामले में निष्पक्षता और विवेक का परिचय देते हुए प्राचार्य पर लगे अनुचित आरोपों को खारिज करेगी, या फिर आंतरिक राजनीति के दबाव में निर्णय होगा?
न्याय के तराजू पर साख
डॉ. उमेश कुमार का कहना है कि वे संस्थान में पारदर्शिता और सुधार की दिशा में काम कर रहे हैं।
अगर यह सच है, तो ऐसी आवाजों को संरक्षण देना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। यह मामला केवल एक छात्रावास या एक व्यक्ति से जुड़ा नहीं है — यह शिक्षण संस्थानों में नैतिकता बनाम राजनीति की लड़ाई का प्रतीक बन सकता है।
जर्जर और अव्यवस्थित छात्रावास का वीडियो देखें-
(विशेष रिपोर्ट: द न्यूज़ फ्रेम)








