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कराची के किलर कमोडोर बब्रूवाहन यादव की वह वीरगाथा जिसने 1971 में पाकिस्तान की रीढ़ तोड़ दी

On: January 22, 2026 12:58 PM
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नई दिल्ली :-भारतीय नौसेना के इतिहास में 1971 का भारत–पाक युद्ध स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज है। इस युद्ध में भारतीय नौसेना की निर्णायक भूमिका और अद्भुत रणनीतिक क्षमता ने न केवल पाकिस्तान की कमर तोड़ी, बल्कि विश्व नौसैनिक इतिहास को भी नई दिशा दी। इस ऐतिहासिक विजय के केंद्र में रहे कमोडोर बब्रूवाहन (बबरू) यादव, जिन्हें उनके अद्वितीय पराक्रम के कारण “किलर ऑफ कराची” की उपाधि मिली।

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1971 का युद्ध उस समय शुरू हुआ जब पाकिस्तान ने 3 दिसंबर को भारतीय वायुसेना के ठिकानों पर हमला किया। इसके बाद भारत को थल, जल और वायु—तीनों मोर्चों पर एक साथ लड़ना पड़ा। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों के बीच भारत का हस्तक्षेप निर्णायक साबित हुआ। इसी क्रम में भारतीय नौसेना ने पाकिस्तान की जीवनरेखा माने जाने वाले कराची बंदरगाह को निशाना बनाने की साहसिक योजना बनाई, जिसकी जिम्मेदारी कमोडोर बब्रूवाहन यादव को सौंपी गई।


ऑपरेशन ट्राइडेंट: कराची पर निर्णायक वार

4–5 दिसंबर 1971 की रात भारतीय नौसैनिक इतिहास की सबसे साहसिक रातों में से एक थी। कमोडोर यादव के नेतृत्व में भारतीय नौसेना के मिसाइल बोट स्क्वाड्रन ने कराची बंदरगाह पर अचानक हमला कर दिया। इस अभियान में आईएनएस निपात, आईएनएस निर्घात और आईएनएस वीर जैसी छोटी लेकिन अत्यंत घातक मिसाइल बोट्स शामिल थीं, जिन्हें आईएनएस राजपूत, आईएनएस तलवार और आईएनएस त्रिशूल का रणनीतिक सहयोग प्राप्त था।

करीब 250 मील भीतर दुश्मन के इलाके में घुसकर किया गया यह हमला अत्यंत जोखिम भरा था। रात के अंधेरे और रडार से बचने की सटीक योजना के साथ भारतीय नौसेना ने पाकिस्तानी रक्षा को संभलने का मौका तक नहीं दिया। हमले में पाकिस्तानी विध्वंसक पीएनएस खैबर, खनन पोत पीएनएस मुहाफिज़ और एक व्यापारी जहाज नष्ट कर दिए गए। इस हमले में पाकिस्तानी नौसेना को भारी जन और संसाधन हानि उठानी पड़ी।


तेल भंडारों में लगी आग, पाकिस्तान की आपूर्ति ठप

ऑपरेशन ट्राइडेंट की सबसे बड़ी सफलता कराची के केमारी तेल टर्मिनल पर किया गया हमला था। सटीक मिसाइल हमलों से तेल भंडारण टैंकों में भीषण आग लग गई, जो कई दिनों तक जलती रही। हजारों टन तेल जलकर नष्ट हो गया, जिससे पाकिस्तान की सैन्य और आर्थिक आपूर्ति व्यवस्था चरमरा गई। कराची बंदरगाह लंबे समय तक निष्क्रिय हो गया और पाकिस्तानी नौसेना युद्ध के शेष दिनों में समुद्र में निकलने का साहस नहीं कर सकी।


ऑपरेशन पायथन: दूसरी निर्णायक चोट

ऑपरेशन ट्राइडेंट के बाद 8–9 दिसंबर की रात भारतीय नौसेना ने ऑपरेशन पायथन के तहत कराची पर दूसरा हमला किया। इस अभियान में पाकिस्तानी टैंकर पीएनएस डाक्का को डुबो दिया गया और एक बार फिर तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया। इस दोहरी मार ने पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमता को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।


विश्व नौसैनिक इतिहास में मील का पत्थर

ऑपरेशन ट्राइडेंट को विश्व स्तर पर युद्धपोत-रोधी मिसाइलों के पहले सफल और निर्णायक उपयोग के रूप में देखा जाता है। इस अभियान ने यह सिद्ध कर दिया कि तकनीकी रूप से उन्नत छोटे जहाज भी बड़े नौसैनिक बेड़ों को पराजित कर सकते हैं। विश्व की कई नौसेनाओं ने इस ऑपरेशन का अध्ययन कर अपनी रणनीतियों में बदलाव किए।

सबसे उल्लेखनीय तथ्य यह रहा कि इस पूरे अभियान में भारतीय नौसेना का कोई भी जहाज क्षतिग्रस्त नहीं हुआ और एक भी भारतीय नौसैनिक शहीद नहीं हुआ। यह कमोडोर यादव के नेतृत्व, अनुशासन और रणनीतिक कौशल का प्रत्यक्ष प्रमाण था।


सम्मान, विरासत और प्रेरणा

ऑपरेशन ट्राइडेंट की स्मृति में 4 दिसंबर को भारत में नौसेना दिवस मनाया जाता है। कमोडोर बब्रूवाहन यादव को उनके अद्वितीय साहस के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। वे भारतीय नौसेना में महावीर चक्र पाने वाले पहले अधिकारी बने।

हरियाणा के भाड़ावास गांव निवासी यदुवंश के इस वीर सपूत के सम्मान में दिल्ली रोड का नाम अब “कमोडोर बब्रूभान यादव मार्ग” रखा गया है। 1947 से 1971 तक देश की रक्षा में वीर अहीरों के अद्वितीय योगदान की श्रृंखला में यह विजय एक ऐतिहासिक अध्याय है।


देश के युवाओं के लिए प्रेरणा

“किलर ऑफ कराची” केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के अदम्य साहस, रणनीतिक बुद्धिमत्ता और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है। कमोडोर बब्रूवाहन यादव की वीरगाथा आज भी युवा अधिकारियों और देशवासियों को यह संदेश देती है कि सही नेतृत्व, स्पष्ट योजना और निर्भीक संकल्प से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।

1971 की ऐतिहासिक विजय में उनका योगदान अमूल्य है और उनकी विरासत भारतीय नौसेना के गौरवशाली इतिहास में सदैव अमर रहेगी।

वरुण कुमार
कवि एवं लेखक
तुलसी भवन

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