साहिबगंज, झारखंड | झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। साहिबगंज जिले से एक बेहद दुखद और शर्मनाक मामला सामने आया है, जहाँ बीमार किशोरी को खाट पर लादकर अस्पताल लाया गया, लेकिन इलाज से पहले ही उसकी मौत हो गई। इससे भी ज्यादा हैरानी की बात ये है कि मौत के बाद परिजनों को शव ले जाने के लिए एंबुलेंस तक नहीं मिली। मजबूरी में परिजन शव को खाट पर रखकर 10 किलोमीटर तक पैदल चलने को मजबूर हुए ।
ये घटना सिर्फ एक परिवार की परेशानी नहीं है, बल्कि ये पूरे स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही और असंवेदनशीलता को उजागर करती है।
बुनियादी सुविधा तक नहीं मिल रही
गांवों में आज भी एंबुलेंस जैसी जरूरी सुविधा समय पर नहीं मिल रही है। बीमारों को कंधों पर ढोकर अस्पताल लाना और मौत के बाद भी शव को खुद उठाकर ले जाना, ये झारखंड के ग्रामीण इलाकों की कड़वी सच्चाई बनती जा रही है।
मंत्रीजी की अनदेखी और अपने लोगों को फायदा पहुंचाना
बताया जा रहा है कि स्वास्थ्य मंत्री ने एंबुलेंस सेवा की जिम्मेदारी अपने करीबी लोगों को दे दी है। यही नहीं, सरकारी अस्पतालों के काम में उनका नाबालिग बेटा भी हस्तक्षेप करता है। ऐसे में जब जिम्मेदार लोग खुद ही लापरवाह हों, तो सिस्टम कैसे ठीक चलेगा?
जनता का सवाल – कब मिलेगी सही सुविधा?
इस घटना से लोगों में गुस्सा है। सवाल उठता है कि आम लोगों को इलाज और शव ले जाने जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी अगर इस तरह संघर्ष करना पड़े, तो सरकार की योजनाएं और घोषणाएं किस काम की हैं?
मुख्यमंत्री से मांग
जनता का साफ संदेश है — मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जी को चाहिए कि स्वास्थ्य विभाग और एंबुलेंस सेवाओं की तत्काल समीक्षा करें। जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, इसके लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
ये घटना सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नाकामी है। अब वक्त आ गया है कि सरकार सिर्फ घोषणा न करे, जमीनी सच्चाई भी देखे और तुरंत सुधार करे, ताकि किसी और को अपनी बेटी का शव कंधों पर ढोकर न ले जाना पड़े।
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